Heeramandi Review: संजय लीला भंसाली के “हीरामंडी” के नगीनों की चमक फीकी रह गयी …   

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5 -1.5 STAR

NETFLIX पर कुल आठ एपिसोड की वेब सीरीज ‘हीरामंडी द डायमंड बाजार’ निर्माता-निर्देशक संजय लीला भंसाली का वो ख्वाब था जिसे वो तकरीबन 18 सालों से देख रहे थे … जिसकी कहानी कई साल पहले भंसाली ने मोईन बेग से सुनने के बाद से ही बुनना शुरू कर दिया था  और जो अब जाकर पूरा हुआ है। 4 साल का लम्बा इंतज़ार और बड़े रहस्मयी अंदाज में हीरामंडी के ट्रेलर जब भी लोगों के सामने आते तो बस यहीं लग रहा था कि इस बार  दर्शकों को संजय लीला भंसाली का खूबसूरत बेमिसाल शाहकार देखने को मिलेगा ….लेकिन जब हीरामंडी नेटफिल्कस पर आयी तो दर्शकों को बहुत ही नाउम्मीद कर गयी। बड़े- बड़े स्टारकास्ट और लाहौर की हीरामंडी की कहानी कहीं गुम सी नज़र आयी …या यूं कहें कि जिस हीरे की चमक की उम्मीद हम लगाए बैठे थे वो बड़े- बड़े सेट और स्टार कास्ट के चक्कर में बिखर कर रह गए।

संजय लीला भंसाली की फिल्मों की बात की जाए तो हमेशा उनकी सोच और बड़ा सेट लोगों को लुभाता रहा है लेकिन इस बार जो उन्होंने दिखाया वो केवल बड़े- बड़े सेट की नुमाइश तक ही सिमटकर रह गया।

बिखरी कहानी को एक ही माला में पिरोने की कोशिश…

 सबसे पहले बात करते हैं फिल्म की कहानी की …जिसमें कहानी में हर जगह बिखराव देखने को मिला …एक ही अंगूठी में हर एक नगीने को फिट करने के चक्कर में ये भूल गए कि कहानी को कैसे सटीक तौर पर दर्शकों को दिखाएं कि वो ऊबाऊ ना लगे । पूरे सीरीज में बस ऐसा ही लग रहा था कि कभी पाकीज़ा, कभी उमरावजान ,तो कभी मुगलेआज़म को दिखाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन जिस तरह का काम कहानी और किरदारों पर करना था वो कहीं पीछे ही छूट गया।

तवायफों की कहानी और उनकी रवायतों के बीच एक कश्मकश सी दिखायी पड़ी । न तो उनकी तहज़ीब को दिखा पाए और ना ही उनकी जुबान की वो मिठास नज़र आ पायी । अदब,अदायगी में संजय लीला भंसाली पूरी तरह से मात खा गए । जिस तरह की ज़बान का इस्तेमाल हुआ वो कहीं से तवायफों के उस क्लचर को दिखा नही पाया।  

ए एम तुराज के लिखे गीत और संजय लीला भंसाली का संगीत ज़रूर लोगों को पसंद आया लेकिन कुछ गाने फिल्मी ज्यादा लगे  ..फूल गेंदवा ना मार और सकल बन फूल रही सरसों जैसे  गीतों ने अपना जादू  छोड़ा लेकिन पाकीज़ा की तरह आप इसमें बैकग्राउंड म्यूजिक की उस रौनक को नहीं दिखा पाये जो एक कोठे के माहौल को बना पाता।  सुब्रत चक्रवर्ती व अमित रॉय के बनाए बड़े बड़े सेट्स ने ज़रूर लोगों को लुभाया। जिस तरह के शार्ट्स लिये गये वो पूरी सीरीज में एक भव्य और शानदार लुक देने में कामयाब रहे । लाईट्स ,इफेक्टस और छायांकंन की बात करें तो उसमें भंसाली का अक्स साफ दिखायी पड़ा लेकिन जिस तरह से ब्लू टोन और येलो टोन का इस्तेमाल रहा उससे किरदारों के एक्सप्रेशन को ऊभारने में चूक गये हालांकि  सीरीज का संपादन खुद संजय लीला भंसाली ने ही किया है जिससे उनके चाहने वालों को बहुत उम्मीद थी । अगर ये पूरी सीरिज़ देखी जायी तो ऐसा लगता है कि दिल बस यही कह उठता है कि गुज़रा हुआ ज़माना आता नहीं दोबारा …   

कहानी आजादी से ठीक कुछ साल पहले लाहौर के उस हीरामंडी की है जिसमें शाहीमहल का रूतबा हुआ करता था । तवायफें और नवाब इसके अहम किरदार हैं।। वेब सीरीज ‘हीरामंडी द डायमंड बाजार’ की कहानी है मल्लिका जान की। मल्लिका जान लाहौर के इस बदनाम और नामी कोठे की हुज़ूर कैसे बनी? और कैसे हुजूर के तौर पर  सबसे कद्दावर तवायफ के रूतबे को कायम किया ?

