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“गज़लों का शहज़ादा” थे महान संगीतकार मदन मोहन

मदन मोहन कोहली जी का जन्म 25 जून 1924 को बगदाद में हुआ था । उनके पिता राय बहादुर चुन्नीलाल इराकी पुलिस बलों के साथ महालेखाकार के रूप में काम कर रहे थे। 1932 के बाद उनका परिवार चकवाल, फिर पंजाब प्रांत पाकिस्तान के झेलम में लौट आया।

-Shweta Rai

Madan Mohan: हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री का वो सुनहरा और सुरीला दौर जब संगीत में शोर कम और माधुर्य अधिक हुआ करता था। ऐसे में हमारे ज़ेहन में एक ही संगीतकार का नाम आता है और वो थे महान संगीतकार मदन मोहन जी। मदनजी को ग़ज़लों का बादशाह कहा जाता है। गज़लों औऱ नगमों की उनकी समझ बेमिसाल थी और संगीत की तो लाजवाब या यूँ कहे कि ग़ज़ल मदन मोहन के गीतों में आकर अनोखी बन जाती थी। उनके कुछ यादगार नगमें और गज़लें मसलन ,’उनको ये शिकायत है कि हम कुछ नहीं कहते’ ,’मेरी आवाज सुनो,प्यार का राज सुनो’ ,’वो भूली दास्तां लो फिर याद आ गयी’,’तेरे लिये हम हैं’ आज भी संगीत प्रेमियों के लिये खूबसूरत तोहफा हैं।

Madan Mohan: संगीतकार से पहले फौजी थे मदन मोहन…

"गज़लों का शहज़ादा" थे महान संगीतकार मदन मोहन
Madan Mohan

मदन मोहन कोहली जी का जन्म 25 जून 1924 को बगदाद में हुआ था। उनके पिता राय बहादुर चुन्नीलाल इराकी पुलिस बलों के साथ महालेखाकार के रूप में काम कर रहे थे। 1932 के बाद उनका परिवार चकवाल, फिर पंजाब प्रांत पाकिस्तान के झेलम में लौट आया। उनका बचपन दादा-दादी की देखरेख में बीता, जबकि उनके पिता व्यवसाय के अवसरों की तलाश में बॉम्बे गए।

उन्होंने अगले कुछ वर्षों तक लाहौर के स्थानीय स्कूल में पढ़ाई की। कुछ समय बाद, उनका पूरा परिवार मुंबई आ गया जहाँ उन्होंने बायकुला में सेंट मैरी स्कूल से अपना सीनियर कैम्ब्रिज पूरा किया। मुंबई में, 11 साल की उम्र में, उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो द्वारा प्रसारित बच्चों के कार्यक्रमों में प्रदर्शन करना शुरू कर दिया था। उनके पिता राय बहादुर चुन्नी लाल मुम्बई में फिल्म व्यवसाय से जुड़े थे और ‘बाम्बे टॉकीज़’ और ‘फिल्मीस्तान’ जैसे बड़े फिल्म स्टूडियो में साझीदार थे। घर में फिल्मी माहौल होने के कारण मदनमोहन भी फिल्मों में काम कर बड़ा नाम कमाना चाहते थे लेकिन अपने पिता के कहने पर उन्होंने सेना में भर्ती होने का फैसला लिया और देहरादून में 1943 में सेकेंड लेफ्टिनेंट के तौर पर भर्ती हुये और वहाँ उन्होंने नौकरी शुरू कर दी। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के अंत तक दो साल तक वहां सेवा की। कुछ दिनों बाद उनका तबादला दिल्ली में हो गया लेकिन उनका मन तो संगीत की दुनिया में ही रमता था। जिस कारण कुछ समय के बाद वो सेना की नौकरी छोड़ लखनऊ आ गये।

