Amrita Pritam Birth Anniversary: अमृता प्रीतम “मैं तुझे फिर मिलूंगी….”

Amrita Pritam: अमृता प्रीतम ने अपने दुखों को चाहे वो बंटवारे का हो या एक स्त्री के मन को टटोलना सभी को अपने साहित्यिक किरदारों में न केवल ढाला बल्कि खुद भी उस दर्द से गुजरीं बस तसल्ली इतनी सी थी की उनके जीवन में इमरोज़ जैसा हमसफऱ उन्हें मिला।

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Amrita Pritam Birth Anniversary
Amrita Pritam Birth Anniversary

-Shweta Rai| वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे इक खूबसूरत मोड़ कर छोड़ना अच्छा ,चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों…!
साहिर की लिखी नज़्म और अमृता के साथ उनका रिश्ता भी कुछ ऐसा ही था जो कभी मुक्कमल न हो सका लेकिन जब भी बात अमृता प्रीतम की होती है तो साहिर का नाम खुद ब खुद उनसे जुड़ जाता है या यूँ कहें कि दोनों दो जिस्म एक जान थे। वैसे भी प्रेम की पहेली को सुलझाना आसान नहीं है। कौन जानता है कि इंसानी मन की पेचीदा गलियों में कब कौन सी कहानी लिखी जा रही हो। भले ही दोनों का अफसाना अधूरा रह गया हो, उनकी राहें जुदा हो गयीं लेकिन इन सबके बावजूद दोनों का प्रेम, प्रेम के रंग को और पुख्ता बना देता है।

Amrita Pritam Birth Anniversary today. Famous Indian Writer Amrita Pritam.
Amrita Pritam Birth Anniversary.

Amrita Pritam Birth Anniversary : अमृता प्रीतम अपने दौर से काफी आगे की सोच रखती थीं…

पंजाबी भाषा की पहली कवयित्री अमृता प्रीतम पंजाबी के सबसे लोकप्रिय लेखकों में से एक थी। उन्होंने कुल मिलाकर लगभग 100 किताबें लिखीं। जिनमें उनकी सबसे चर्चित आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ रही। अमृता प्रीतम उन साहित्यकारों में से थीं जिनकी कृतियों का कई भाषाओं में अनुवाद किया गया। अमृता प्रीतम का जन्म 31 अगस्त 1919 को गुजरांवाला पंजाब में हुआ लेकिन उनका बचपन लाहौर में बीता और वहीं उनकी शिक्षा भी हुई। छह साल की उम्र में उनकी शादी हो गया थी और 10 साल की छोटी सी ही उम्र में अमृता ने लिखना शुरू कर दिया था। जब वो महज 16 साल की थीं तभी उनकी पहली किताब ‘अमृत लहरें’ छपकर आयी । अमृता एक ऐसे परिवार से ताल्लुक रखती थी जहां धर्म के धागे इंसान की किस्मत तय किया करते थे। उनकी नानी मां दूसरे धर्म से ताल्लुक रखने वाले लोगों के बर्तन भी अलग रखा करती थी। ऐसे परिवार में खुले विचारों वाली अम़ृता का जन्म हुआ। उन्होनें भले ही अपने पति प्रीतम सिंह के नाम पर अपने नाम के आगे प्रीतम लगाया लेकिन कभी उन्हें अपना न सकीं। अमृता ने अपनी जिंदगी में दो लोगों से प्यार किया। जिनमें से एक साहिर और दूसरे इमरोज़ थे। अमृता प्रीतम वो महिला थीं जो अपने दौर से काफी आगे की सोच रखती थीं।

Amrita Pritam Birth Anniversary : अमृता और साहिर की मुलाकात एक मुशायरे के दौरान हुयी…

