कैसे एक रिपोर्ट ने देश के प्रधानमंत्री को इस्तीफा देने पर किया मजबूर?

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आज से 26 साल पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल की संयुक्त मोर्चे की सरकार को कांग्रेस ने अपना समर्थन वापिस लेकर गिरा दिया था। तकरीबन सात महीने ये सरकार चली थी लेकिन इतने कम वक्त में ही कांग्रेस ने तय किया कि वह अब इस सरकार को आगे काम नहीं करने देगी। आइए जानते हैं कि आखिर क्या थी वह वजह जिसके चलते गुजराल सरकार गिर गई।

इसके लिए हमें एक साल पहले जाना होगा जब 1996 में आम चुनाव हुए थे। 1996 में हुए आम चुनाव में पीएम नरसिम्हा राव की सरकार वापसी नहीं कर सकी थी। कांग्रेस को सिर्फ 140 सीटें मिली थीं यानी पार्टी खुद के बूते सरकार नहीं बना सकती थी। ऐसी ही हालत बीजेपी की भी थी। भारतीय जनता पार्टी 1996 में राम के नाम पर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी लेकिन उसके पास भी बहुमत नहीं था। हालात ऐसे थे कि सियासी तिकड़मबाजी शुरू हो गई।

बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी थी तो इस नाते जल्दी में अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ले ली। हालांकि वे 16 दिन बाद इस्तीफा देने को मजबूर हो गए क्योंकि उनके पास बहुमत नहीं था।

संयुक्त मोर्चे का गठन

ऐसे हालात में जनता दल और वामपंथी नेताओं ने एक नए मोर्चे की योजना बनाई। जिसे संयुक्त मोर्चा नाम दिया गया। इसमें मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी , असम गण परिषद,डीएमके,टीडीपी और तमिल मनीला कांग्रेस को भी शामिल किया गया। कांग्रेस नहीं चाहती थी कि बीजेपी सत्ता में आए इसलिए उसने इस मोर्चे को समर्थन देने का एलान किया। मोर्चे ने कर्नाटक के सीएम रह चुके एचडी देवेगौड़ा को प्रधानमंत्री चुना और सरकार बनी। हालांकि देवेगौड़ा सालभर भी पीएम नहीं रह सके।

गुजराल कैसे बन गए पीएम?

इंद्रकुमार गुजराल ने अपनी राजनीति की शुरूआत 1964 में कांग्रेस से की थी। इंदिरा गांधी के करीबी माने जाने वाले गुजराल इमरजेंसी के दौरान सूचना प्रसारण मंत्री रहे थे। हालांकि संजय गांधी संग खटपट के चलते उन्हें उनके पद से हटा दिया गया था। बाद में गुजराल जनता दल में चले गए और वीपी सिंह सरकार में विदेश मंत्री रहे। बाद में वे देवेगौड़ा सरकार में विदेश मंत्री भी रहे।

अप्रैल 1997 में कांग्रेस ने चाहा कि देवेगौड़ा के अलावा किसी और को पीएम बनाया जाए। बाद में इस बात पर सहमति बनी कि गुजराल को पीएम बनाया जाए।

क्यों गिरी गुजराल सरकार ?

28 अगस्त 1997 को, जैन आयोग की रिपोर्ट सरकार को सौंपी गई और 16 नवंबर को यह लीक हो गई। आयोग ने राजीव गांधी की हत्या की साजिश के पहलुओं की जांच की थी और गांधी की हत्या में आरोपी तमिल आतंकियों का मौन समर्थन करने के लिए नरसिम्हा राव सरकार के अलावा DMK की भी आलोचना की थी। DMK केंद्र में सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा थी और केंद्रीय मंत्रिमंडल में उसके मंत्री थे। कांग्रेस ने सबसे पहले रिपोर्ट को संसद के पटल पर रखने की मांग की, जिसे गुजराल ने अस्वीकार कर दिया।

बाद में गुजराल ने रिपोर्ट का अध्ययन करने के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया, जिसे तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने स्वीकार कर लिया। कांग्रेस संसदीय दल के नेता शरद पवार ने कहा कि वे रिपोर्ट में शामिल किसी भी व्यक्ति से इस्तीफा मांगेंगे। हालांकि गुजराल ने DMK का समर्थन करना जारी रखा। रिपोर्ट 20 नवंबर 1997 को पेश की गई। उसी दिन संसद में गुस्से के नजारे दिखे। कांग्रेस ने गुजराल से DMK को मंत्रिमंडल से हटाने को कहा और ऐसा न होने तक किसी भी संसदीय बहस में भाग लेने से इनकार कर दिया ।

बाद में गुजराल ने सीताराम केसरी को साफ कर दिया था कि वे किसी भी डीएमके नेता को बर्खास्त नहीं करेंगे। इसके बाद 28 नवंबर को कांग्रेस ने आखिरकार उनकी सरकार से समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिर गई।

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