पश्चिम बंगाल में न्यायिक अधिकारियों के घेराव पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, प्रशासनिक प्रतिक्रिया पर जताई ‘गहरी निराशा’, जानें पूरा मामला

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पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में न्यायिक अधिकारियों के घेराव के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराज़गी जताई है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संकट की घड़ी में प्रशासनिक प्रतिक्रिया “बेहद निराशाजनक” रही और शीर्ष अधिकारियों तक संपर्क न हो पाना गंभीर चिंता का विषय है।

यह मामला उस घटना से जुड़ा है, जिसमें कालियाचक स्थित BDO कार्यालय में सात न्यायिक अधिकारियों—जिनमें तीन महिला अधिकारी भी शामिल थीं—को असामाजिक तत्वों द्वारा घेर लिया गया था। अदालत इस प्रकरण की सुनवाई स्वतः संज्ञान के तहत कर रही है।

मुख्य सचिव से संपर्क न होना बना बड़ा मुद्दा

सुनवाई के दौरान अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर आपत्ति जताई कि संकट के समय राज्य के मुख्य सचिव तक संपर्क नहीं हो सका।कलकत्ता हाई कोर्ट (Calcutta High Court) के मुख्य न्यायाधीश द्वारा भेजे गए पत्र का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि मुख्य सचिव ने ऐसा कोई मोबाइल नंबर साझा नहीं किया था, जिसमें व्हाट्सएप (WhatsApp) सुविधा उपलब्ध हो, जिससे तत्काल संवाद संभव हो सके।

कोर्ट ने इसे प्रशासनिक विफलता का गंभीर उदाहरण बताते हुए कहा कि आपात स्थिति में संचार का अभाव स्थिति को और बिगाड़ सकता है।

घटना के दौरान दिखी ‘स्पष्ट निष्क्रियता’

पीठ ने अपने अवलोकन में दर्ज किया कि दोपहर करीब 3:30 बजे घेराव की घटना होने के बावजूद, रात 8:30 बजे तक प्रभावी कार्रवाई के संकेत नहीं मिले। अदालत ने इसे “स्पष्ट निष्क्रियता” करार देते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया अपेक्षित थी, जो नहीं दिखाई दी।

वरिष्ठ अधिकारियों के आचरण पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक (DGP), जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक सहित कई वरिष्ठ अधिकारियों के आचरण को “अत्यंत निंदनीय” बताया। अदालत ने इन अधिकारियों से जवाब तलब किया है कि घेराव की सूचना मिलने के बावजूद तुरंत प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए गए।

अगली सुनवाई में पेश होने का निर्देश

अदालत ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे अगली सुनवाई में वर्चुअली उपस्थित होकर अपना पक्ष रखें और पूरी घटना पर स्पष्टीकरण दें। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि यदि जवाब संतोषजनक नहीं हुआ, तो आगे कड़ी कार्रवाई की जा सकती है।

न्यायिक सुरक्षा पर उठे बड़े सवाल

यह मामला न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। अदालत ने संकेत दिया है कि ऐसी घटनाएं न केवल न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं, बल्कि कानून व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी असर डालती हैं।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का यह रुख स्पष्ट करता है कि न्यायपालिका की सुरक्षा से समझौता किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जाएगा। साथ ही, प्रशासनिक तंत्र को संकट प्रबंधन और त्वरित संचार प्रणाली को मजबूत करने की जरूरत है।

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