अपनी आत्म.कथा “रसीदी टिकट” लिखते हुये अमृता बहुत बेबाक हो जाती हैं। वो बार-बार साहिर का जिक्र तो करती हैं, लेकिन कभी खुलकर ये नहीं लिखतीं कि आखिर इस रिश्तेब में आने वाली दूरियों की वजह क्याी थी। क्योंे इतने प्रेम के बाद भी असल ज़िंदगी में वो एक ना हो सके। बात 1944 की है जब इस कहानी के दो किरदार अमृता और साहिर लुधियानवी एक दूसरे से पहली बार मिले, जगह थी प्रीत नगर … जो लाहौर और दिल्ली के बीच स्थित थी । साहिर उस वक्त बड़े आदर्शवादी लेखक हुआ करते थे, तो वहीं अमृता बेहद दिलकश ,खूबसूरत लेखिका थीं। दोनों की मुलाकात एक मुशायरे के दौरान प्रीत नगर में हुयी। । मद्धम रोशनी वाले एक कमरे में दोनों मिले और बस प्यार हो गया। क्रांतिकारी मिजाज के साहिर लुधियानवी और रूमानी मिजाज़ की अमृता प्रीतम पहली ही मुलाकात में साहिर को अपना दिल दे बैठीं थीं। साहिर भी अमृता को चाहने लगे थे लेकिन उनमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि वो ये बात कुबूल कर पाते कि उन्हें भी अमृता से मोहब्बत है।

अमृता ने इस बात का जिक्र अपनी किताब “रसीदी टिकट” में भी किया है वो लिखती हैं कि, “साहिर की जिंदगी का एक सबसे बड़ा कॉम्पलेक्स ये है कि वह सुंदर नहीं है। प्रेम और स्त्रियों को लेकर साहिर के रुख में सहजता और आत्म विश्वायस कभी नहीं रहा। हिंदी सिनेमा में मशहूर हो जाने, शोहरत और दौलत कमा लेने के बाद भी उनमें वो आत्म विश्वारस कभी नहीं आया।” दोनों की लाहौर में हुई मुलाकात कुछ अलग थी। दोनों घंटों खामोश एक दूसरे के पास बैठे रहे। लब खामोश थे लेकिन खामोशी में भी वो दोनों एक दूसरे के दिल को पढ़ रहे थे। कहते हैं कि जाते हुए साहिर ने अमृता को एक नज्म पकड़ायी थी, कोई नहीं जानता कि वो नज़्म क्या‍ थी क्योंथकि अपनी आत्मंकथा में अमृता ने उस नज्मे का जिक्र कभी नहीं किया ,शायद वो इस खास नज़्म को दुनिया के साथ बांटना नहीं चाहतीं थीं।

Amrita Pritam Birth Anniversary: मुल्क ,बंटवारा और मुहब्बत की दूरी
पहली मुलाकात के बाद दोनों के बीच प्रेम का सिलसिला बढ़ा। अमृता साहिर को लंबे-लंबे खत लिखा करतीं औऱ डाक के ज़रिये साहिर उन खतों का जवाब दिया करते थे। बीच-बीच में कभी-कभी दोनों की मुलाकातें भी होतीं। साहिर से अपनी पहली मुलाकात के बाद अमृता ने साहिर के लिये कुछ ऐसा लिखा जिसमें साहिर के लिये उनके अहसास थे। अमृता लिखती हैं कि “अब रात गिरने लगी तो तू मिला है, तू भी उदास, चुप, शांत और अडोल। मैं भी उदास, चुप, शांत और अडोल। सिर्फ दूर बहते समुद्र में तूफान है।

