गुजरात हाईकोर्ट ने फिल्म धुरंधर में बलोच समुदाय के खिलाफ कथित आपत्तिजनक संवादों को लेकर दायर याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने माना कि जिन शब्दों पर आपत्ति जताई गई थी, उन्हें फिल्म से म्यूट कर दिया गया है, ऐसे में याचिका आगे विचार के योग्य नहीं रह जाती।
यह याचिका बलोच समुदाय से जुड़े दो व्यक्तियों द्वारा दायर की गई थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि फिल्म के एक संवाद में बलोच समुदाय का स्पष्ट उल्लेख करते हुए उन्हें अपमानजनक, भड़काऊ और घृणास्पद तरीके से प्रस्तुत किया गया है, जिससे पूरे समुदाय की छवि धूमिल होती है। याचिका में कहा गया था कि इस तरह के संवाद न केवल सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि मानव गरिमा और समानता के संवैधानिक सिद्धांतों का भी उल्लंघन करते हैं।
फिल्म ‘धुरंधर’ का निर्देशन और निर्माण आदित्य धर ने किया है, जबकि इसका निर्माण जियो स्टूडियो और बी62 स्टूडियोज प्राइवेट लिमिटेड के बैनर तले हुआ है। यह फिल्म 5 दिसंबर को सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी। रिलीज के बाद याचिकाकर्ताओं ने अदालत का रुख करते हुए दावा किया कि फिल्म के एक संवाद में बलोच समुदाय को बेईमान, अविश्वसनीय और अमानवीय रूप में दर्शाया गया है।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अनिरुद्ध पी. मयी की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने की। अदालत के समक्ष फिल्म निर्माताओं की ओर से पेश अधिवक्ता ने स्पष्ट किया कि जिस शब्द को लेकर विवाद था, उसे फिल्म के प्रदर्शन से पहले ही म्यूट कर दिया गया है। याचिकाकर्ताओं के वकील ने भी इस तथ्य से असहमति नहीं जताई। इस पर अदालत ने कहा कि चूंकि अब कथित आपत्तिजनक सामग्री दर्शकों तक नहीं पहुंच रही है, इसलिए याचिका निरर्थक हो गई है।
याचिका में सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 की धारा 5बी का हवाला दिया गया था, जिसके तहत ऐसी फिल्मों को प्रमाणन नहीं दिया जा सकता जो सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या जीवन के अधिकार के खिलाफ हों। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि किसी पूरे समुदाय को अविश्वसनीय ठहराना न केवल असंवैधानिक है, बल्कि यह सामाजिक भेदभाव को भी बढ़ावा देता है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इन दलीलों पर विस्तृत विचार करने की आवश्यकता नहीं समझी और यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि विवादित शब्द के म्यूट होने के बाद अब कोई जीवित मुद्दा शेष नहीं है। यह फैसला फिल्म निर्माताओं के लिए एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है और साथ ही यह संकेत भी देता है कि यदि आपत्तिजनक सामग्री को समय रहते हटाया या संशोधित किया जाए, तो न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता समाप्त हो सकती है।