"गज़लों का शहज़ादा" थे महान संगीतकार मदन मोहन
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1946 में उनकी ऑल इंडिया रेडियो, लखनऊ में कार्यक्रम सहायक के रूप में नियुक्ति हुयी, जहाँ वे कई नामचीन लोगों मसलन बेगम अख्तर उस्ताद फैयाज़ खान, उस्ताद अली अकबर खान, और तलत महमूद जैसे महान कलाकारों के संपर्क में आए। इन्हीं दिनों उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों के लिए संगीत की रचना भी की | 1947 में, उन्हें ऑल इंडिया रेडियो, दिल्ली में स्थानांतरित कर दिया गया जहाँ उन्होंने थोड़े से समय के लिये काम किया। उन्हें गायकी का भी बहुत शौक था और इसलिए 1947 में उन्होंने बेहज़ाद लखनवी की 2 गज़लें “आने लागा है कोई नज़र” और “इस राज़ को दुनीया जानती है” रिकॉर्ड कीं।

इसके तुरंत बाद, 1948 में उन्होंने दीवान शरार द्वारा लिखीं दो और निजी ग़ज़लें “वो आये तो महफ़िल में इठलाते हुए आयें” , “दुनिया मुझे कहती है कि मैं तुझको भुला दूँ रिकॉर्ड कीं” । 1948 में, उन्हें फ़िल्म शहीद के लिए संगीतकार गुलाम हैदर के तहत लता मंगेशकर के साथ फ़िल्म ” पिंजरे में बुलबुल बोले” और “मेरा छोटा सा दिल डोले” गाने का पहला मौका मिला, लेकिन बदकिस्मती से ये गीत फ़िल्म में कभी भी रिलीज़ या उपयोग नहीं किया गया।

अपने सपनों को नया रूप देने के लिये मदनमोहन लखनऊ से मुंबई आ गये। मुंबई आने के बाद मदनमोहन की मुलाकात एस.डी.बर्मन, श्याम सुंदर और सी.रामचंद्र जैसे नामी संगीतकारों से हुई और वह उनके सहायक के तौर पर काम करने लगे। बतौर संगीतकार वर्ष 1950 में प्रदर्शित फिल्म आंखें के जरिये मदनमोहन फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में सफल हुए, जिसे लोगों ने खूब पसंद किया।

Madan Mohan: नरगिस की मां जद्दनबाई से ली थी संगीत की शिक्षा…

मुंबई में मैरीन लाइंस में जहां मदन मोहन रहा करते थे तो वहीं बगल की कोठी नरगिस की मां जद्दनबाई की थी। मदन मोहन की संगीत के प्रति ऐसी दीवानगी थी कि बचपन में वो अपने घर से चुपके से पीछे के दरवाज़े से निकल जाया करते थे औऱ निकलकर पड़ोस में जद्दनबाई के यहाँ संगीत की महफिल में शामिल हो जाया करते थे और फिर चुपचाप वापस पीछे के दरवाजे से घर से आया जाया करते थे। कहते हैं कि उन्होंने नरगिस की मां जद्दनबाई से भी संगीत सीखा था । संगीत की समझ मदन मोहन को वहां से ही मिली। इसी दौरान उनकी दोस्ती नरगिस से भी गहरी हो गई थी।

राज कपूर की तरह वो भी एक अभिनेता बनना चाहते थे…

मदन मोहन के  चेहरे और उनकी कद काठी से वो एकदम हीरो की तरह दिखते थे। लंबा, गोरा, खूबसूरत तराशा हुआ चेहरा, सुंदर शरीर और बुलंद आवाज़…ये सारी खूबियाँ उनमें थीं । ज़ाहिर है कि अपने अच्छे दोस्त राज कपूर की तरह वो भी एक अभिनेता बनना चाहते थे, पर उनके पिता ने इसके लिए सख्त मना कर दिया औऱ मदन मोहन को फौज में भेज दिया।

