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अगर एक रुपया एक डॉलर के बराबर हो जाए तो…

– Amit Singhal

श्रीलंका के क्राइसिस को एक अन्य दृष्टिकोण से देखने का आग्रह करूँगा। इस समय 2.2 करोड़ जनसँख्या वाले श्रीलंका पर 5100 करोड़ डॉलर का विदेशी उधार है। पिछले वर्ष जीडीपी थी 8500 करोड़ डॉलर। 9 मार्च तक एक अमेरिकी डॉलर का 202 श्रीलंकन रुपया मिलता था। आज 365 रुपये मिल रहा है।

आखिरकार क्यों नहीं श्रीलंका यह घोषणा कर देता है कि इस शुक्रवार मध्य रात्रि से डॉलर एक श्रीलंकन रुपये के बराबर हो गया है। अर्थात सरकार श्रीलंकन रुपये का दाम स्वयं फिक्स कर दे; डॉलर से बराबरी कर दे। नए नोट छापकर न केवल कुछ क़र्ज़ चुका दे, बल्कि “उस” डॉलर बराबर श्रीलंकन रुपये से पेट्रोल, अन्न, खाद इत्यादि खरीद कर अपनी अर्थव्यवस्था को रातों-रात ठीक कर दे?

श्रीलंका सरकार ने ऐसा करने का – अर्थात नोट छापकर आर्थिक संकट से निपटने का प्रयास किया भी। परिणाम क्या निकला? रुपया क्रैश कर गया; रातो-रात मंहगाई बढ़ गयी। कारण यह है कि नोट अधिक है; उत्पादन, उत्पादकता, वस्तु (गुड्स) एवं सेवाएं कम है। उदहारण के लिए, चावल की मात्रा सीमित है; लेकिन जेब में रुपये अधिक हो गए। अतः हर व्यक्ति उस सीमित मात्रा वाले चावल के लिए नोट फेंक रहा है जिससे चावल के दाम तेजी से बढ़ गए।

किसी भी करेंसी की विनिमय दर एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया का अंग…

करेंसी की विनिमय दर में उस राष्ट्र के आयात-निर्यात, अर्थव्यवस्था का मैनेजमेंट तथा वैश्विक आर्थिक और राजनैतिक परिस्थितियों का बहुत बड़ा हाथ होता है। किसी भी करेंसी की विनिमय दर एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया का अंग है। ऐसा नहीं होता कि आप रातों-रात यह कह दे कि ₹1 का $1 मिलेगा। क्योंकि इसका परिणाम फिर यह हुआ कि दिल्ली में आप की मेट्रो यात्रा लगभग $10 के बराबर हो गयी जबकि न्यूयॉर्क में उसी मेट्रो के लिए लगभग $3 देना पड़ता है।

पूर्व में जिंबाब्वे और अर्जेंटीना ने रातोंरात अपनी करेंसी का भाव डॉलर के मुकाबले बढ़ा दिया। परिणाम यह हुआ कि उन देशों की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गई। एक समय अमेरिकी डॉलर के बदले जिंबाब्वे में आप 10 लाख से ज्यादा लोकल करंसी ले सकते थे जिसका मूल्य कूड़े के बराबर था। अर्जेंटीना की अर्थव्यवस्था करेंसी की विनिमय दर कृत्रिम तरीके से निर्धारित करने के बाद पिछले 18 वर्षो में कभी भी संभल नहीं पायी। इस कड़ी में वेनेज़ुएला एक अन्य उदहारण है।

1987-91 में भारत की अर्थव्यवस्था का गलत मैनेजमेंट होने के कारण हमारे उद्योग-धंधों के निर्यात का बिजनेस चौपट हो रहा था, क्योंकि उस समय 100 रुपए का भारतीय सामान अमेरिका में $5 का पड़ता था जबकि वही माल चीन से $3 से $4 में मिल जाता था। लेकिन जुलाई 1991 में रुपए की वैल्यू 26 करते ही वही माल अब अमेरिका में $4 के अंदर मिलने लगा था।

दूसरी तरफ हमें तेल डॉलर में खरीदना पड़ता था और रुपए की कीमत गिरने से वही तेल रातोंरात महंगा हो गया जिससे हमारे उद्योगों में खपने वाले कच्चे माल और ट्रांसपोर्ट की लागत बढ़ गई। हमारे पूंजीपति देश से पैसा निकाल कर विदेशों में जमा करा रहे थे क्योंकि रुपए की कृत्रिम कीमत होने के कारण विदेशों में उन्हें ब्याज दर से ज्यादा लाभ मिल रहा था। इसीलिए उस समय सोना गिरवी रखने की नौबत आ गई थी। अतः मनमोहन सिंह को जुलाई 1991 के पहले सप्ताह में डॉलर के मुकाबले रुपए का दाम ₹21 से गिरा कर ₹26 करना पड़ा था।

यह लिखने से मेरा तात्पर्य है कि रुपए की कीमत अगर आप डॉलर से निर्धारित करेंगे तो हर समय आप चाहेंगे कि किसी भी तरह से रुपए महंगा हो जाए। क्योंकि एक तगड़ा रुपए कहीं ना कहीं हमारी समझ में एक तगड़े राष्ट्र की पहचान है।
आज जापान में 1 डॉलर के बदले 138 येन मिल रहा है; वर्ष 2018 में 110 येन मिलता था। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या वहां की अर्थव्यवस्था भारत से कमजोर है?

करेंसी की कीमत केवल डॉलर की तुलना में नहीं जांची जा सकती

वर्ष 2007 में एक यूरो का 1.60 डॉलर मिलता था। कल एक यूरो का भाव एक डॉलर हो गया। इसलिये अर्थशास्त्री किसी भी करेंसी की कीमत केवल डॉलर की तुलना में नहीं जांचते हैं और इसके लिए करेंसी की वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (real effective exchange rate) देखी जाती है जो विश्व की कई करेंसियों की प्रभावी दर से तुलना करके प्राप्त की जाती है। रुपए की वास्तविक प्रभावी विनिमय दर विश्व की 40 मुद्राओं की तुलना में निर्धारित की जाती है।

अमेरिका में ब्याज की दर बढ़ रही है जिससे निवेशक कई देशों से पैसा निकालकर अब अमेरिकी बैंकों में डाल रहे हैं। इससे सभी देशों की विनिमय दर में गिरावट आई है। लेकिन चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि एक तो भारत के पास 600 बिलियन (अरब) डॉलर से अधिक विदेशी मुद्रा है। दूसरा, मोदी सरकार वी पी सिंह सरकार की तरह खिचड़ी सरकार नहीं है; ना ही पिछली सरकार की तरह भ्रष्ट है।

तीसरा अर्थव्यवस्था की डोर जिन व्यक्तियों ने संभाली है उनकी सत्य निष्ठा और व्यक्तिगत आचरण पर संदेह नहीं किया जा सकता है। चौथा, प्रधानमंत्री और उनके करीबी सहयोगियों की सत्ता की डोर किसी इटैलियन के हाथ में नहीं है। याद दिलाने के लिए, सोनिया सरकार के समय के भ्रष्टाचार और अर्थव्यवस्था के खराब मैनेजमेंट का प्रभाव रुपये पे दिखाई देता था। 2 जनवरी 2013 को रुपये की वैल्यू 54.24 थी; जो 28 अगस्त 2013 को गिरकर 68.80 हो गयी थी। अर्थात, 8 माह में 14 रुपये की गिरावट।

(लेख में दिए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इसके लिए एपीएन न्यूज की संपादकीय टीम जिम्मेदार नहीं है। )

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