UP News: राज्य के 97 हजार गांवों में महिलाएं संभाल रहीं जल गुणवत्ता की जिम्मेदारी, स्वच्छ जलापूर्ति में निभा रहीं अहम भूमिका

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प्रतीकात्मक तस्वीर(AI)
प्रतीकात्मक तस्वीर(AI)

UP News: उत्तर प्रदेश में जल जीवन मिशन अब सिर्फ हर घर तक नल से जल पहुंचाने की योजना नहीं रह गया है, बल्कि यह महिला सशक्तीकरण और ग्रामीण स्वावलंबन का बड़ा माध्यम भी बनता जा रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश सरकार ने फील्ड टेस्टिंग किट (एफटीके) अभियान को गांवों में स्वच्छ जलापूर्ति सुनिश्चित करने के साथ महिलाओं को तकनीकी रूप से सक्षम बनाने से जोड़ दिया है।

प्रदेश के 97 हजार से अधिक गांवों में प्रशिक्षित महिला समूह अब पेयजल की गुणवत्ता जांचने की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। ये महिलाएं गांवों में घर-घर पहुंच रहे पानी की जांच कर रही हैं और दूषित जल स्रोतों की पहचान कर विभाग को तत्काल जानकारी दे रही हैं। इससे जलजनित बीमारियों की रोकथाम में भी मदद मिल रही है।

नमामि गंगे एवं ग्रामीण जलापूर्ति विभाग के विशेष सचिव और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर प्रभास कुमार के मुताबिक, प्रदेश की लगभग सभी ग्राम पंचायतों और राजस्व गांवों में पांच-पांच महिलाओं के समूह तैयार किए गए हैं, जिन्हें फील्ड टेस्टिंग किट उपलब्ध कराई गई है। वर्तमान में करीब 97,070 गांवों में महिलाएं सक्रिय रूप से जल गुणवत्ता परीक्षण का कार्य कर रही हैं।

गांव में ही हो रही पानी की जांच

पहले ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की जांच के लिए लोगों को लंबा इंतजार करना पड़ता था। कई बार प्रयोगशाला रिपोर्ट आने में काफी समय लग जाता था। अब एफटीके के जरिए गांव स्तर पर ही पानी की प्राथमिक जांच संभव हो रही है।

महिलाएं पाइपलाइन, हैंडपंप, ट्यूबवेल और अन्य पेयजल स्रोतों से नमूने लेकर उनमें मौजूद हानिकारक रसायनों और बैक्टीरिया की जांच कर रही हैं। यदि किसी स्रोत का पानी संदिग्ध पाया जाता है तो इसकी सूचना तुरंत विभाग तक पहुंचाई जाती है, जिससे समय रहते कार्रवाई की जा सके।

सरकार का मानना है कि इससे ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता मजबूत हुई है और जलजनित बीमारियों पर नियंत्रण में भी मदद मिली है।

महिलाओं के लिए बना अतिरिक्त आय का जरिया

यह अभियान ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण का भी बड़ा माध्यम बन रहा है। जल गुणवत्ता परीक्षण करने वाली महिलाओं को प्रति जांच के हिसाब से मानदेय दिया जा रहा है।

विभागीय व्यवस्था के अनुसार प्रति जांच 20 रुपये की दर तय की गई है और अधिकतम 20 जांचों के लिए 400 रुपये तक भुगतान किया जाता है। इससे ग्रामीण महिलाओं को अतिरिक्त आय का अवसर मिल रहा है और स्वरोजगार के नए रास्ते भी खुल रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस पहल ने महिलाओं की सामाजिक भागीदारी को भी बढ़ाया है। अब महिलाएं केवल घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि तकनीकी कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

तकनीकी प्रशिक्षण से बढ़ा आत्मविश्वास

महिलाओं को इस जिम्मेदारी के लिए विशेष तकनीकी प्रशिक्षण भी दिया गया है। ‘जल गुणवत्ता निगरानी एवं सर्विलांस कार्यक्रम’ के तहत उन्हें एफटीके के उपयोग, जल नमूना संग्रहण, विभिन्न पैरामीटर्स की जांच और रिपोर्टिंग प्रक्रिया की जानकारी दी गई है।

प्रशिक्षण के दौरान महिलाओं को मोबाइल ऐप और रजिस्टर में रिपोर्ट दर्ज करने की प्रक्रिया भी सिखाई गई है। साथ ही सुरक्षित पेयजल, स्वच्छता और स्वास्थ्य से जुड़े मानकों की जानकारी भी दी गई।

सरकार का दावा है कि यह मॉडल गांवों में स्वच्छ जलापूर्ति और महिला आत्मनिर्भरता—दोनों लक्ष्यों को एक साथ मजबूत कर रहा है।