Stubble Burning: हर साल अक्टूबर के महीने से जैसे ही ठंड दस्तक देना शुरू करती है, दिल्ली-एनसीआर की वायु गुणवत्ता का स्तर बद से बदतर होने लगता है। यहां बढ़ते प्रदूषण में सबसे बड़ा रोल दिल्ली से सटे आस-पास के क्षेत्रों में पराली जलाने का माना जाता है। यहां सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर यह पराली क्या होती है और प्रदूषण को बढ़ाने में इसका कितना रोल है? इस स्टोरी में हम इस विषय से जुड़े सभी सवालों का जवाब आपको देंगे…

Stubble Burning: क्या होती है पराली?
धान जैसी कोई फसल जब काटी जाती है तो उसे जड़ से नहीं उखाड़ा जाता है, बल्कि इसे जड़ के ऊपर का कुछ इंच का हिस्सा छोड़ कर काटा जाता है ऐसा मशीन की कटाई में ज्यादा देखने को मिलता है। अब यही छूटा हुआ हिस्सा खेतों से हटाना आसान नहीं होता, तो इसके लिए किसानों के पास सबसे सरल उपाय यही होता है कि इस बचे हुए हिस्से को जला दिया जाए, जिससे कि खेत को रबी, विशेष कर गेंहू की फसल की बुआई के लिए तुरंत तैयार किया जा सके।
क्यों जलाई जाती हैं पराली?
चूंकि फसल को जड़ से नहीं काटा जाता है, इसलिए उसका निचला हिस्सा खेत में ही रह जाता है। अब इसे अपने आप सड़ कर खत्म होने में लगभग 1 से डेढ़ महीने का वक्त चाहिए होता है, लेकिन किसानों के पास इतना समय नहीं होता है कि वे इसका इंतजार करें क्योंकि उन्हें अगली फसल के लिए मिट्टी को तैयार करना होता है। ऐसे में उनके पास विकल्प उस बचे हुए हिस्से को जलाने का ही बचता है।

पराली के जलने से क्या है नुकसान?
पराली जलने से कार्बन मोनोऑक्साइड और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसे निकलती हैं जिनसे गंभीर वायु प्रदूषण होता है। इसका मानव स्वास्थ्य पर गंभीर असर भी होता है। इससे त्वचा और आंखों में जलन, गंभीर तंत्रिका संबंधी, हृदय संबंधी और श्वसन रोग हो सकते हैं। इनमें अस्थमा, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मनरी डिसीज (COPD), ब्रोंकाइटिस, फेफड़ों की क्षमता का क्षरण और कैंसर जैसी बीमारियां तक हो सकती हैं। इसके जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बनिक कंपाउंड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन जैसी प्रदूषित गैसे पैदा होती हैं।
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