Madan Mohan: लता जी मदन मोहन को अपना भाई मानती थीं…

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Madan Mohan

लता और मदन मोहन के रिश्ते के जुड़ने की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। उस दिन रक्षाबंधन था। मदन मोहन चाहते थे कि लता उनकी पहली फिल्म में उनके साथ गाना गायें । फिल्म शहीद में गाना तो उन्होनें गाया लेकिन फिल्म में वो गाना नहीं रिलीज़ किया गया था । दुखी मदन मोहन, लताजी को अपने घर ले आए और एक राखी देते हुए कहा “आज राखी है। इसे मेरी कलाई पर बांध दो।” इसके बाद मदन मोहन ने लताजी को याद दिलाते हुए कहा कि “जब हम पहली बार मिले थे तब हमने भाई-बहन का ही गीत गाया था। आज से तुम मेरी छोटी बहन और मैं तुम्हारा मदन भैया। मैं वचन देता हूं कि आज से तुम अपने भाई की हर एक फिल्म में गाओगी।” फिल्म “आँखें” के बाद लता मंगेश्कर मदनमोहन की चहेती पा‌र्श्वगायिका बन गयीं और वह अपनी हर फिल्म के लिये लता मंगेश्कर से ही गाने की गुजारिश किया करते थे। लता मंगेश्कर भी मदनमोहन के संगीत निर्देशन से काफी प्रभावित थीं और उन्हें “गजलों का शहज़ादा” कहकर बुलाया करती थीं। लता जी ने रूपहले पर्दे पर ही भाई बहन के अटूट रिश्ते को इन गीतों के ज़रिये सिर्फ़ गाया ही नहीं है बल्कि जीया भी है। लताजी मदन भैया के बारे में कहा करती थी कि “दूसरे संगीतकारों ने मुझे गाने दिए हैं, जबकि मदन भैया ने संगीत दिया है।”

संगीत के बेताज बादशाह  मदनमोहन के बारे में संगीतकार खय्याम का कहना था कि “वे संगीत के बेताज बादशाह थे।” संगीत की‍ जितनी विविधताएँ होती हैं, उन सबकी उन्हें गहरी समझ थी। जबकि उन्होंने शास्त्रीय अथवा सुगम संगीत का बाकायदा कोई प्रशिक्षण नहीं लिया था। यतीन्द्र नाथ मिश्र की किताब ‘लता सुर गाथा’ में इस वाकये का जिक्र किया गया है कि लता ने  भाई  मदन मोहन की मौत के बाद भी उनसे किया हुआ वादा पूरा किया। साल 2004 में फिल्म ‘वीर-जारा’ में मदन मोहन के पहले से कम्पोज़ किये गये संगीत का इस्तेमाल किया गया । तब वादे के मुताबिक फिल्म के सारे गाने लता मंगेशकर ने ही गाए और हर बार की तरह भाई-बहन की इस जोड़ी ने कालजयी गीतों की रचना की।

Madan Mohan: गज़ल गायिका बेगम अख्तर के मुरीद थे मदन मोहन साहब…

गज़ल गायिका बेगम अख्तर और बरकतअली साहब का उन पर विशेष प्रभाव हुआ था । बाद की फिल्मों में मौका मिलने पर मदनमोहन ने जो बंदिशें रचीं उनपर बरकतअली साहब का प्रभाव पूरे तौर पर देखा जा सकता है। बेग़म अख्तर के ग़ज़ल गायन का प्रभाव भी मदनमोहन की बंदिशों में सुनने को मिलता है। कहा तो यहाँ तक जाता है कि मदनमोहन जैसी ग़ज़लों की रचना करने में कोई फिल्म संगीतकार सफल नहीं हुआ है। मदनमोहन की कुछ लाजवाब ग़ज़लें ‘आज सोचा तो आँसू भर आए’, , ‘इसी में प्यार की आरजू’ ,‘हम प्यार में जलने वालों को चैन कहाँ, आराम कहाँ’ रहीं । जो बेहद हिट हैं।
महान संगीतकार ओ.पी.नैयर जिनके निर्देशन में लता मंगेश्कर ने कई सुपरहिट गाने गाये अक्सर कहा करते थे कि “मैं नहीं समझता कि लता मंगेश्कर, मदनमोहन के लिये बनी हुयी हैं या मदन मोहन लता मंगेशकर के लिये …लेकिन अब तक न तो मदन मोहन जैसा संगीतकार हुआ और न लता जैसी पा‌र्श्ववगायिका ही हुयी हैं।”

