Holi: फाल्गुन मास के आगाज होते ही देश में होली का खुमार शुरू हो जाता है। विभिन्नताओं में एकता वाले देश में होली के कई रंग देखे जा सकते हैं। फिर बात बांके बिहारी जी की ब्रज की होली की हो, या अवध की। रंग बिरंगे पर्व को मनाने का अंदाज हर जगह जुदा है। बावजूद इसके सभी के अंदर छिपा है बहुत सा प्यार, अपनापन और उत्साह। इस साल भी होली अपने रंगों से सभी को सराबोर करने के लिए आ रही है।
देश के अलग- अलग हिस्सों में इसकी धूम मचनी भी शुरू हो चुकी है। बरसाने की लठमार होली, लड्डुओं की होली, कुमाऊं की प्रादेशिक खड़ी और बैठकी होली, अवध की फाग, बिहार की फगुआ, महाराष्ट्र की रंग पंचमी और बनारस की चिता भस्म होली। इसके इतने परंपरागत नाम और मनाने के तरीके हैं, कि कुछ भी कहना मुश्किल है। यही वजह है कि हमारी बॉलीवुड फिल्मों के सुपरहिट गाने भी होली की मस्ती दोगुनी कर देते हैं। बीते 2 वर्षों से रंगों के इस पर्व की धूम कोरोना महामारी के चलते फीकी पड़ गई, लेकिन इस वर्ष होली सभी को अपने रंग से सराबोर करने आ रही है।

Holi: मथुरा में फुलेरा दूज के साथ होली का आगाज
4 मार्च को मथुरा और वृंदावन में फुलैरा दूज का पर्व मनाया गया। इसी दिन से यहां 16 दिन मनाई जाने वाली होली की शुरुआत हो गई। फुलैरा दूज पर लोग श्री कृष्ण और राधारानी के संग फूलों की होली खेलते हैं। इसके बाद 10 मार्च को फाग आमंत्रण पर्व मनाया जाएगा। इस दिन बरसाना की गोपियां नंदगांव के हुरयारों को फाग का निमंत्रण भेजती हैं। ये फाल्गुन के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को भेजा जाता है। इस बार ये तिथि 10 मार्च को पड़ रही है। इसी दिन नंदगांव में श्री लाडिली जी मंदिर में लड्डू होली मनाई जाएगी ये पर्व नंदगांव में फाग निमंत्रण भेजने और उसे स्वीकार करने की खुशी में मनाया जाता है।

Holi: ब्रज की लठमार होली
भगवान श्रीकृष्ण की पावन भूमि ब्रज और होली का नाता बरसों पुराना है। हमारे शास्त्रों में यहां की प्राचीन विरासत यानी लठमार होली की बात ही अलग है।होली ब्रज के बरसाना क्षेत्र में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। ऐसी मान्यता है, कि प्राचीन समय में श्रीकृष्ण अपने गांव गोकुल से खासतौर से होली खेलने बरसाना गांव आते थे।
बरसाना गांव राधा रानी की जन्मस्थली। तभी से हर वर्ष ये परंपरा बन गई है, कि नंद गांव और गोकुल से पुरुष आज भी बरसाना होली खेलने के लिए पहुंचते हैं और खूब मस्ती करते हैं। वहीं बरसाने की महिलाएं अपनी लट्ठ के प्रहार से उन्हें चोटिल करतीं हैं। बड़ा मजेदार होता है दोनों पक्षों के बीच की हंसी ठिठोली। बरसाने की लट्ठमार होली आज देश ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर है। उन्हीं घटनाओं को जीवंत रूप देने के उद्देश्य से बरसाने की लट्ठमार होली आजतक लोकप्रिय है। इसमें आज भी बरसाने की महिलाएं उन पर एक बड़े लट्ठ से वार करती हैं, पुरुष ढाल के माध्यम से स्वयं को बचाते हुए नजर आते हैं।होली का आगाज इस बार मथुरा और वृंदावन में 4 मार्च से शुरू हो चुका है। इस बार 11 मार्च से बरसाने की गलियों में लट्ठमार होली की दस्तक होगी।

Holi: इन तिथियों के साथ होली 2022 की धूम
- 4 मार्च, शुक्रवार: फुलैरा दूज
- 10 मार्च, गुरुवार: नंदगांव में फाग आमंत्रण महोत्सव, बरसाना में लड्डू होली, होलाष्टक प्रारंभ
- 11 मार्च, शुक्रवार: बरसाना में लट्ठमार होली
- 12 मार्च, शनिवार: नंदगांव में लट्ठमार होली
- 14 मार्च, सोमवार: रंगभरी एकादशी
- 17 मार्च, गुरुवार: होलिका दहन, छोटी होली
- 18 मार्च, शुक्रवार: होली उत्सव
Holi: रंगभरी एकादशी से काशी में उड़ेगा गुलाल
बाबा विश्वनाथ जी की पावन नगरी काशी में होली का आगाज 14 मार्च से शुरू हो जाएगा। दरअसल इस वर्ष रंगभरी एकादशी 14 मार्च को है। इस दिन की मान्यता काफी ज्यादा है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती काशी विश्वनाथ मंदिर में रंग गुलाल खेलते हैं। इसलिए इस दिन काशी में हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है और रंगभरी एकादशी से सभी सराबोर हो जाते हैं।

