गोबर-गोमूत्र से बनेगी ‘सुपर ऑर्गेनिक खाद’, IIT कानपुर की तकनीक से खेती में आएगी नई क्रांति

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उत्तर प्रदेश में गो संरक्षण और प्राकृतिक खेती को आधुनिक विज्ञान से जोड़ने की दिशा में एक बड़ी पहल सामने आई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश सरकार अब गोबर, गोमूत्र और माइक्रोबियल रिसर्च आधारित अत्याधुनिक तकनीक के जरिए खेती में नई क्रांति लाने की तैयारी कर रही है।

आईआईटी कानपुर के शोधार्थियों द्वारा विकसित नई तकनीक से ऐसी ऑर्गेनिक खाद तैयार की गई है, जिसे पारंपरिक जैविक खाद की तुलना में लगभग 15 गुना अधिक प्रभावशाली बताया जा रहा है। यही नहीं, इसकी पोषण क्षमता करीब पांच गुना अधिक है और इसे तैयार करने में लगने वाला समय भी सामान्य जैविक खाद की तुलना में बेहद कम होगा।

सरकार इसे केवल कृषि सुधार तक सीमित नहीं मान रही, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, गो संरक्षण और महिला रोजगार से जुड़े बड़े मॉडल के रूप में विकसित करने की योजना बना रही है।

IIT कानपुर की रिसर्च से खुला नई खेती का रास्ता

यह तकनीक आईआईटी कानपुर के पीएचडी शोधार्थी अक्षय श्रीवास्तव और उनकी टीम द्वारा विकसित की गई है। शोध में जेनेटिक इंजीनियरिंग, माइक्रोबियल आइसोलेशन, एंजाइम एक्सट्रैक्शन और बायोपॉलिमर तकनीक का उपयोग कर गोबर और गोमूत्र आधारित उच्च गुणवत्ता वाला जैविक उर्वरक तैयार किया गया है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, केवल 1 किलोग्राम माइक्रोबियल कॉन्सन्ट्रेट की मदद से लगभग 2000 किलोग्राम जैविक खाद तैयार की जा सकती है। यह तकनीक खेती की लागत कम करने के साथ मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में भी मददगार होगी।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह उर्वरक फसल-विशिष्ट माइक्रोबियल संरचना पर आधारित है, जिससे विभिन्न फसलों की जरूरत के अनुसार पोषण क्षमता विकसित की जा सकती है।

कम लागत, ज्यादा उत्पादन का दावा

नई तकनीक से तैयार खाद की सबसे बड़ी खासियत इसकी दक्षता मानी जा रही है। जहां पारंपरिक जैविक खाद की बड़ी मात्रा खेतों में डालनी पड़ती है, वहीं इस उर्वरक की आवश्यकता लगभग 350 से 400 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक बताई गई है।

इससे किसानों की परिवहन लागत, श्रम खर्च और भंडारण संबंधी परेशानियां भी कम होंगी। शुरुआती चरण में 50 किलोग्राम वाले ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर बैग तैयार करने की योजना बनाई गई है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि इस उत्पाद को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा 40 से अधिक गुणवत्ता मानकों पर परीक्षण के बाद प्रमाणित भी किया जा चुका है।

गोशालाएं बनेंगी आत्मनिर्भर आर्थिक केंद्र

योगी सरकार इस तकनीक को गो आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था के मॉडल के रूप में विकसित करना चाहती है। इसके तहत प्रदेश की गोशालाओं को केवल पशु संरक्षण केंद्र नहीं, बल्कि जैविक खाद उत्पादन और बायोगैस निर्माण के हब के रूप में विकसित करने की योजना बनाई जा रही है।

गोबर, गोमूत्र और कृषि अपशिष्ट से हाई क्वालिटी जैविक उर्वरक तैयार करने के लिए विभिन्न जिलों में माइक्रोबियल प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित की जा रही हैं।

बायोगैस उत्पादन के बाद बचने वाली स्लरी और वेस्ट बायोमास से मात्र तीन से चार दिनों में उच्च गुणवत्ता वाली खाद तैयार की जा रही है।

महिलाओं और किसानों को मिलेगा नया रोजगार

इस परियोजना में महिला स्वयं सहायता समूहों, किसान उत्पादक संगठनों (FPO) और स्थानीय किसानों को जोड़ने की योजना बनाई गई है।

महिला समूहों को खाद उत्पादन, पैकेजिंग और वितरण से संबंधित प्रशिक्षण दिया जाएगा, जिससे गांवों में स्वरोजगार और उद्यमिता को बढ़ावा मिलेगा।

सरकार का मानना है कि यह मॉडल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने और कृषि अपशिष्ट प्रबंधन की समस्या को हल करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

उत्तर प्रदेश बन सकता है राष्ट्रीय मॉडल

उत्तर प्रदेश गो सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता के अनुसार, यदि यह परियोजना बड़े स्तर पर सफल होती है तो उत्तर प्रदेश देश में गो आधारित वैज्ञानिक खेती और ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर टेक्नोलॉजी का सबसे बड़ा केंद्र बन सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि विज्ञान, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के इस संगम से प्रदेश में टिकाऊ खेती का नया मॉडल विकसित होगा, जिसका असर आने वाले वर्षों में पूरे देश की कृषि नीति पर भी दिखाई दे सकता है।