गज़ल को कितने रूपों में पेश किया जा सकता है, यह मदन भैय्या हम सबको बता गये…

लताजी ने अपने एक साक्षात्कार में बताती हैं कि “पहले ग़ज़ल गाने का एक ख़ास रंग हुआ करता था। गिनी चुनी तर्जें हुआ करती थीं। मदन भैया ने अलग-अलग रंग के ग़ज़ल गानेवालों को सुना और जब खुद ग़ज़लों की तर्जें बनाना शुरू की तो उनमें अपना एक नया रंग भर दिया, जो अनोखा था। सुर ऐसे चुने जिनमें सोज़ भी था, सुरूर भी… इसीलिए उनकी ग़ज़लों के तेवर भी अलग थे। एक अजीब बांकपन था, फिल्मों के लिए ग़ज़लों की तर्जें कैसे बनाई जाती हैं, उन्हें कितने रूपों में पेश किया जा सकता है, यह मदन भैय्या हम सबको बता गये हैं।”

Madan Mohan: “नैना बरसे रिमझिम रिमझिम” गाने से जुड़ी मदन की दर्दनाक दास्तान…

आप सबने “वो कौन थी” का गाना “नैना बरसे रिमझिम रिमझिम” तो जरूर सुना होगा लेकिन इस गाने के बनने की कहानी बेहद दर्दनाक है । हुआ यूँ कि मदनजी के भाई प्रकाश दिल्ली से मुंबई के बीच रेल से यात्रा कर रहे थे। लेकिन यात्रा के दौरान कुछ कुख्यात लुटेरों ने प्रकाशजी की हत्या कर दी। मदनजी अपने सहयोगी घनश्यामजी के साथ भरे मन से घटना स्थल तक पहुँचे और अपने भाई की लाश को लेकर मुंबई लौटे। अंतिम संस्कार करने के बाद मदन मोहन कुछ ऐसी विचित्र मानसिक स्थिति में आए कि उन्होंने अपने आपको दो-तीन दिनों के लिए अपने कमरे में बंद कर लिया। जब कुछ समय बीत गया तो परिजन चिंतित हुए और घनश्यामजी को आगामी रिकॉर्डिंग्स के डेट्स को लेकर परेशानी का सामना करना पड़ा। हिम्मत करके घनश्यामजी ने मदनजी का दरवाज़ा खटखटाया और उन्हें बताया कि “इस फ़िल्म के गीत की रिकॉर्डिंग के लिए आज स्टूडियो लताजी को बुक किया हुआ है।” घनश्यामजी ने परिस्थिति के मद्देनज़र पूछा कि “क्या स्टूडियो की बुकिंग कैंसिल करके लताजी को ख़बर कर दूँ?” मदनजी का उत्तर चौंकाने वाला था , “उन्होंने कहा नहीं घनश्याम रिकॉर्डिंग आज ही होगी।”और वो कौन थी का दर्दभर गाना “नैना बरसे रिमझिम रिमझिम” बना । वाकई में ये मदन जी जैसे महान संगीतकार ही कर सकते थे।

Madan Mohan: केवल महिला पा‌र्श्वगायिका के लिये हीं संगीत दे सकते हैं…

"गज़लों का शहज़ादा" थे महान संगीतकार मदन मोहन
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मदनमोहन केवल महिला पा‌र्श्वगायिका के लिये हीं संगीत दे सकते हैं वह भी विशेषकर लता मंगेश्कर के लिये …ये चर्चा फिल्म इंडस्ट्री में पचास के दशक में जोरों पर थी लेकिन सबको गलत ठहराते हुये वर्ष 1957 में प्रदर्शित फिल्म “देख कबीरा रोया” में पा‌र्श्व गायक मन्ना डे के लिये दिल को छू लेने वाला संगीत देकर मदनमोहन ने उनके बारे में फैली धारणा पर रोक लगा दी। “कर चले हम फिदा जानों तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों” वर्ष 1965 में प्रदर्शित फिल्म “हकीक़त” में मोहम्मद रफी की आवाज़ में मदनमोहन के संगीत से सजा यह गीत तो हम सभी को आज भी याद है जिसे लिखा था कैफी आज़मी साहेब ने जो आज भी श्रोताओं में देशभक्ति के जज्बे को बुलंद कर देता है।

