NCERT विवाद मामला – केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायलय को बताया, विधिक विशेषज्ञों की निगरानी में पुस्तकों का होगा पुनर्लेखन

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Expert-panel for NCERT

स्कूली पाठ्यक्रम में न्यायपालिका से जुड़े अध्याय को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की नाराजगी वाले मामले में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि केंद्र सरकार ने स्कूली पाठ्यक्रम में न्यायपालिका से जुड़े अध्याय को लेकर हुए विवाद के बाद बड़ा कदम उठाया है। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानी NCERT की किताबों में न्यायपालिका पर मौजूद कंटेंट को फिर से लिखने के लिए एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित की गई है।

इस समिति में देश के न्यायिक और विधिक क्षेत्र के तीन बेहद अनुभवी नाम शामिल किए गए हैं—पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज इंदु मल्होत्रा, पूर्व जस्टिस अनिरुद्ध बोस और देश के पूर्व अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल।

क्यों जरूरी पड़ी अध्याय को दोबारा लिखने की जरूरत?

पिछले कुछ समय से शिक्षा क्षेत्र में यह बहस तेज थी कि स्कूली किताबों में न्यायपालिका की भूमिका, शक्तियों और सीमाओं को किस तरह से प्रस्तुत किया गया है। कई विशेषज्ञों का मानना था कि मौजूदा कंटेंट या तो पुराना हो चुका है या फिर उसमें न्यायिक व्यवस्था के कुछ पहलुओं को पर्याप्त संतुलन के साथ नहीं रखा गया। ऐसे में सरकार चाहती है कि छात्रों को न्यायपालिका की वास्तविक कार्यप्रणाली, संवैधानिक ढांचा और लोकतंत्र में उसकी भूमिका की अधिक स्पष्ट और संतुलित समझ मिले। यही वजह है कि इस काम के लिए सीधे उन लोगों को जिम्मेदारी दी गई है, जिन्होंने न्यायिक प्रणाली को अंदर से देखा और समझा है।

समिति में शामिल तीन बड़े नाम

1. इंदु मल्होत्रा

इंदु मल्होत्रा सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला वकील थीं जिन्हें सीधे जज के रूप में नियुक्त किया गया था। उन्होंने कई अहम संवैधानिक मामलों में फैसले दिए और न्यायिक स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर स्पष्ट रुख रखा।

2. अनिरुद्ध बोस

अनिरुद्ध बोस भी सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश रह चुके हैं। वे अपने संतुलित फैसलों और प्रशासनिक समझ के लिए जाने जाते हैं।

3. केके वेणुगोपाल

केके वेणुगोपाल देश के सबसे वरिष्ठ वकीलों में गिने जाते हैं। अटॉर्नी जनरल के रूप में उन्होंने केंद्र सरकार का पक्ष कई संवैधानिक मामलों में रखा और कानून की बारीकियों पर उनकी पकड़ मानी जाती है।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

यह पूरा मामला तब सामने आया जब इस विषय पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जानकारी दी। उन्होंने अदालत को बताया कि सरकार ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया है और विशेषज्ञ समिति बनाकर पाठ्यक्रम में सुधार की दिशा में कदम उठाया है।

अदालत को यह भी बताया गया कि समिति का काम सिर्फ भाषा बदलना नहीं होगा, बल्कि पूरे अध्याय की संरचना, तथ्यों और प्रस्तुति को नए सिरे से तैयार किया जाएगा।

क्या बदल सकता है नए अध्याय में?

विशेषज्ञों का मानना है कि नए अध्याय में निम्नलिखित बदलाव देखने को मिल सकते हैं:

1. न्यायपालिका की भूमिका का स्पष्ट चित्रण

न्यायपालिका को लोकतंत्र के एक स्तंभ के रूप में कैसे काम करना चाहिए—इस पर ज्यादा स्पष्ट और व्यावहारिक जानकारी दी जा सकती है।

2. न्यायिक समीक्षा (Judicial Review)

संविधान के तहत अदालतों को मिले अधिकार, खासकर न्यायिक समीक्षा की भूमिका को बेहतर तरीके से समझाया जा सकता है।

3. सरकार और न्यायपालिका के संबंध

कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन कैसे काम करता है, इस पर अधिक संतुलित दृष्टिकोण शामिल किया जा सकता है।

4. हालिया घटनाओं का संदर्भ

संभव है कि हाल के वर्षों में आए कुछ महत्वपूर्ण फैसलों और घटनाओं का भी उल्लेख किया जाए, ताकि छात्र समकालीन संदर्भ समझ सकें।

सवाल शिक्षा और राजनीति के बीच संतुलन का

NCERT की किताबों में बदलाव हमेशा चर्चा का विषय रहे हैं। कई बार इन बदलावों को लेकर आरोप लगते हैं कि सरकारें अपने हिसाब से इतिहास या संस्थाओं की व्याख्या बदलती हैं। हालांकि सरकार का कहना है कि यह बदलाव शैक्षणिक गुणवत्ता सुधारने और छात्रों को बेहतर जानकारी देने के उद्देश्य से किया जा रहा है।

इस बार खास बात यह है कि समिति में राजनीतिक व्यक्तियों के बजाय न्यायपालिका और कानून के विशेषज्ञों को शामिल किया गया है, जिससे यह उम्मीद की जा रही है कि बदलाव अधिक पेशेवर और संतुलित होंगे।

क्या कहते हैं शिक्षा विशेषज्ञ?

शिक्षा जगत के जानकारों का मानना है कि यह कदम सकारात्मक हो सकता है, बशर्ते इसे पारदर्शिता के साथ लागू किया जाए। उनका कहना है कि छात्रों को किसी भी संस्था के बारे में एकतरफा जानकारी देने के बजाय बहु-आयामी समझ देना जरूरी है।

कुछ विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि न्यायपालिका पर अध्याय को अपडेट करना समय की जरूरत है, क्योंकि पिछले कुछ दशकों में इस संस्था की भूमिका और चुनौतियां दोनों बदली हैं।

क्या असर होगा छात्रों पर?

अगर यह बदलाव सही तरीके से लागू होते हैं तो इसका सीधा असर छात्रों की समझ पर पड़ेगा। वे न सिर्फ न्यायपालिका की संरचना को समझ पाएंगे बल्कि यह भी जान सकेंगे कि:

* अदालतें कैसे काम करती हैं

* जज कैसे फैसले लेते हैं

* संविधान की व्याख्या कैसे होती है

* नागरिकों के अधिकार कैसे सुरक्षित रहते हैं

बहरहाल केंद्र सरकार का यह कदम शिक्षा और न्यायपालिका—दोनों के लिहाज से अहम माना जा रहा है। जहां एक तरफ यह छात्रों को बेहतर और अद्यतन जानकारी देने का प्रयास है, वहीं दूसरी तरफ यह भी सुनिश्चित करने की कोशिश है कि देश की महत्वपूर्ण संस्थाओं की छवि और भूमिका को सही तरीके से प्रस्तुत किया जाए।

अब सभी की नजर इस बात पर है कि समिति अपनी रिपोर्ट कब तक देती है और NCERT इन सिफारिशों को कब तक लागू करता है। आमतौर पर पाठ्यपुस्तकों में बदलाव एक लंबी प्रक्रिया होती है, जिसमें ड्राफ्ट तैयार करने से लेकर समीक्षा और फिर प्रकाशन तक कई चरण शामिल होते हैं। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों खास कर के सर्वोच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणियों को देखते हुए इस बात की पूरी संभावना है कि आने वाले शैक्षणिक सत्रों में नए संशोधित अध्याय छात्रों को पढ़ने को मिल सकते हैं।