कौन हैं एसएन सुब्बा राव? जिन्होंने चंबल घाटी के सैकड़ों डाकुओं का एक साथ करवाया था सरेंडर

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SN Subba Rao

चंबल घाटी को डकैतों से मुक्त कराने वाले गांधीवादी विचारक एसएन सुब्बाराव का निधन हो गया है। एक साथ 672 डाकुओं का सरेंडर करवाने वाले सुब्बाराव ने पूरा जीवन समाज सेवा को समर्पित कर दिया था। ग्वालियर चंबल अंचल में सुब्बा राव को भाई जी के नाम से जाना जाता था। उन्होंने नेशनल यूथ प्रोजेक्ट की भी स्थापना की थी।

कम उम्र में हो गया था गांधीवादी विचारों का प्रभाव

एसएन सुब्बा राव का पूरा नाम सलेम नंजुन्दैया सुब्बा राव था। सुब्बा राव का का जन्म बेंगलुरू में 7 फरवरी 1929 को हुआ था। स्कूल में पढ़ते समय महात्मा गांधी की शिक्षा से सुब्बा राव प्रेरित थे। 9 अगस्त 1942 को मात्र 13 साल की उम्र में वे आजादी के आंदोलन से जुड़ गए। छात्र जीवन के दौरान सुब्बा राव स्टूडेंट कांग्रेस और राष्ट्र सेवा दल में शामिल रहे।

डाकुओं का सामूहिक आत्मसमर्पण करवाया

सुब्बा राव ने 14 अप्रैल 1972 को गांधी सेवा आश्रम जौरा में 654 डकैतों का समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण एवं उनकी पत्नी प्रभादेवी के सामने सामूहित आत्मसमर्पण कराया था। इनमें से 450 डकैतों ने जौरा के आश्रम में, जबकि 100 डकैतों ने राजस्थान के धौलपुर में गांधीजी की तस्वीर के सामने हथियार डालकर समर्पण किया था।

1954 में जब सुब्बा राव चंबल के इलाकों से गुजरे, तो उन्होंने चंबल के युवाओं के लिए रचनात्मक शैक्षिक मॉड्यूल के बारे में सोचा। यह अवधारणा थी, जिसने इस क्षेत्र में “आश्रम शिविरों” के संगठन में योगदान दिया। सुब्बा राव ने 1964 में चंबल घाटी के एक कस्बे जौरा में देश के सभी हिस्सों के युवक और युवतियों की भागीदारी के साथ एक रिकॉर्ड 10 महीने के लंबे शिविर का आयोजन किया।

उन्होंने चंबल घाटी में महात्मा गांधी सेवा आश्रम की स्थापना की। यह आश्रम था, जिसने बाद में 14 अप्रैल 1972 को मोहर सिंह, माधो सिंह और अन्य जैसे सबसे कुख्यात डकैतों के ऐतिहासिक आत्मसमर्पण करवाया। इन प्रयासों के बाद बटेश्वर (यू.पी.) और तालाबशाही (राजस्थान) में डकैतों का आत्मसमर्पण हुआ।

राजस्थान सीएम ने निधन पर जताया दुख

वहीं आज राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने ट्वीट किया, ‘वयोवृद्ध गांधीवादी, भाईजी डॉ एसएन सुब्बाराव जी के निधन से मुझे व्यक्तिगत रूप से बेहद आघात पहुंचा है। 70 वर्षों से अधिक समय से देश के युवाओं से जुड़कर, लगातार अपने शिविरों के माध्यम से उन्हें प्रेरणा देने वाले देश की पूंजी गांधीवादी विचारक और प्रेरक का देहांत एक अपूरणीय क्षति है। भाईजी ने जीवनपर्यन्त युवाओं को जागरूक करने की मुहिम चलाई, विदेशों में भी वहां पर नई पीढ़ी को देश के बारे में बताया, यहां के संस्कार, संस्कृति, अनेकता में एकता का सन्देश उन तक पहुंचाने का कार्य किया। उनके शिविरों में आकर मुझे बेहद सुकून महसूस होता रहा।

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