Anosh Ekka Bail: सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड के पूर्व कैबिनेट मंत्री एनोस एक्का को आय से अधिक संपत्ति मामले में बड़ी राहत देते हुए उनकी सजा पर रोक लगा दी है और अपील लंबित रहने तक जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है। शीर्ष अदालत का यह फैसला उस समय आया जब उसके समक्ष यह तर्क रखा गया कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने एक ही आरोपों के आधार पर दो अलग-अलग अभियोजन चलाए हैं, जिससे अभियोजन प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठता है।
हाईकोर्ट का आदेश पलटा
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने झारखंड हाईकोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें एनोस एक्का की सजा निलंबन याचिका खारिज कर दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट को इस महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर विचार करना चाहिए था कि क्या समान तथ्यों और आरोपों के आधार पर दो समानांतर अभियोजन चलाना न्यायसंगत है।
क्या है मामला?
मामले की शुरुआत वर्ष 2008 में दर्ज एक विजिलेंस एफआईआर से हुई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि मंत्री पद पर रहते हुए एनोस एक्का ने अपनी ज्ञात आय से अधिक संपत्ति अर्जित की। बाद में इसी एफआईआर के आधार पर CBI ने दो अलग-अलग चार्जशीट दाखिल कीं, जिसके चलते दो स्वतंत्र ट्रायल शुरू हुए।
सुप्रीम कोर्ट में एक्का की ओर से दलील दी गई कि दोनों मामलों में जांच की अवधि, संपत्तियों का ब्योरा और वित्तीय लेन-देन लगभग समान हैं। ऐसे में दूसरा अभियोजन मूल आरोपों की पुनरावृत्ति प्रतीत होता है।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
पीठ ने प्रथम दृष्टया माना कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों से यह संकेत मिलता है कि दोनों मामलों के आरोपों में पर्याप्त समानता है। अदालत ने कहा कि “दो विभाजित चार्जशीट दाखिल की गई हैं और कई आरोप एक-दूसरे से मेल खाते प्रतीत होते हैं,” इसलिए इस पहलू की गहन न्यायिक समीक्षा आवश्यक है।
18 करोड़ की संपत्ति पहले ही अटैच
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी नोट किया कि एनोस एक्का पहले ही दोनों मामलों में पर्याप्त अवधि जेल में बिता चुके हैं और उनकी लगभग 18 करोड़ रुपये की संपत्तियां अटैच की जा चुकी हैं। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने सजा निलंबित कर उन्हें अंतरिम राहत देने का फैसला किया।
जमानत पर लगी शर्तें
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने जमानत मंजूर की है, लेकिन इसके साथ कुछ शर्तें भी लगाई हैं। अदालत ने निर्देश दिया कि रिहाई के सात दिनों के भीतर एनोस एक्का ट्रायल कोर्ट के समक्ष लिखित आश्वासन देंगे कि यदि आवश्यकता पड़ी तो आदिवासी भूमि को उसकी मूल स्थिति में बहाल करने की प्रक्रिया में सहयोग करेंगे।
इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि आरोपी को ट्रायल कोर्ट की संतुष्टि के अनुरूप जमानत बांड और जमानतदार प्रस्तुत करने होंगे। इसके अतिरिक्त, ट्रायल कोर्ट परिस्थितियों के अनुसार अन्य आवश्यक शर्तें भी निर्धारित कर सकेगा।









