एक समय प्रदूषण, सीवर डिस्चार्ज और खराब जल गुणवत्ता की पहचान बन चुकी गंगा नदी अब उत्तर प्रदेश में पुनर्जीवन की नई कहानी लिख रही है। नमामि गंगे अभियान के तहत उत्तर प्रदेश देश के सबसे बड़े नदी पुनर्स्थापन मॉडल के रूप में उभरकर सामने आया है।
राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) के तहत राज्य में सीवेज अवसंरचना के लिए ₹16,201 करोड़ का निवेश स्वीकृत किया गया है, जो देशभर में मंजूर कुल निवेश का लगभग 45 प्रतिशत माना जा रहा है। यह आंकड़ा न सिर्फ उत्तर प्रदेश की प्राथमिकता को दर्शाता है, बल्कि गंगा संरक्षण के प्रति सरकार की दीर्घकालिक रणनीति को भी मजबूत करता है।
80 परियोजनाओं से बदली गंगा की तस्वीर
नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत उत्तर प्रदेश में कुल 80 परियोजनाएं स्वीकृत की गई थीं। इनमें से 53 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं, जबकि शेष परियोजनाओं पर तेजी से काम जारी है।
इन योजनाओं के तहत 2,701 MLD (मिलियन लीटर प्रतिदिन) सीवेज उपचार क्षमता विकसित की जानी है, जिसमें से 1,520 MLD क्षमता पहले ही संचालन में आ चुकी है।
गंगा का सबसे लंबा प्रवाह क्षेत्र उत्तर प्रदेश में होने के कारण यहां दशकों से भारी प्रदूषण का दबाव था, लेकिन अब सरकारी आंकड़े और स्वतंत्र एजेंसियों की रिपोर्ट इस बदलाव की पुष्टि कर रही हैं।
CPCB रिपोर्ट में दर्ज हुआ ऐतिहासिक सुधार
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की 2025 रिपोर्ट के मुताबिक कन्नौज से वाराणसी तक गंगा का वह हिस्सा, जिसे पहले “प्राथमिकता-IV” प्रदूषित श्रेणी में रखा गया था, अब लगातार प्रदूषित श्रेणी से बाहर हो चुका है।
अब गंगा में प्रदूषण केवल तीन छोटे हिस्सों—फर्रुखाबाद से पुराना राजापुर, डालमऊ और मिर्जापुर डाउनस्ट्रीम से तारीघाट—तक सीमित रह गया है। इन्हें “प्राथमिकता-V” श्रेणी में रखा गया है, जो लगभग अप्रदूषित स्थिति से ठीक पहले की श्रेणी मानी जाती है।
राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के उपमहानिदेशक नलिन कुमार श्रीवास्तव के अनुसार, उत्तर प्रदेश में गंगा की मुख्य धारा का अधिकांश भाग अब स्नान-योग्य BOD मानकों को पूरा कर रहा है।
शहरों में आधुनिक सीवेज नेटवर्क का विस्तार
वाराणसी, प्रयागराज, कानपुर, आगरा, मथुरा, वृंदावन, मुरादाबाद और बिजनौर समेत प्रदेश के कई प्रमुख शहरों में आधुनिक सीवेज नेटवर्क और STP परियोजनाएं युद्धस्तर पर विकसित की जा रही हैं।
वाराणसी के अस्सी-BHU क्षेत्र में 55 MLD क्षमता वाला STP लगभग 18 लाख लोगों के सीवेज का उपचार कर रहा है। वहीं आगरा में 31 MLD और 35 MLD क्षमता वाले संयंत्र लाखों नागरिकों को राहत दे रहे हैं।
जाजमऊ और मथुरा के CETP पहले से संचालित हैं, जबकि उन्नाव के बंथर CETP का निर्माण तेजी से चल रहा है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य बिना उपचार के गंगा में गिरने वाले सीवर प्रवाह को रोकना है।
प्रयागराज बना ‘ग्रीन STP मॉडल’ की मिसाल
नमामि गंगे चरण-II के तहत प्रयागराज में विकसित “ग्रीन STP मॉडल” अब देशभर में चर्चा का विषय बन गया है।
संगम नगरी के कई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट अब अपनी बिजली की जरूरतें खुद पूरी कर रहे हैं। 80 MLD नैनी STP प्रतिदिन 5,900 यूनिट बिजली सौर ऊर्जा और बायोगैस से पैदा कर रहा है, जबकि 42 MLD नैनी STP का सोलर प्लांट रोज 3,850 यूनिट बिजली बना रहा है।
महाकुंभ 2025 के दौरान करोड़ों श्रद्धालुओं की मौजूदगी के बावजूद इन संयंत्रों ने लगातार काम कर यह साबित किया कि ऊर्जा-सकारात्मक सीवेज मॉडल भविष्य के शहरी भारत के लिए कारगर समाधान बन सकते हैं।
अब लक्ष्य ‘शून्य प्रदूषण’
सरकार ने गंगा के शेष प्रदूषित हिस्सों की पहचान कर उन्हें नई परियोजनाओं में शामिल कर लिया है। आने वाले चरणों में इन क्षेत्रों में तेज निर्माण, निवेश और सघन निगरानी अभियान चलाए जाएंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही गति बनी रही, तो आने वाले वर्षों में गंगा को पूरी तरह प्रदूषणमुक्त बनाने का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।