अमृता आगे लिखती हैं कि “मुझे नहीं मालूम की वो साहिर के लफ्जों की जादूगरी थी या उनकी खामोश नज़र का कमाल था, लेकिन कुछ तो था, जिसने मुझे अपनी तरफ खींच लिया था। आज जब उस रात को आँखें मूंद कर देखती हूँ तो ऐसा समझ आता है कि तकदीर ने मेरे दिल में इश्क़ का बीज डाला, जिसे बारिश की फुहारों ने बढ़ा दिया, उस दिन बारिश हुई थी। रसीदी टिकट में अमृता प्रीतम ने साहिर के साथ हुई मुलाकातों का जिक्र कई बार किया है और साथ ही अपने एहसासों को इतने खूबसूरत अंदाज़ में समेटा कि आज भी दो प्यार करने वाले जब भी बात करते हैं तो अमृता और साहिर के क़सीदे पढ़ते हैं।जहाँ दोनों की मोहब्बत मुक्कमल ना होकर भी दुनिया के लिये सच्ची मोहब्बत का सबब बनी।
Amrita Pritam Birth Anniversary:आधी जली सिगरेट और जूठे प्याले में सिमटा अमृता-साहिर का प्रेम…
अमृता जब साहिर के लिये अपने जज़्बातों और एहसासों को उकेरती हैं तो हर प्रेमी के दिल को छू लेती हैं। वह लिखती हैं” वो खामोशी से सिगरेट जलाता और फिर आधी सिगरेट ही बुझा देता, फिर एक नई सिगरेट जला लेता। जब तक वो विदा लेता, कमरा सिगरेट की महक से भर जाता। मैं इन सिगरेटों को हिफाजत से उठाकर अलमारी में रख देती और जब कमरे में अकेली होती तो उन सिगरेटों को एक-एक करके पीती।मेरी उंगलियों में फंसी सिगरेट, ऐसा लगता कि मैं उसकी उंगलियों को छू रही हूं। मुझे धुएं में उसकी शक्ल दिखाई पड़ती है। ऐसे मुझे सिगरेट पीने की लत पड़ी।” आगे वह कुछ पोयटिक अंदाज में साहिर के लिये कुछ इस तरह से लिखती हैं…
यह आग की बात है तूने यह बात सुनाई है
यही ज़िन्दगी की वहीं सिगरेट है जो तूने कभी सुलगायी थी
चिंगारी तूने दी थी, ये दिल सदा जलता रहा
वक्त कलम पकड़ कर कोई हिसाब लिखता रहा
ज़िन्दगी का अब गम नहीं इस आग को संभाल ले
तेरे हाथ की खैर मांगती हूँ,अब और सिगरेट जला ले।
केवल अमृता ही नहीं बल्कि इस प्रेम की तपिश को साहिर भी बखूबी महसूस करते । जो कभी अपनी नज़्मों के ज़रिये तो कभी अमृता के जूठे कप को सहेजकर अपने इश्क का इज़हार करते हैं। इससे जुड़ा किस्सा बेहद दिलचस्प है । हुआ यूँ कि जब साहिर और संगीतकार जयदेव एक गाने पर काम कर रहे थे तो उन्होंने साहिर के घर पर एक जूठा कप देखा । उस कप को साफ करने की बात जब जयदेव ने कही तो साहिर ने कहा कि “इसे छूना भी मत, अमृता जब आखिरी बार यहां आईं थीं तो इसी कप में ही उन्होंने चाय पी थी।”
Amrita Pritam Birth Anniversary: वो अमृता ही थीं जिसने साहिर के दिल में जगह बनाई…
अमृता प्रीतम और साहिर की मोहब्बत की राह में कई रोड़े थे, जिस समय अमृता साहिर से मिली वो शादीशुदा थीं। उनकी शादी प्रीतम सिंह से हो चुकी थी हालाँकि वो उस रिश्ते में कभी भी खुश नहीं रहीं और दूसरी तरफ साहिर लुधियानवी ने अपने माता पिता के रिश्ते की इतनी तल्खियाँ देखी थीं कि उनमें किसी नए रिश्ते की चाह बाकी नहीं रही थी लेकिन वो अमृता ही थीं जिसने साहिर के दिल में जगह बनाई।
बंटवारे के बाद अमृता अपने पति के साथ दिल्ली चली आईं और साहिर अपनी किस्मत आजमाने मुंबई पहुंच गए। साहिर ने हिंदी सिनेमा में गाने लिखकर खूब शोहरत कमाई। उनकी फिल्मों के गाने इतने मशहूर हुये कि फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। हालांकि दोनों के बीच खतों का सिलसिला चलता रहा। उनके पति प्रीतम सिंह को साहिर के साथ उनकी मुहब्बात की खबर लग चुकी थी। उनका अहंकार आहत हुआ । नादान उम्र में हुये बेमेल विवाह को इंकलाबी कवयित्री अमृता ने 1960 तक निभाया। जब घुटन बढ़ती चली गई कि सांस लेना भी मुश्किल होने लगा तो अमृता ने पति का घर छोड़ दिया और दिल्लीु में एक किराए के घर में अकेले रहने लगीं। इस बीच साहिर की जिंदगी में एक दूसरी महिला सुधा मल्होऔत्रा आयीं। साहिर और अमृता के बीच दूरियां बढ़ने लगीं। खतों के आने का सिलसिला पहले कम हुआ और फिर धीरे-धीरे बंद हो गया। अमृता पति को छोड़ चुकी थीं, इसी दौरान उनकी जिंदगी में इमरोज आये।

