जानिए आखिर डॉलर के मुकाबले लगातार क्यों गिर रहा है भारतीय रुपया और कैसे तय होती है Indian Rupee की कीमत

भारतीय रुपया (Indian Rupee) अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर गिरने का निर्यात के लिए मिला-जुला अर्थ हो सकता है. विशेषज्ञों के अनुसार घरेलू मुद्रा में गिरावट से निर्यातकों (Exporters) का लाभ कुछ कम हो सकता है.

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Dollar and Indian Rupee

भारतीय मुद्रा रुपया (Indian Rupee) अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर होती जा रही है. आज यानि शुक्रवार 23 सितंबर को रुपया अपने अब तक के सबसे निचले स्तर 81 रुपये प्रति डॉलर को भी पार कर गया. आज घरेलू मुद्रा 1 डॉलर के मुकाबले 81.03 पर खुली और इस समय अपने आज तक के न्यूनतम 81.13 रुपये के आसपास बनी हुई है.

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अगर हम सभी उभरते हुए बाजारों की मुद्राओं (करेंसी) की तुलना रुपये (Indian Rupee) से करें तो इसका प्रदर्शन सबसे खराब रहा है. एशियाई मुद्राओं में दक्षिण कोरिया की करेंसी वॉन ही रुपये से ज्यादा 1.2 फीसदी नीचे गिरी है.

गुरुवार को भी रुपया 83 पैसे टूटकर 80.79 के अपने कल तक के निचले स्तर पर बंद हुआ था. डॉलर के मुकाबले रुपये में 2022 में अब तक 8.5 फीसदी की कमी आ चुकी है. पिछले 8 सत्रों (दिन) की बात करे तो यह 7वीं बार है, जब रुपये में लगातार गिरावट देखने को मिली है. इसी समय के दौरान रुपया 2.53 फीसदी गिर चुका है.

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विदेशी मुद्रा भंडार पर भी असर

इसके अलावा भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में भी लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के साप्ताहिक डेटा के अनुसार, 9 सितंबर तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 550.8 अरब डॉलर था. जो एक साल पहले के मुकाबले सबसे कम है, जब यह आंकड़ा 641 अरब डॉलर तक पहुंच गया था.

इस साल जनवरी के पहले सप्ताह में भारत के पास 633 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार था, इसका अर्थ ये हुआ कि भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में वर्ष 2022 में अब तक 82 अरब डॉलर से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है जो कि पिछले एक दशक में सबसे अधिक है.

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क्या है कारण

विदेशी मुद्रा कारोबारियों के अनुसार अमेरिकी बैंक फेडरल रिजर्व के दरों में बढ़ोतरी करने और यूक्रेन और रूस के बीच चल रहे तनाव के बढ़ने की वजह से निवेशक जोखिम उठाने से बच रहे हैं. वहीं विदेशी बाजारों में अमेरिकी मुद्रा की मजबूती, घरेलू शेयर बाजार में हो रही गिरावट और कच्चे तेल के दामों में बढ़ोतरी भी रुपये को नाजुक कर रही है.

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पिछले दिनों बेतहाशा महंगाई से जूझ रहे अमेरिका में लोगों को राहत देने के लिए अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों में 0.75 फीसदी की बढ़ोतरी की है. इसके अलावा बैंक ऑफ इंग्लैंड ने भी गुरुवार को अपनी प्रधान ब्याज दर बढ़ाकर 2.25 फीसदी कर दी है, इसके अलावा अब सारा ध्यान बैंक ऑफ जापान पर है. अगर अन्य विकसित देशों में बैंक लगातार अपनी ब्याज दरों में बढ़ोतरी करते हैं तो इसका असर सीधा रुपये पर पड़ेगा, क्योंकि इन देशों के बड़े निवेशक अपने देशों में ही निवेश करेंगे.

छह प्रमुख मुद्राओं (यूरो, जापानी येन, ब्रिटिश पाउंड, कैनेडियन डॉलर, स्वीडिश क्रोना और स्विस फ्रैंक) की तुलना में डॉलर की मजबूती को आंकने वाला डॉलर सूचकांक (Dollar Index) पिछले दो दिनों में बढ़कर 0.80 फीसदी बढ़कर 111.67 पर पहुंच गया है. अमेरिकी डॉलर सूचकांक 20 साल के उच्च स्तर पर है और इस साल अब तक डॉलर करीब 16 फीसदी मजबूत हुआ है.

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US Dollar Index

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कितना पड़ेगा असर?

भारतीय रुपया (Indian Rupee) अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर गिरने का निर्यात के लिए मिला-जुला अर्थ हो सकता है. विशेषज्ञों के अनुसार घरेलू मुद्रा में गिरावट से निर्यातकों (Exporters) का लाभ कुछ कम हो सकता है.

विशेषज्ञों के अनुसार रुपये का अवमूल्यन (Depreciation) यदि जारी रहा तो, यह निर्यात के लिए फायदेमंद होगा, लेकिन अगर भारतीय अर्थव्यवस्था कम आयात पर निर्भर रहती तो यह लाभ और ज्यादा होता.

वहीं, निर्यात के लिए बनने वाले सामान की उच्च लागत भारत के निर्यात को वैश्विक बाजार में कम प्रतिस्पर्धी बना सकती है. इससे, पेट्रोलियम, रत्न व आभूषण, इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों को ज्यादा फायदा नहीं होगा क्योंकि वे आयात पर निर्भर हैं. मुख्य रूप से निर्यातक एक स्थिर (Stable) मुद्रा चाहते हैं.

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डॉलर के मुकाबले कैसे तय होती है रुपये की कीमत?

किसी भी देश की मुद्रा की कीमत अर्थव्यवस्था के सामान्य से सिद्धांत, मांग और पूर्ति (Demand and Supply) पर आधारित होती है. मुद्राओं की कीमत दो आधार पर तय की जाती है एक कीमत फॉरेन एक्सचेंज मार्केट में तय की जाती है, वहीं दूसरी फिक्स्ड एक्सचेंज रेट के तहत तय होती है.

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फॉरेन एक्सचेंज बाजार में जिस करेंसी की डिमांड ज्यादा होगी उसकी कीमत भी ज्यादा होगी, जिस करेंसी की डिमांड कम होगी उसकी कीमत भी कम होगी. यह पूरी तरह से ऑटोमेटेड है. वहीं फिक्स्ड एक्सचेंज रेट के तहत एक देश की सरकार किसी दूसरे देश के मुकाबले अपने देश की करेंसी की कीमत को फिक्स कर देती है. यह व्यापार बढ़ाने औैर महंगाई को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है.

क्या है एशियाई मुद्राओं की स्थिति

एशियाई मुद्राओं में चीन ऑफशोर 0.3 फीसदी, चीन रेनमिनबी 0.27 फीसदी, और ताइवानी डॉलर 0.1 फीसदी गिर गया. फिलीपींस पेसो 0.3 फीसदी, दक्षिण कोरियाई ने 0.27 फीसदी और जापानी येन 0.2 फीसदी की मजबूती देखी गई है.

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