जानिए क्‍यों बेहद खास है Kajiranga में पाया जाने वाला 1 सींग वाला गैंडा, क्‍या है इनकी खासियत?

Kajiranga: इस बार की गिनती में 200 गैंडे बढ़ गए हैं।असम के गोलाघाट और नगांव जिले में 884 वर्ग किमी में फैले काजीरंगा नेशनल पार्क का निर्माण कोमैरी कर्जन की सिफारिश पर 1908 में बनाया गया था।

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Kajiranga national Park news

Kajiranga: असम का गौरव कहा जाने वाले यह एक सींग वाला गैंडा तीसरा सबसे बड़ा जानवर है जो दुनिया के अनोखे और सीमित स्तनधारियों में से एक है।काजीरंगा नेशनल पार्क में दुनिया के कुल 4,014 एक सींग वाले गैंडों में से 2613 गैंडे रहते हैं। वन्य जीव संरक्षण के मामले में काजीरंगा नेशनल पार्क के लिए इसे बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है क्योंकि साल 2015 के मुकाबले 2018 में महज 12 गैंडे अधिक थे। इस बार की गिनती में 200 गैंडे बढ़ गए हैं।
असम के गोलाघाट और नगांव जिले में 884 वर्ग किमी में फैले काजीरंगा नेशनल पार्क का निर्माण कोमैरी कर्जन की सिफारिश पर 1908 में बनाया गया था।साल 1985 में इस पार्क को यूनेस्को की ओर से विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था। भारत सरकार ने इसे टाइगर रिजर्व के तौर पर भी घोषित कर रखा है।

Kajiranga Rhino in hindi.
Kajiranga Rhino.

Kajiranga: गैंडों की संख्‍या में इजाफा

जानकारी के अनुसार काजीरंगा नेशनल पार्क के अलावा वर्ष 2022 में हुई गिनती के अनुसार गैंडों की संख्‍या में इजाफा हुआ है। आंकड़ों के अनुसार असम के पोबितोरा वन्यजीव अभयारण्य में 107 गैंडे हैं। जबकि मानस नेशनल पार्क में 40 और ओरंग नेशनल पार्क में 125 गैंडे हैं।फिलहाल इस समय एक सींग वाले गैंडे को लुप्तप्राय जानवर की श्रेणी से अलग कर अति संवेदनशील की श्रेणी में रखा गया है।

Kajiranga: यहां जानिए 1 सींग वाले गैंडों की संख्या

  • 4014 – दुनिया भर में, 2875 – असम में
  • 2613 – काज़ीरंगा नेशनल पार्क (असम)
  • 107 – पोबितोरा नेशनल पार्क (असम)
  • 125 – ओरंग नेशनल पार्क (असम)
  • 40 – मानस नेशनल पार्क (असम)

Kajiranga: ब्रिटिश राज में हुई संरक्षण की बात

Kajiranga Rhino top news.
Kajiranga Rhino.

Kajiranga: जानकारी के अनुसार एक सींग वाला बड़ा गैंडा उत्तरी भारत के कई राज्यों समेत दक्षिणी नेपाल में नदी के किनारे घास के मैदानों और आस-पास के जंगलों में पाया जाता है।असम में इस राजकीय पशु की सबसे ज्‍यादा आबादी काजीरंगा नेशनल पार्क में ही देखने को मिलती है।जानकारी के अनुसार 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश राज के दौरान गैंडों का बहुत शिकार किया जाता था।उसी दौरान ब्रिटिशर्स को इस बात का एहसास हुआ कि काजीरंगा में केवल 12 राइनो यानी गैंडे ही बचे हैं। उसके बाद इनके संरक्षण की बात को गंभीरता से लिया गया। साल 1966 में पहली बार असम सरकार ने इनकी गिनती करवाई और उस समय 366 गैंडे होने की मिली।लेकिन वर्ष 2022 में जो गिनती हुई है उसके मुताबिक काजीरंगा में इस समय गैंडों की आबादी 2,613 हो गई है।

Kajiranga: जानिए क्‍यों बेहतर है गैंडों के लिए काजीरंगा का इलाका?

