उत्तर प्रदेश में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए किए जा रहे प्रयासों का सकारात्मक प्रभाव अब आंकड़ों में भी दिखाई देने लगा है। सेंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में नवजात शिशुओं, एक वर्ष तक के बच्चों और पांच वर्ष तक की आयु के बच्चों की मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार, आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों के प्रभावी योगदान का परिणाम मान रहे हैं।
एसआरएस रिपोर्ट 2024 के अनुसार, उत्तर प्रदेश में नवजात मृत्यु दर (एनएमआर) 26 से घटकर 25 प्रति हजार जीवित जन्म हो गई है। वहीं शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) 37 से घटकर 35 और पांच वर्ष तक की आयु के बच्चों की मृत्यु दर 42 से घटकर 41 प्रति हजार दर्ज की गई है। यह सुधार भले ही आंकड़ों में छोटा दिखाई दे, लेकिन इसके पीछे हजारों बच्चों का सुरक्षित जीवन और लाखों परिवारों की उम्मीदें जुड़ी हुई हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह उपलब्धि प्रदेश में बीते वर्षों के दौरान स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत बनाने, अस्पतालों में आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता और स्वास्थ्यकर्मियों के निरंतर प्रशिक्षण का प्रत्यक्ष परिणाम है। हालांकि रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि जन्म के तुरंत बाद होने वाली मौतों में अपेक्षित गति से कमी नहीं आ रही है, जिससे प्रसव और नवजात देखभाल की गुणवत्ता पर और अधिक ध्यान देने की आवश्यकता बनी हुई है।
किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय की बाल रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर डॉ. शालिनी त्रिपाठी के अनुसार, आयुष्मान आरोग्य मंदिरों से लेकर जिला अस्पतालों तक स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार और चिकित्सा कर्मियों का नियमित प्रशिक्षण इस सुधार की प्रमुख वजह है। उन्होंने बताया कि सीपैप मशीनों की उपलब्धता, कंगारू मदर केयर, मिल्क बैंक, नियमित टीकाकरण और निःशुल्क दवा वितरण जैसी व्यवस्थाओं ने नवजात और शिशुओं की जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
प्रदेश के अस्पतालों में शुरू की गई मदर-न्यूबॉर्न केयर यूनिट (एमएनसीयू) व्यवस्था भी प्रभावी साबित हुई है। इस मॉडल के तहत प्रसव के बाद मां और बच्चे को एक साथ रखा जाता है, जिससे नवजात की निगरानी बेहतर होती है और संक्रमण का खतरा कम होता है।
वीरांगना अवंती बाई महिला अस्पताल की स्टाफ नर्स डेजी रानी के अनुसार, नर्सिंग स्टाफ को नियमित वर्चुअल प्रशिक्षण और रिफ्रेशर कोर्स के माध्यम से नवजात देखभाल की आधुनिक तकनीकों से अपडेट रखा जा रहा है। इससे स्वास्थ्यकर्मी खतरे के संकेतों की समय पर पहचान कर उचित उपचार और रेफरल सुनिश्चित कर पा रहे हैं।
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. सलमान का कहना है कि संक्रमण और अस्वच्छता पहले शिशु मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल थे। अब अस्पतालों में स्वच्छता प्रोटोकॉल का कड़ाई से पालन किया जा रहा है। प्रसव कक्षों की सफाई, स्टरलाइज्ड उपकरणों का उपयोग, साफ कपड़ों और संक्रमण नियंत्रण उपायों ने शिशु स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रसव के दौरान और जन्म के बाद शुरुआती 48 घंटों में देखभाल की गुणवत्ता को और बेहतर बनाया जाए, तो नवजात मृत्यु दर में और तेज गिरावट लाई जा सकती है। फिलहाल एसआरएस रिपोर्ट के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि उत्तर प्रदेश बच्चों के स्वास्थ्य और जीवन सुरक्षा के क्षेत्र में लगातार बेहतर प्रदर्शन की दिशा में आगे बढ़ रहा है।









