Cheer: पहाड़ों की शान चीड़ के दरख्त, आगजनी से कम हो रही इनकी तादाद, जानिए इनका महत्वपहाड़ों की सुदंरता में चार चांद लगाते हैं यहां के सुंदर प्राकृतिक नजारे और खासतौर से यहां पर पाए जाने वाले चीड़ के पेड़।पिछले कई वर्षों से यहां के हरियाली दूत यानी चीड़ के पेड़ कम होने लगे हैं। इसका मुख्य कारण हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रहीं आग की घटनाएं हैं।ऐसे में इनके लगातार जलने की घटनाओं को रोकने के लिए सरकार को कई कड़े कदम उठाने होंगे।
इसके आधार पर ही इनका संरक्षण किया जाएगा।उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल मंडल में पाइनस रॉक्सबुर्गी नामक चीड़ की प्रजातियां अधिक हैं। यही ब्लू पाइन यानी हिमालय की स्थानीय प्रजातियों में से एक है।
पर्यावरविदों के अनुसार पिथौरागढ़ की सोर घाटी यानी पुरातन सरोवर की मिट्टी की जांच में इसी प्रजाति के पेड़ों के कोयले मिले हैं। जिनकी उम्र लगभग 36 हजार वर्ष के आसपास पायी गई है। इससे पता चलता है कि चीड़ की कुछ प्रजातियां बाहरी न हो कर स्थानीय ही हैं।
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Cheer: चीड़ को पानी की कम जरूरत
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Cheer: मध्य हिमालयी क्षेत्रों में चीड़ के वन बहुतायत में मिल जाते हैं।इन जगहों पर आद्रता भी कम होती।पहाड़ों के दक्षिणी ढलानों में मिट्टी और ह्यूमस भी काफी कम पाया जाता है।फलस्वरूप दक्षिणी ढलानों में वन क्षेत्र काफी कम होता है।ऐसे में यहां वही वनस्पतियां उगतीं हैं, जिन्हें पानी की कम जरूरत होती है।
जिसमें चीड़ का पौधा भी है।कोई भी वृक्ष जमीन से कितना पानी अवशोषित करेगा यह इस बात पर निर्भर करता है उस पेड़ की जड़ों की गहराई और पेड़ द्वारा किये गए अवशोषण पर निर्भर करता है।चीड़ के पेड़ों की जड़ें ज्यादा गहरी नहीं होती। यही वजह है कि बर्फबारी और तेज हवाओं के चलने पर चीड़ के पेड़ आसानी से गिर जाते हैं।
Cheer:हमारी जरूरत के सामान देता है चीड़
चीड़ के पौधे को पानी की कम जरूरत होही है।ऐसे में इसके पेड़ बनने तक पानी का कम ही इस्तेमाल होता है। चीड़ के कोन से कई प्रकार की सजावटी चीजें भी तैयार की जाती हैं, जो यहां के पर्यटन स्थलों पर मिलनी आम हैं। चीड़ की पत्तियों से भी कई प्रकार की सजावटी चीजें तैयार की जाती हैं।
चीड़ की इन्हीं पत्तियों यानी पीरुल से कुमाऊं के बेरीनाग सूबे में एक संस्था बिजली बना रही है। पीरुल का इस्तेमाल खाद बनाने, कागज, फिल्लर के रूप में कई चीज़ों में किया जाता है। यानी चीड़ के पेड़ को कई व्यावसायिक प्रयोग संभव हैं।
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