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Book Review: रेत समाधि की ‘मां’ पुरुषों की इस दुनिया में खुद का एक अलग रास्ता बनाना चाहती है, गीतांजलि श्री ने पितृसत्ता पर कसा है तंज

Book Review: रेत समाधि उपन्यास हाल ही में चर्चा में इसलिए आया था क्योंकि इस रचना को प्रतिष्ठित बुकर प्राइज से सम्मानित किया गया। 376 पेजों में लिखा गया ‘रेत समाधि’ लेखिका गीतांजलि श्री द्वारा लिखा गया उपन्यास है। वैसे तो इस रचना का पहला संस्करण 2018 में प्रकाशित हो चुका था लेकिन यह रचना चर्चा में तब आई जब इसके अंग्रेजी अनुवाद “Tomb of Sand” को बुकर प्राइज से सम्मानित किया गया।

Book Review: भारतीय परिवारों की स्थिति को दर्शाया गया है

Book Review: ऐसा नहीं है कि गीतांजलि श्री ने हाल ही में लेखन शुरू किया है बल्कि वे तो करीब 30 सालों से लिखती आ रही हैं, इससे पहले उनके कई उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं लेकिन चर्चा में वे रेत समाधि के बाद आई हैं। रेत समाधि के केंद्र में एक 80 साल की बूढ़ी महिला हैं, जो अपने बड़े बेटे (जो कि एक नौकरशाह है) के साथ रहती हैं। उपन्यास को तीन भागों में बांटा गया है, पीठ, धूप और हद-सरहद।

Book Review: उपन्यास के पहले भाग ‘पीठ’ में महिला पाठकों को सिर्फ सोती ही नजर आती हैं, जो दिखाता है उनका जीवन इस पड़ाव में कितना उदासीन और अवसाद से भरा है। उपन्यास में भारतीय परिवारों की स्थिति को दर्शाया गया है जहां परिवार में बूढ़ी मां की जिम्मेदारी को लेकर बच्चे आपस में अक्सर उलझ जाया करते हैं। कैसे परिवार बूढ़ी महिला को अपने मुताबिक रखना चाहता है और महिला ऐसा करने से इंकार कर देती हैं।

उपन्यास में गीतांजलि श्री ने पितृसत्ता पर भी जमकर तंज कसा है कि कैसे ये न सिर्फ महिलाओं के लिए समस्या है बल्कि पुरुषों के लिए भी कैद के बराबर है। किताब में बूढ़ी महिला के मन की पीड़ा को भी बताया गया है कि कैसे वह अपने पति के दुनिया से चले जाने से दुखी है और उसे रोजी, जो कि एक थर्ड जेंडर है, की मौत का भी उतना ही दुख होता है।

उपन्यास में बूढ़ी महिला, मां, अपनी बेटी के साथ पाकिस्तान चली जाती हैं। वे लाहौर पहुंच जाती हैं, जहां उन्होंने अपना बचपन बिताया है और अनवर की तलाश में वहां से खैबर पख्तूनख्वां चली जाती हैं। रेत समाधि की भाषा, उपन्यास के किरदार और उपन्यास का पूरा प्लॉट अपने आप में जुदा है।

Book Review: कुलमिलाकर कह सकते हैं कि रेत समाधि एक ऐसी महिला की कहानी जो पुरुषों की तरह ही इस दुनिया में खुद का एक अलग रास्ता बनाना चाहती है। वैसे ये तो नहीं कहा जा सकता कि पढ़ने में यह उपन्यास बहुत आसान है और आप इसे पढ़ते ही चले जाएंगे लेकिन आप वक्त देकर पढ़ेंगे तो आपको परेशानी नहीं होगी।

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