Holi: कुमाऊं के अंचल में बैठकी होली का दौर शुरू
कुमाऊंनी होली के तीन प्रारूप माने जाते हैं। जिनमें बैठकी होली, खड़ी होली और महिला होली मनाई जाती है। इस होली में सिर्फ अबीर-गुलाल का टीका ही नहीं होता, वरन बैठकी होली और खड़ी होली गायन की शास्त्रीय परंपरा भी शामिल होती है। बसंत पंचमी के दिन से ही होल्यार प्रत्येक शाम घर-घर जाकर होली गाते हैं, और यह उत्सव लगभग 2 महीनों तक चलता है। बसंत पंचमी से ही कुमाऊं में लोग एक दूसरे के घर जाकर बैठकी होली मनाते हैं ।
इस दौरान श्रीकृष्ण राधा के होली गीत, श्रीराम चंद्र जी के अवध के गीत शास्त्रीय अंदाज से गाकर धमाल मचाते हैं। इस दौरान खास व्यंजन आलू के गुटके और हरी चटनी, पकौड़ी और गुजिया खिलाकर सभी का मुंह मीठा करते हैं। वहीं पारंपरिक होली के दूसरे रूप में खड़ी होली जिसे यहां छलड़ी भी कहते हैं, मनाई जाती है। लोग रंग, अबील और गुलाल लगाकर बधाई देते हैं और पानी फेंकते हैं। वहीं यहां की महिलाएं अपनी टोली बनाकर जगह-जगह जाकर होली के गीत गाकर ढोलक की थाप पर जमकर नाचतीं हैं।

Holi: हरियाणा की धुलैंडी और राजस्थान की पत्थर मार होली भी है खास
आमतौर पर पानी की होली हरियाणा में धुलैंडी के नाम से प्रख्यात है। ये एक भाभी और देवर के बीच खेली जाने वाली होली होती हैं। इसमें देवर अपनी भाभी को रंग लगाने का प्रयास करते हैं, वही भाभियां अपने देवर पर लाठी चलाती हैं। कई महिलाएं सूती कपड़े को कई परतों पर मोड़कर एक कौड़ा तैयार कर उससे देवर पर वार करतीं हैं।
देवरों को लाठी के वार से बचकर अपनी भाभी को रंग लगाना होता है। वहीं पत्थरों की होली राजस्थान के बाड़मेर और डूंगरपुर जिलों में आदिवासी लोगों के द्वारा खेली जाती है। इसमें उनके पारंपरिक गीत गाए जाते हैं और ढोल-नगाड़े बजाये जाते हैं। दो गावों या समुदाय के लोग एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े हो जाते हैं और पत्थर बरसाते हैं। जैसे-जैसे ढोल-नगाड़ों की आवाज तेज होती जाती है वैसे-वैसे ही एक-दूसरे पर पत्थर चलाने का सिलसिला भी तेज होता जाता हैं। पत्थरों की मार से बचने के लिए लोग सिर पर पगड़ी और भारी कपड़े पहनते हैं।

कोरोना का खतरा अभी टला नहीं, संभलकर खेलें हर्बल होली
इस साल होली खेलने के दौरान अपना बेहद ध्यान रखें, याद रहे, कि कोरोना का खतरा अभी टला नहीं है। लिहाजा सावधान और सतर्क रहकर पर्व मनाएं। होली पर रसायनयुक्त रंगों की जगह टेसू, फूल और हर्बल रंगों का इस्तेमाल करें। ये किसी के लिए नुकसादनदायक नहीं हैं। ये रंग चंदन, हल्दी, सूखे फूलों से तैयार किए जाने के कारण पूरी तरह से इको फ्रेंडली होते हैं।
फरीदाबाद स्थित सुप्रीम हॉस्पीटल की नेत्र रोग विशेषज्ञ डा पूनम राणा का कहना है, कि होली के रंग में भंग न हो इस बात पर ध्यान रखें। बच्चों को ऐसे रंग या स्प्रे न दें। जिससे किसी को एलर्जी हो, होली खेलने से पूर्व सिर, हाथ और पैरों में नारियल का तेल लगा सकते हैं। एक -दूसरे को रंग लगाते समय इस बात का ध्यान रखें, कि उनकी आंखों के अंदर रंग ना जाए। रंग के आंख में जाने पर साफ पानी से धोएं। जलन होने पर आंखों को रगड़े नहीं, शीघ्र डॉक्टर से संपर्क करें। किसी पशु पर भी बेवजह रंग और गुब्बारे न मारें। ये परस्पर प्रेम का त्योहार है, न कि द्वेष भाव का।
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