Kajiranga: दरअसल काजीरंगा के जंगल और पास से गुजरती ब्रह्मपुत्र नदी वाला इलाका एक सींग वाले गैंडों के लिए बहुत उपयुक्त माना जाता है।काजीरंगा में गैंडों के रहने के कई अन्‍य कारण भी हैं। दरअसल यहां का जो इलाका है गैंडों के आवास के लिए एक आदर्श ठिकाना है। क्योंकि काजीरंगा में 18 तरह की घास होती है जो इनके लिए काफी पौष्टिक मानी जाती है। चूंकि गैंडा ज्यादातर घास ही चरता है, एक वयस्क गैंडा एक दिन में करीब 50 किलो घास चर लेता है। उस हिसाब से काजीरंगा में पर्याप्त मात्रा में घास पाई जाती है।
ब्रह्मपुत्र के आसपास हरियाली, पहाड़ होने के साथ पानी भी पर्याप्त होता है।ऐसे में गैंडे अक्‍सर खुद को पानी में रहना पसंद करते हैं।जहां वे जलीय पौधे भी खाते हैं। यहां का पारिस्थितिकीय वातावरण भी इनके अनुकूल होता है। गैंडे को इसी तरह का वातावरण चाहिए होता है, उनके लिए बाढ़ का समय थोड़ा मुश्किल होता है लेकिन ये इतने समझदार होते हैं कि अच्छी तरह तैर लेते हैं।

Kajiranga:16 महीने के गर्भकाल के बाद होता है गैंडा

एक मादा राइनो का गर्भकाल लगभग 15 से 16 महीने तक रहता है। एक बार मां बनने के बाद दूसरे बछड़े को जन्म देने में करीब तीन साल का समय लगता है।जानकारी के अनुसार जमीन पर हाथी के बाद भारत में सबसे बड़ा जानवर राइनो यानी गैंडा ही है। पूरे 16 महीने के गर्भकाल के बाद एक राइनो का जन्म होता है।ये इंसान की तुलना में यह पैदा होने के समय बहुत बड़ा होता है और इसका वजन क़रीब 45 किलो के आसपास होता है।
गैंडा अपने जन्‍म लेने के 3-4 घंटे बाद ही चलने लगता है, हालांकि करीब 3 महीने तक गैंडे का बच्चा अपनी मां का दूध पीता है। उसके बाद वो धीरे-धीरे गोलाकार घास चरने की कोशिश करता है।बाद में वो अलग झुंड में चला जाता है।
एक वयस्क गैंडे का वजन करीब 1600 किलोग्राम होता है।चिड़ियाघरों में रहने वाले गैंडों के मुकाबले जंगली राइनो की उम्र महज 45 साल ही होती है। जबकि चिड़ियाघरों में रखे गए राइनो की उम्र 55 से 60 साल तक होती है।

Kajiranga: अंतरराष्ट्रीय बाजार में बहुत मांग है गैंडों के सींग की

जानकारी के अनुसार दुनियाभर में गैंडों की 5 अलग-अलग प्रजातियां मिलती हैं।इनमें से 2 अफ्रीका के मूल निवासी और 3 दक्षिण एशिया में पाए जाते हैं। असम में पाए जाने वाला यह एक सींग वाला गैंडा कई मायनों में बहुत कीमती माना जाता है।ये एक शाकाहारी जानवर होता है,लेकिन इसके देखने की क्षमता बहुत कमजोर होती है। गैंडा 30 से 40 फीट के बाद देख नहीं सकता, लेकिन इसके सुनने और सूंघने की क्षमता बहुत अच्छी होती है। ध्‍यान योग्‍य है कि वो पानी में कभी मल त्याग नहीं करता। जब किसी गैंडे को शौच करने की तलब होती है तो वो सूंघकर उसी जगह मल त्यागने जाता है जहां पहले से दूसरे गैंडों ने गोबर का ढेर कर रखा है।
गैंडों के सींग की अंतरराष्ट्रीय बाजार में बहुत मांग है।खासकर एशियाई बाजार के मूल्य के आधार पर इनके सींग की कीमत 55 से 60 लाख रुपए प्रति किलोग्राम अनुमानित है।
दरअसल एक गैंडे का सींग विशिष्ट होता है। “राइनो” नाम वास्तव में “नाक” और “सींग” के लिए ग्रीक शब्दों से आया है। राइनो जब तीन साल का होता है, उस समय उसका सींग थोड़ा बाहर की तरफ निकलने लगता है।औसतन 18 साल की उम्र में यह सींग पूरे आकार में निकल जाता है।वैसे तो औसतन गैंडे के सींग का वजन करीब 900 ग्राम बताया जाता है, लेकिन कई इंडियन राइनो के सींग का वजन ढाई किलो तक भी पाया गया है।अन्य सींग वाले जानवरों के विपरीत राइनो का सींग मुख्य रूप से केराटिन नामक प्रोटीन से बना होता है। यह वही पदार्थ है जिससे मानव का बाल और नाखून बनाता है.लेकिन राइनो का सींग हमेशा एक जैसा नहीं रहता।अक्‍सर जब राइनो कई तरह के कवक संक्रमण के चपेट में आता है या फिर जब बूढ़ा हो जाता है तो उसका सींग खराब होने लगता है।

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