समूची मानवजाति का कल्याण चाहते हैं लेखक महेंद्र मधुकर के ‘वक्रतुंड’

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बीते वक्त में अंग्रेजी में इंडियन माइथोलॉजिकल फिक्शन को पाठकों का बहुत प्यार मिला है। इसका ही एक उदाहरण है कि आप कहीं भी किताबों की खरीदारी करने निकलेंगे तो इस श्रेणी की आपको बहुत सी किताबें मिल जाएंगी। यहां तक कि इस तरह का लेखन करने वाले लेखक आज बेस्ट बुक सेलर हैं। हिंदी पाठक भी इन अंग्रेजी किताबों का अनुवाद पढ़ता दिखता है। ऐसा नहीं है कि हिंदी में पौराणिक उपन्यास या इस तरह की किताबें नहीं लिखी गई हैं। वैश्वानर, वयं रक्षामः, ययाति, पुनर्नवा , मृत्युंजय, बाणभट्ट की आत्मकथा,राम कथा आदि पुस्तकें हैं, जिन्हें हिंदी पाठक पढ़ता रहा है। हिंदी में पौराणिक उपन्यास हमारी संस्कृति के संरक्षण के लिए भी आवश्यक हैं। हिंदी में पौराणिक उपन्यासों की बात आती है तो जिक्र होता है लेखक महेंद्र मधुकर का। जिनका एक उपन्यास है ‘वक्रतुंड’

वक्रतुंड यानी कि श्रीगणेश। श्रीगणेश हिंदू समाज में सर्वाधिक पूजे जाने वाले देवता हैं। जो कि महेंद्र मधुकर के इस उपन्यास के केंद्र में हैं। गणेश ऐसे देवता हैं जो सबसे पहले पूजे जाते हैं और वे देश के हर हिस्से में पूजनीय हैं। यहां तक कि भारत से बाहर भी श्रीगणेश बहुत से देशों की संस्कृति का हिस्सा हैं। जैसे श्रीलंका, म्यंमार,थाईलैंड,इंडोनेशिया, कंबोडिया और वियतनाम आदि। व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाए तो श्रीगणेश इसलिए भी सबसे अधिक पूजे जाते हैं क्योंकि लोग उनको विघ्नहर्ता कहते हैं। सब चाहते हैं कि उनके काम में कोई दिक्कत न आए और काम आसानी से पूरा होगा। आम आदमी की बोलचाल में श्रीगणेश करने का मतलब ही शुरुआत से है।

मेरी दृष्टि में लेखक द्वारा श्रीगणेश पर उपन्यास लिखने का एक कारण यह भी है कि गणेश बुद्धि के देवता माने जाते हैं। गणेश जी का पढ़ाई लिखाई से गहरा संबंध है। श्रीगणेश पर पौराणिक उपन्यास के जरिए लेखक पाठक का बौद्धिक लाभ करना चाहते हैं। श्री गणेश से संबंधित वह ज्ञान या मूल्य साझा करना चाहते हैं जो कि आज के समय में पाठक के काम आ सकता है। इस तरह मधुकर अपना लेखक धर्म निभाना चाहते हैं। उपन्यास की बात की जाए तो इसमें लेखक ने श्रीगणेश के जन्म, उनके विवाह, दुष्टों के अंत करने और अन्य लीलाओं का जिक्र किया है। उपन्यास में श्रीगणेश के संवाद पाठकों का ज्ञानवर्धन करते हैं और नए विचार देने का काम करते हैं।

हिंदू धर्म ग्रंथों की बात की जाए तो ऋग्वेद में श्री गणेश का उल्लेख है। श्री गणेश पर अलग से पुराण उपलब्ध हैं। गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ तो हर छोटी बड़ी पूजा में होता ही है। श्रीगणेश का नाम गण और ईश से बना है। वैसे तो आम धारणा यही है कि वे शिव के गणों के ईश हैं इसलिए वे गणेश हैं। लेकिन अगर गण का संबंध समस्त चराचर से जोड़ा जाए तो इसका एक गहरा अर्थ भी है। श्रीगणेश को आपने अलग-अलग कलाकृतियों में देखा होगा। इस उपन्यास में आप कुछ इस तरीके से ही गणेश के अलग रूपों को देखेंगे। उदाहरण के लिए सब जानते हैं कि गणेश जी की सवारी चूहा है। लेकिन इस उपन्यास को पढ़ आपको पता चलेगा कि गणेश अलग-अलग वाहनों की सवारी भी करते हैं।

लेखक मुधकर पौराणिक विषयों पर लिखते रहे हैं। पौराणिक उपन्यास होने के बाद भी इस उपन्यास की भाषा उतनी जटिल नहीं है जो कि समझ में न आए। उपन्यास की विशेषता यह है कि लेखक के वक्रतुंड समूची मानवजाति का कल्याण चाहते हैं। जो कि आपको पुस्तक के अंत में समझ आ ही जाएगा।

किताब के बारे में
लेखक- महेंद्र मधुकर
प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन
मूल्य- 399 रुपये
पेज संख्या- 256

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