अपनी हर फिल्मों के लिये लता दीदी को हीं क्यों लिया करते हैं?…

मदनमोहन के संगीत निर्देशन में आशा भोंसले ने फिल्म “मेरा साया” के लिये गाना गाया जो बेहद हिट रहा लेकिन मदनमोहन से आशा भोंसले को अक्सर यह शिकायत रहा करती थी कि “आप अपनी हर फिल्मों के लिये लता दीदी को हीं क्यों लिया करते हैं?” इस पर मदनमोहन कहा करते थे कि “जब तक लता जिंदा है मेरी फिल्मों के गाने वही गायेंगी।”

जब संगीतकार नौशाद अपनी सारी धुन के बदले मदन की एक धुन लेना चाहते थे…

मदन मोहन ने अपने लगभग ढाई दशक के सिने कैरियर में 100 से अधिक फिल्मों के लिए संगीत दिया। लेकिन एक गज़ल ऐसी थी कि जिसे सुनकर संगीतकार नौशाद इतने प्रभावित हुये कि उन्होंने मदनमोहन से इस धुन के बदले में अपनी सारी मधुर धुन देने की ख्वाहिश ज़ाहिर की और वो मशहूर गज़ल अनपढ़ फिल्म की “आपकी नजरों ने समझा प्यार के काबिल मुझे” थी। ऐसा था मदन मोहन जी का संगीत जिसके मुरीद सभी थे।

मदनमोहन के पसंदीदा गीतकार के तौर पर राजा मेहन्दी अली खान, राजेन्द्र और कैफी आज़मी का नाम सबसे पहले आता है। स्वर साम्राज्ञी लता मंगेश्कर ने गीतकार राजेन्द्र कृष्ण के लिये मदन मोहन की धुनों पर कई गीत गाये जो बेहद हिट रहे । वो गाने थे सपने में सजन से दो बातें एक याद रहीं एक भूल गयी, , ना तुम बेवफा हो, तुझे क्या सुनाऊँ दिलरुबा थीं। पचास के दशक में मदन मोहन के संगीत निर्देशन में राजेन्द्र कृष्ण के रचित रूमानी गीत भी काफी लोकप्रिय हुये। उनके रचित कुछ रूमानी गीतों में “कौन आया मेरे मन के द्वारे पायल की झंकार लिये”, “मेरा करार लेजा मुझे बेकरार कर जा” खास तौर से हैं जो आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में ज़िंदा हैं। मदनमोहन के संगीत निर्देशन में राजा मेहन्दी अली खान रचित गीतों में कुछ ऐसे गीत हैं जो हर जनरेशन में लोगों की पहली पसन्द रही है और वो मधुर गीत हैं लग जा गले, नैनो में बदरा छाये, मेरा साया साथ होगा।

"गज़लों का शहज़ादा" थे महान संगीतकार मदन मोहन
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वर्ष 1970 में प्रदर्शित फिल्म “दस्तक” के संगीत के लिये मदनमोहन को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मदन मोहन ने अपने ढाई दशक लंबे सिने कैरियर में लगभग 100 फिल्मों के लिये संगीत दिया। अपनी मधुर संगीत लहरियों से श्रोताओं के दिलों में खास जगह बना लेने वाले मदनमोहन ने 14 जुलाई 1975 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया । उनकी मौत के बाद वर्ष 1975 में हीं मदनमोहन की “मौसम” और “लैला-मजनू” फिल्में प्रदर्शित हुयी। जिनके संगीत का जादू आज भी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देता है। मदन मोहन जी की आखिरी फिल्म रही “वीर-जारा” जिसके गाने बेहद हिट रहे । आज मदन मोहन जी भले ही हमारे बीच में नहीं हैं लेकिन उनका संगीत हमेशा हमारे दिलों में बसा रहेगा।

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