साहिर “वो अमृता प्रीतम थीं,वो आप की बहू बन सकती थीं”…
साहिर की जीवनी पर लिखी किताब “साहिर: ए पीपुल्स पोइट” जब लोगों के सामने आयी तो साहिर और अमृता के रिश्ते के बारे में लोगों को काफी कुछ जानने को मिला । किताब के लेखक अक्षय मानवानी बताते हैं कि अमृता वो इकलौती महिला थीं, जो साहिर को शादी के लिए मना सकती थीं। पर ये हो न सका ।

एक बार अमृता साहिर की माँ से मिलने दिल्ली भी आई हुयी थीं, जब अमृता वापस चली गयीं तो साहिर ने अपनी माँ से कहा था, ‘वो अमृता प्रीतम थी वो आप की बहू बन सकती थीं।’ लेकिन साहिर ने ये बात कभी भी अमृता से नहीं की और शायद साहिर की ये खामोशी ही थी कि जिसने अमृता के दिल में इमरोज़ के लिए जगह बनायी।

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Amrita Pritam Birth Anniversary:

जब इमरोज़ को अमृता प्रीतम से इश्क हुआ…
इमरोज़ पेशे से एक चित्रकार थे और दोनों की मुलाकात 1958 में हुयी । जहाँ साहिर और अमृता की मुलाकात एक मुशायरे के दौरान यूं हीं इत्तेफाक से हुयी थी वहीं इमरोज़ से अमृता की मुलाकात करवाई गई थी। एक दोस्त ने दोनों को मिलवाया था। जब इमरोज़ अमृता से मिले तो उन्हें अमृता से इश्क़ हो गया। इमरोज़ ने तब अमृता का साथ दिया जब साहिर की ज़िन्दगी में कोई और आ गया था। 1964 में जब अमृता-इमरोज़ ने एक साथ रहने का फैसला किया तो उन पर सामाजिक बंधनो को तोड़ने के लिये उलाहने दिए गए क्योंकि उस दौर में औरत-मर्द का बिना शादी के लिविन में रहना एक बड़ा फैसला हुआ करता था ,जिसकी नींव दोनों ने रखी ।
समाज के नियम तोड़ने पर जब अमृता प्रीतम से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि, ‘हम दोनों ने प्रेम के बंधन को और मजबूत किया है। जब शादी का आधार ही प्रेम है तो हमने कौन सा सामाजिक नियम या बंधन तोड़ा है? हमने तन, मन, कर्म और वचन के साथ निभाया है, जो शायद बहुत से दूसरे जोड़े नहीं कर पाते। हमने हर मुश्किल का सामना किया है, इकट्ठे और पूरी सच्चाई से इस रिश्ते को जिया है।’
Amrita Pritam Birth Anniversary:”मैं तुझे फिर मिलूंगी” इमरोज़ के लिये अमृता के एहसास…
साहिर और अमृता के प्रेम बारे में तो सभी जानते हैं लेकिन इमरोज़ का प्यार अमृता के लिये अनोखा था । न केवल उन्होंने अमृता को अपनाया था बल्कि वो साहिर के लिये अमृता के जज़्बातों और एहसासों को भी अपने दिल में जगह दी थी। इमरोज़ के साथ अमृता ने अपनी जिंदगी के आखिरी 40 साल एक साथ गुजारे थे। इमरोज़ अमृता की पेंटिंग भी बनाते और उनकी किताबों के कवर भी डिजाइन किया करते थे। इमरोज़ और अमृता एक छत के नीचे ज़रूर रहे मगर एक दूसरे के साथ नहीं थे । केवल इमरोज़ ही अमृता के साथ थे अमृता तो साहिर की ही थीं। “अमृता इमरोज़: एक प्रेम कहानी”जो उनकी ज़िंदगी पर आधारित एक किताब है । जिसमें दोनों के रिश्तों का जिक्र किया गया है। इमरोज़ अपने लेख “मुझे फिर मिलेगी अमृता” में लिखते हैं कि “कोई रिश्ता बांधने से नहीं बंधता न तो मैंने कभी अमृता से कहा कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ न कभी अमृता ने मुझसे।”
एक ही छत के नीचे दो अलग कमरे में दो प्यार करने वालों का बसेरा था। अपनी कविता “मैं तुझे फिर मिलूंगी” में अमृता ने इमरोज़ के लिये अपने एहसासों को कुछ इस तरह बयां किया…
मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ कैसे पता नहीं
शायद तेरे कल्पनाओं
की प्रेरणा बन
तेरे कैनवास पर उतरुँगी
या तेरे कैनवास पर
एक रहस्यमयी लकीर बन
ख़ामोश तुझे देखती रहूँगी
मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ कैसे पता नहीं…
जब अमृता इमरोज की पीठ पर ‘साहिर’ का नाम लिख दिया करती थीं…
इमरोज़ अमृता से बेइन्तिहां मोहब्बत करते थे लेकिन अमृता दिल तो केवल साहिर के लिये धड़कता था।उनके दिलो-दिमाग पर केवल साहिर का राज था। कहा तो ये भी जाता है कि जब अमृता इमरोज के पीछे स्कूकटर पर बैठी सफर के दौरान साहिर के ख्यालों में गुम होतीं तो इमरोज की पीठ पर अंगुलियां फेरकर ‘साहिर’ का नाम लिख दिया करती थीं। दोनों की मोहब्बत अधूरी रही और इस मोहब्बत के गवाह थे वो आधी जली सिगरेट के टुकड़े औऱ चाय का जूठा प्याला और ढेर सारे वो खत।
मौत ने अपना फ़ैसला उसी बैज को पढ़कर किया है, जो मेरे नाम का था…
अमृता प्रीतम के मन में साहिर के लिए जो जज़्बात थे, उसे उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ में खुलकर बयान किया है लेकिन सबसे मुश्किल वक्त अमृता की ज़िन्दगी में तब आया जब उन्होंने साहिर के निधन की ख़बर सुनी।असल ज़िंदगी में साहिर का नाम अमृता प्रीतम के बाद गायिका सुधा मल्होत्रा के साथ जोड़कर लिया गया। उन पर किताब लिख चुके अक्षय मनवानी ने साहिर के कॉलेज के दिनों का भी ज़िक्र किया है जहां वह कहते हैं कि साहिर की प्रेमिका की मौत हो गई थी। प्रेम के कई रिश्तों के बावजूद, शादी ना होने की वजह से, दुनिया की नज़रों में साहिर हमेशा ही अकेले रहे।
जब इनकी मौत की खबर अमृता ने सुनी तो उन पलों को अमृता ने रसीदी टिकट में कुछ यूं जिक्र किया है कि “पचीस और छब्बीस अक्टूबर की रात को दो बजे जब फ़ोन आया कि साहिर नहीं रहे, तो पूरे बीस दिन पहले की वह रात, उस रात में मिल गई, जब मैं बल्गारिया में थी। डॉक्टरों ने कहा था कि दिल की तरफ़ से मुझे ख़तरा है, और उस रात मैंने नज़्म लिखी थी, “अज्ज आपणे दिल दरिया दे विच्च मैं आपणे फुल्ल प्रवाहे…” अचानक मैं अपने हाथों की ओर देखने लगी कि इन हाथों से मैंने अपने दिल के दरिया में अपनी हड्डियां प्रवाहित की थीं, पर हड्डियां बदल कैसे गईं ? यह बुलावा मौत को लग गया कि हाथों को …”
अमृता साहिर को याद करते हुये कहती हैं कि “जब दिल्ली में पहली बार एशियन राइटर्स क़ॉन्फ्रेन्स हुई थी, तो शायरों-अदीबों को उनके नाम के बैज मिले थे, जिसे सब अपने कोट पर लगाए हुये थे लेकिन साहिर ने अपने कोट पर से अपने नाम का बैज उतार कर अमृता के कोट पर लगा दिया था और मेरे कोट पर से मेरे नाम का बैज उतार कर अपने कोट पर लगा दिया था। उस समय जब किसी की नज़र उन पर पड़ी तो उन्होंने कहा था कि हमने गलत बैज लगा रखे हैं तो मुझे याद है साहिर हंस पड़े थे कि बैज देने वाले से गलती हो गई होगी, पर इस ‘गलती’ को हमें न दुरुस्त करना था, न और न ही हमने किया। बरसों बाद जब रात को दो बजे जब साहिर के जाने की ख़बर सुनी, तो लगा जैसे मौत ने अपना फ़ैसला उसी बैज को पढ़कर किया है, जो मेरे नाम का था, पर साहिर के कोट पर लगा हुआ था।”

