मरुथुर गोपालन रामचंद्रन यानी एमजी रामचंद्रन यानी MGR सिनेमा की ऐसी शख्सियत थे जो भारतीय राजनीति के इतिहास में पहली बार किसी राज्य के मुख्यमंत्री बने।
बेशक ही दक्षिण की फिल्मों में शिवाजी गणेशन, एम आर राधा, करुणानिधि, एनटी रामाराव, जैमिनी गणेशन (अभिनेत्री रेखा के पिता) चर्चित रहे हों, लेकिन सही मायनों में नायक तो एमजीआर ही थे।
सिनेमा के 70 एमएम के पर्दे पर MGR का जो जलवा था, उसे उन्होंने राजनीति में भी कायम रखा। आज एमजीआर का जन्मदिन है और यहां पर हम बता रहे हैं उनकी जिंदगी से जुड़े कई रहस्यों के बारे में।

पचास के दशक में तमिलनाडु में जहां व्यक्ति पूजा के खिलाफ बड़ा आंदोलन चला, वहीं MGR एक ऐसी शख्सियत थे। जिनका मंदिर बना और प्रशंसक बाकायदा उनकी पूजा किया करते थे। तमिल सिनेमा के महान नायक को तमिल राजनीति में गरीबों का मसीहा कहा गया।
दक्षिण की राजनीति में जब के कामराज, पेरियार और सीएन अन्नादुरई अपने नारे और प्रभाव से इतिहास बन चुके थे, ऐसे समय में MGR ने सामाजिक सुधार और गरीबी को दूर करने जैसी बातों पर लोगों का मन छूते रहे।
उन्होंने तमिल भाषा और उसके गौरव के लिये लड़ी जाने वाली लड़ाई को जमीनी स्तर पर लड़ा और यही कारण था कि जब साल 1960 में एमजीआर को नेहरू सरकार ने पद्म श्री पुरस्कार के लिए चुना तो उन्होंने यह सम्मान केवल इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि वह सम्मान लेने के बाद हिंदी के बजाए अपनी मातृ भाषा तमिल में बोलना चाहते थे।
MGR का जन्म श्रीलंका में हुआ था
एमजीआर का जन्म 17 जनवरी 1917 एक केरलाई परिवार में हुआ था। एमजीआर के पिता मेलाक्कथ गोपाला मेनन और माता मरुथुर सत्यभामा केरल के पलक्कड़ प्रांत में बड़ावन्नूर के रहने वाले थे।
कहते हैं कि कुछ विवादों के कारण एमजीआर के पिता को केरल छोड़ना पड़ा और वह श्रीलंका के सेलन चले गये। जहां एमजीआर का जन्म हुआ।
गरीबी और अभाव में MGR का बचपन गुजरा। जब वह बड़े हुए तो पैसे कमाने के ध्येय से अपने भाई के साथ एक नाटक कंपनी से जुड़ गये। साल 1935 में MGR ने कॉलीवुड में एंट्री ली फिल्म “साथी लीलावथी” के साथ।

5 साल के लंबे संघर्ष के बाद एमजीआर को साल 1940 में साथ मिला महान पटकथा लेखक एम करुणानिधि (तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री) का। एम करुणानिधि की लिखी फिल्म “राजकुमारी” से MGR तमिल सिनेमा में बतौर हीरो स्थापित हुए।
एमजीआर ने तमिल सिनेमा में 30 सालों तक राज किया। करीब 100 से अधिक फिल्में करने वाले MGR ने “नम नाडू”, “कुडीयरंथा कोविल”, “पुधिया भूमि”, “आदिमाईपेन्न”, “आसाई युगम”, “कलवकारन चंद्रोध्याम”, “ओली विलक्कू” जैसे सुपरहीट फिल्में देकर तमिल सिनेमा के इतिहास में अपना नाम अमर कर लिया।
वैसे इस बात में कोई शक नहीं कि MGR को तमिल सिनेमा के शीर्ष पर पहुंचाने में एम करुणानिधि का बहुत बड़ा रोल था। सिनेमा के पर्दे पर MGR की आखिरी फिल्म थी “उलेगम सुथी पारु”।
MGR ने सिनेमा के साथ राजनीति में बिखेरा अपना जलाव
सिनेमा के बाद अब बात करते हैं एमजीआर के राजनीति। आजादी के दौर में एमजीआर महात्मा गांधी और देश के आजाद होने के बाद के कामराज की राजनीति से बहुत प्रभावित थे। लेकिन एमजीआर सक्रीय राजनीति में आये एम करुणानिधि के कारण।
करुणानिधि MGR से पहले से तमिल राजनीति में आ चुके थे अपने गुरु पेरियार और सीएन अन्नादुरई की विचारधारा से प्रभावित होकर। साल 1953 में एमजीआर एम करुणानिधि के कहने पर डीएमके में शामिल हुए।

साल 1954 में जब शिवाजी गणेशन ने डीएमके से इस्तीफा दे दिया तब पार्टी ने MGR को प्रचारक की जिम्मेदारी सौंपी। अपनी लोकप्रियता के बल पर एमजीआर जल्द ही डीएमके का चेहरा बन गये। साल 1962 में एमजीआर तमिलनाडु विधान परिषद के सदस्य बने।
एमजीआर अपने भाषणों से जल्द ही तमिल जनता के बीच एक राजनेता के तौर पर स्थापित हो गये। लेकिन तभी साल 1967 में एमजीआर की जिंदगी में एक भयंकर हादसा हुआ।
साथी कलाकार ने MGR को मार दी गोली
MGR के साथ कई फिल्मों में काम कर चुके तमिल फिल्मों के विलेन एमआर राधा ने 12 जनवरी 1967 को एमजीआर को किसी बात हुई कहासुनी में गोली मार दी। गोली एमजीआर के कान से होते हुए गर्दन में जा लगी।
करीब एक महीने तक एमजीआर अस्पताल में भर्ती रहे और जब ठीक हुए तो उनका एक कान पूरी तरह से खराब हो गया था। उन्हें एक से पूरी जिंदगी सुनाई नहीं दिया।
खैर इस गोलीकांड में एक कान गवां चुके एमजीआर ने अस्पताल में भर्ती रहते हुए मद्रास विधानसभा का चुनाव लड़ा और रिकॉर्ड वोटों से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे।
सीएन अन्नादुरई की मौत के बाद डीएमके ने MGR को पार्टी से निकाल दिया
साल 1969 में सीएन अन्नादुरई के देहांत के बाद एमजीआर का डीएमके पार्टी प्रमुख एम करुणानिधि से झगड़ा हो गया। अन्नादुरई की याद में आयोजित एक सभा में एमजीआर ने सीधे-सीधे अपनी पार्टी डीएमके पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया।
इस बात से नाराज होकर करुणानिधि ने MGR को डीएमके से निकाल दिया। एमजीआर ने साल 1972 में एडीएमके की स्थापना की। अपने गुरु अन्नादुरई की विचारधारा को बढ़ाते हुए एमजीआर 30 जुलाई 1977 को तमिलनाडु का मुख्यमंत्री बने और साल 1987 में अपने मृत्यु तक लगातार मुख्यमंत्री बने रहे।
देश में पहली बार ‘मिड डे मील’ लागू करने वाले MGR ही थे
आज पूरे देश के स्कूलों में जो मिड डे मील दिया जाता है, उसे सबसे पहले एमजीआर ने मुख्यमंत्री रहते हुए तमिलनाडु में लागू किया था। इसी तरह कॉलीवुड में टेक्नीशियन का काम करने वालों के बच्चों के लिए अलग से स्कूलों की स्थापित की।
MGR ने तमिलनाडु में सबसे पहले महिलाओं के लिए विशेष बस सेवा शुरू की। इसे अलावा एमजीआर ने धार्मिक स्थलों और राष्ट्रीय स्मारकों के सामने शराब पीने और बेचने पर पाबंदी लगाई।