Amrita Pritam Birth Anniversary: अमृता अपनी आत्माकथा ‘रसीदी टिकट’ में लिखती हैं, “एक सपना था कि एक बहुत बड़ा किला है और लोग मुझे उसमें बंद कर देते हैं, बाहर पहरा होता है,भीतर कोई दरवाजा नहीं मिलता, मैं किले की दीवारों को उंगलियों से टटोलती रहती हूँ। पर पत्थर की दीवारों का कोई हिस्सा भी नहीं पिघलता। सारा किला टटोल–टटोलकर जब कोई दरवाजा नहीं मिलता, तो मैं सारा जोर लगाकर उड़ने की कोशिश करने लगती हूं। मेरी बांहों का इतना जोर लगता है कि मेरी सांस चढ़ जाती है.” यह पंक्तियां अमृता के संघर्षों की गवाह है, जो उनकी ज़िंदगी का हिस्सा रहीं। अमृता प्रीतम एक दकियानूसी, पिछड़े और सामंती देश में प्रेम, विवाह और रिश्तोंी की नई परिभाषा गढ़ती हैं, नई मिसालें पेश करती हैं ।अगर अनके इस सफर को देखें तो आपको पता चलेगा कि एक शादीशुदा औरत और दो बच्चोंभ की मां, जिसकी नादान उम्र में शादी कर दी गयी हो उसके लिए लिखना आसान नहीं था। वो अपने जीवन की हर एक चुनौती को धता बताकर, हर एक बंदिश को तोड़कर रोज एक नया कदम बढ़ाती ही गयीं।
अमृता प्रीतम और इमरोज़ की दोस्त उमा त्रिलोक ने दोनों के खतों को एक साथ समेटकर एक किताब लिखी “खतों का सफरनामा” इस किताब में दिए गए अमृता-इमरोज़ के वह मोहब्बत भरे खत हैं, जो इन दोनों की प्यार भरी जिंदगी के अंदर झांकने के लिए एक झरोखा हैं।इस किताब में अमृता-इमरोज़ को कुछ खास संबोधन के साथ बुलाते थे। कभी वो उन्हें ‘आशी’,कभी ‘बरकते’,कभी ‘माजा’ तो कभी ‘ज़ोरबी’ कहकर बुलाते थे।
1966 और 1967 में अमृता प्रीतम ने रोमानिया, बल्गारिया, मॉस्को, यूगोस्लाविया, जर्मनी और तेहरान की यात्राएं कीं और वहां से इमरोज़ को खूबसूरत खत लिखा करती थीं। इन खतों में वो शहर की खूबसूरती का जिक्र भी किया करती थीं , वहां के लोगों के बारे में, चीज़ों के दामों के बारे में भी खुल के लिखा करती थीं और ये भी बतातीं की वो अपनी पसंदीदा चाय को काफी मिस करती हैं।इमरोज़ को दिये गये खतों में से एक खत में अमृता लिखती हैं कि, ‘बैलग्रेड की चमक-दमक के बाद हंगरी की प्राचीन और समय की धूल से मैली इमारतें बहुच चुप और उदास लगती हैं।तो वहीं अपने दूसरे खतों में अमृता यूगोस्लाविया की मूर्तिकला पर बात करती हैं और 1944 में जर्मन फौज ने किस तरह बैलग्रेड के लोगों का एक ही दिन में कत्ल कर दिया था, उसका भी जिक्र करती हैं।