बाढ़ और सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं में लोगों को आर्थिक सुविधाएं देने वाले एमजीआर ने साल 1962 में चीन युद्ध के समय अपने व्यक्तिगत खाते से 75 हजार रुपये दान किये।
जयललिता के साथ MGR की थी गजब की केमेस्ट्री
एमजीआर की जिंदगी में जयललिता की खास जगह थी। यही कारण था कि एमजीआर के दिवंगत होने के बाद जयललिता ने राजनीति में उनकी जगह ली। साल 1965 से लेकर साल 1973 तक एमजीआर ने जयललिता के साथ करीब 28 फिल्मों में काम किया।
MGR ने जब जयललिता को अपनी फिल्मों में काम दिया तो उस वक्त वो 42 साल के थे वहीं जयललिता की उम्र महज 16 साल थी। जयललिता ने अपने जीवन की दूसरी फिल्म एमजीआर के साथ किया। जयललिता ने साल 1965 में एमजीआर के साथ पहली फिल्म थी “आइराथिल ओरुवन”।

जयललिता की जीवनी ‘अम्मा जर्नी फ्रॉम मूवी स्टार टू पॉलिटिकल क्वीन’ लिखने वाली वासंती अपनी किताब में बताती हैं कि MGR का जयललिता के प्रति शुरू से ही सॉफ्ट कार्नर था। हालांकि उन दोनों की शादी नहीं हो पाई क्योंकि एमजीआर पहले ही तीन शादियां कर चुके थे।
जयललिता की अंग्रेजी के दिवाने थे MGR
वासंती अपनी किताब में बताती हैं कि एमजीआर जयललिता की अंग्रेजी से बहुत फैसिनेटेड थे। जयललिता शूटिंग के वक्त सेट पर एक कोने में बैठकर अंग्रेजी नॉवल पढ़ा करती थीं।
दरअसल जयलिलता बहुत गोरी थीं वहीं आमतौर पर तमिलनाडु में इतनी गोरी लड़कियां नहीं दिखाई देती हैं, यही कारण था कि MGR जयललिता के प्रति आकर्षित रहा करते थे।

एमजीआर ने एडीएमके में साल 1982 में जयललिता को शामिल किया और साल 1983 में प्रोपेगेंडा सेक्रेटरी बनाया और बाद में उन्हें राज्यसभा भी भेजा।
हालांकि पार्टी और एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन के भारी विरोध के कारण एमजीआर ने जयललिता को पार्टी के प्रोपेगेंडा सेक्रेटरी पद से हटा दिया।
जयललिता ने बहुत के वर्षों में सिमी ग्रेवाल के शो में अपने गुरु एमजीआर के एहसान को नकारते हुए कहा था कि एमजीआर ने उनके लिए राजनीति के रास्ते आसान नहीं किए बल्कि राजनीति के मुकाम उन्होंने खुद से बनाई।

वैसे जयललिता 5 बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं और इसमें एमजीआर के विरासत का बहुत बड़ा योगदान था, इस बात को नकारा नहीं जा सकता है।
MGR का पारिवारिक जीवन और निधन
एमजीआर ने अपने जीवन में कुल तीन शादियां की। यही कारण था कि बाद में चाहते हुए भी वो जयललिता से शादी नहीं कर पाये। एमजीआर की पहली दो पत्नियां तो समय से पहले ही चल बसीं।
MGR की तीसरी पत्नी जानकी रामचंद्रन मृत्यु तक उनके साथ रहीं और उनकी मृत्यु के बाद 7 जनवरी 1988 से 30 जनवरी 1988 तक तमिलनाडु की सीएम भी बनी। बाद में जयललिता की ऐसी आंधी चली कि जानकी रामचंद्रन उसमें कहीं खो गईं और साल 1996 में उनकी मौत हो गई।