Amrita Pritam Birth Anniversary: गुलज़ार “उनका रिश्ता नज़्म और इमेज का रिश्ता है”…
मशहूर लेखक और शायर गुलज़ार ने उमा त्रिलोक की किताब में कहते है कि, ‘अमृता पंजाबी शायरी में बंटवारे के बाद की आधी सदी की नुमाइंदा शायरा हैं। शायरी के अलावा दुपट्टे की एक गिठ्ठा में नॉवेल और अफसाने बांध कर वे भी कंधों पर फेंक लिए हैं और मुहब्बत का एक ऐसा दुशाला ओढ़ लिया है जो इमरोज़ की निध से महकता रहता है। अब कौन बताए कि दुशाले ने उन्हें ओढ़ रखा है या वे दुशाले को जफ्फी मारे रहती हैं?’
तो वहीं अमृता-इमरोज़ के रिश्ते के बारे में गुलजार आगे कहते हैं कि, “उनका रिश्ता नज़्म और इमेज का रिश्ता है। अमृता जी की नज़्में पेंटिंग की तरह खुशरंग हैं, फिर चाहे वे दर्द की आवाज़ हों या दिलासे की। इसी तरह इमरोज़ की पेंटिंग नज़्मों के आबे-हयात पर तैरती हैं।”
अमृता प्रीतम ने अपने दुखों को चाहे वो बंटवारे का हो या एक स्त्री के मन को टटोलना सभी को अपने साहित्यिक किरदारों में न केवल ढाला बल्कि खुद भी उस दर्द से गुजरीं बस तसल्ली इतनी सी थी की उनके जीवन में इमरोज़ जैसा हमसफऱ उन्हें मिला। अमृता के आखिरी दिनों में इमरोज़ ने उनकी खूब सेवा की और जीवन के आखिरी पलों में भी अमृता का हाथ नहीं छोड़ा। अमृता के साथ रहते-रहते इमरोज़ भी अच्छी कविता लिखने लगे थे। उन्होंने अमृता के लिए लिखा था…
वह कविता जीती औऱ ज़िंदगी लिखती
औऱ नदी सी चुपचाप बहती
ज़रखेज़ी बांटती
जा रही है सागर की ओर सागर बनने
अमृता प्रीतम ने एक प्रगतिशील और मज़बूत औरत के तौर पर लेखनी का अपना संसार रचा औऱ जिया भी ,जहाँ साहिर इनके जीवन का आधार बने ,तो वहीं उन्होंने इमरोज़ के रूप में अपने जीवन की बगिया में अनोखा प्रेम भी पाया । 31 अक्टूबर 2005 में 86 वर्ष की उम्र में अमृता प्रीतम दुनिया से रूखसत हुयीं औऱ इसी के साथ छोड़ गयीं अपने पीछे प्रेम और नारीवाद की ऐसी मज़बूत विरासत जिसे लोग सदियों तक याद रखेंगे।

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