MGR को किडनी की बीमारी थी। अक्टूबर 1984 में उनकी किडनी ने काम करना बंद कर दिया। जिसके कारण उन्हें अमेरिका के ब्रूकलेन में डाउनस्टेट मेडिकल सेंटर में किडनी प्रत्यारोपण कराना पड़ा।
बीमारी में भी एमजीआर की लोकप्रियता का यह आलम था कि जब एमजीआर ने सीएम पद से इस्तीफा देने का मन बनाया तो सारे मंत्रियों ने उन्हें अपने इस्तीफे सौंप दिए। लंबी बीमारी के बाद 24 दिसंबर 1987 को एमजीआर की मृत्यु हो गई।
जानकी रामचंद्रन ने जयललिता को धक्का मरवाकर MGR के शववाहन से गिरा दिया
MGR का जब निधन हुआ था तो परिवार वालों ने जयललिता को घर में घुसने नहीं दिया। बाद में जयललिता को पता चला कि एमजीआर का शव राजाजी हॉल ले जाया गया है।
जब जयललिता राजाजी हॉल पहुंचीं तो जानकी रामचंद्रन ने उन्हें एमजीआर के शव से दूर खड़ा किया। लेकिन जयललिता किसी तरह एमजीआर के शव के सिराहने के पास पहुंच गईं। जयललिता लगातार करीब 21 घंटे तक एमजीआर के शव के पास खड़ी रहीं।
इस दौरान एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन ने उनकी बहुत बेइज्जती की, जानबूझकर चलते-फिरते जयललिता के पैरों को कुचलतीं रही लेकिन जयललिता वहां से हटी नहीं।

जब एमजीआर के शव को राजाजी हॉल से अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जाने लगा तो जयललिता ने शव वाहन पर चढ़ने की कोशिश की लेकिन जानकी रामचंद्रन के भतीजे ने जयललिता को धक्का देकर गिरा दिया और जययलिता वहां से वापस लौट आई।
वहीं एमजीआर की मौत के सदमे से पागल होकर चेन्नई में कई प्रशंसकों ने आत्मदाह कर लिया। आलम यह था कि पुलिस भावुक जनता को आत्मदाह जैसे पागलपन से रोक नहीं पा रही थी।
MGR की मौत के सदमें में पूरे तमिलनाडु और खासकर चेन्नई में 29 लोगों ने अपनी जान दे दी थी। अंतिम संस्कार के बाद मरीना बीच पर अन्ना मेमोरियल के करीब एमजीआर की समाधी बनाई गई, जहां बाद के वर्षों में दिवंगत हुई उनकी राजनीति विरासत को संभालने वाली अम्मा यानी जयललिता भी अंतिम नींद ले रही हैं।

एमजीआर की मौत के बाद उनके सथ्या फिल्म स्टूडियो में महिला महाविद्यालय की स्थापना हुई और चेन्नई के 27, आरकोट स्ट्रीट, टी नगर स्थित उनके आवास को एक स्मारक बना दिया गया। राजीव गांधी की सरकार ने एमजीआर की सार्वजनिक सेवाओं को ध्यान में रखते हुए साल 1988 में मरणोपरांत भारत रत्न दिया।

एमजीआर, सी राजगोपालाचारी और के कामराज के बाद तमिलनाडु के तीसरे मुख्यमंत्री थे, जिन्हें भारत रत्न दिया गया। कहा जाता है कि राजीव सरकार ने तमिलनाडु की जयललिता सरकार को सहयोगी बनाने के लिए एमजीआर को उनकी मौत के अगले साल ही भारत रत्न दे दिया था।
विवाद चाहे जो हो लेकिन तमिल सिनेमा और तमिल राजनीति को ऊंचाइयों पर ले जाने वाले एमजीआर भारत रत्न के सच्चे हकदार थे इसमें कोई शक नहीं है।

7 दिसंबर 2006 को संसद भवन में एमजीआर की आदम कद प्रतिमा स्थापित की गई। इसके अलावा साल 2017 में एमजीआर की जन्म शताब्दी मनाने के लिए भारत सरकार ने 100 रुपये और 5 रुपये के सिक्के जारी किया।
इसके अलावा साल 2019 में नरेंद्र मोदी सरकार ने चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर एमजीआर के नाम पर कर दिया।
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