खूबसूरत किरदारों का जमावाड़ा,कमज़ोर अदायगी,बिखरी कहानी….

मनीषा कोईराला जो “शाही महल” की हुजूर हैं जिनका सिक्का पूरे शाही महल पर चलता है जिनकी एक आवाज़ पर लोग कांप उठते हैं जिनके कहे एक पत्ता भी शाही महल में हिल नहीं सकता, जिनकी खूबसूरती औऱ अदाओं के सभी कायल हैं । लेकिन  जब उनके किरदार की बात करें तो उसमें बड़ा कशमकश दिखायी दिया। कहीं उनका उम्मीद से ज्यादा नेगेटिव ,तो कहीं उम्मीद से ज्यादा पॉजीटिव किरदार था ये समझ नहीं आ रहा था कि आखिर भंसाली उनके किस शेड को दिखाना चाह रहे थे हालांकि मनीषा ने उम्मीद से ज्यादा बेहतरीन अदाकारी की और वो बला की खूबसूरत भी दिखीं।

कहानी में मल्लिका जान की दो फरमाबरदार बेटियां भी दिखायी गयी हैं बड़ी बेटी बिब्बोजान…यानि अदिती राव जो खूबसूरत और दिलकश अदाओं वाली फरमाबरदार तवायफ हैं लेकिन वहीं उनका किरदार एक क्रांतिकारी का भी दिखाया गया है। जहाँ वो पहले लुके-छिपे क्रांतिकारियों का साथ देती है तो बाद में बगावत करके अग्रेंजो की गोली का भी शिकार बनती है। अदिती के किरदार की बात करें तो ऐसा लगता है कि भंसाली ने उनके कांधे पर ज़रूरत से ज्यादा बोझ डाल दिया है। जिसकी वजह से वो अपने सभी किरदारों के साथ इंसाफ नहीं कर पा रही हैं, वहीं क्रांतिकारी के रूप में ऐसा लगता है वो पार्टटाईम जॉब कर रही हैं रात में वो दिलकश तवायफ हैं तो दिन में क्रांति की मशाल जलाती दिख रही हैं।

   अब बात करते हैं मल्लिका जान की दूसरी बेटी आलमजेब की…जो बगावत  अपनी शेरो शायरी को लेकर करती है । इस सीरीज में आलमजेब और ताजदार का किरदार अहम है जिसके चारों ओर हीरामंडी की  कहानी बुनी गयी है। शर्मीन यानी आलमज़ेब जो भंसाली की भांजी भी है जिनका किरदार पूरी सीरिज में सबसे कमज़ोर दिखा …न तो एक तवायफ के तौर पर उनकी खूबसूरती दिखी, न अदा ही दिखी और न नज़ाकत ही दिखी । शायरा के तौर पर तो वो एक चलताऊ शेर कहने वाली महज़ सीखी- सिखायी अदाकारा थीं । जिनमें उस वक्त के निशान गायब से दिखे … बेहद नीरस सी अदाएं ..याद करिए उमराव जान की उस रेखा को जिनकी निगाहें उठने पर भी दर्शक आहें भरने लगते थे और अदायगी तो इतनी गज़ब की कि हर कोई उमरावजान को भूल रेखा को ही उमरावजान समझ बैठा था , हो भी क्यों ना… वो शाहकार था मुज़फ्फर अली का जिन्होनें कहानी ,कॉस्ट्यूम,सेट, कलाकार हर एक नगीने को इस तरह से पिरोया था कि लोग आज भी उसमें खो जाते हैं । यहीं नहीं एक तवायफ के तौर पर रसूख और तवायफ होने के दर्द को भी बड़ी खूबसूरती से रेखा ने जिया और वो लोगों के दिलों को छू गया था लेकिन अफसोस भंसाली  एक कांच को हीरा समझने की भूल कर बैठे।

अगला किरदार जो अहम था वो ताज़दार यानि ताह शाह बद्दुशा का था जिनकी जुबान साफ और तलल्फुस बेहतरीन था जिनमें अदायगी भी थी लेकिन उस तरह से उन्हें डायरेक्टर दिखा नहीं पाए जिस तरह से उनका किरदार बेहद मज़बूत था, वो क्रांतिकारी कम आशिक ज्यादा नज़र आए ।

इन दोनों बेटियों की अपनी अपनी कहानी के अलावा एक इकतरफा इश्क की कहानी लज्जो यानि रिचा चड्ढा की  है। जो शराब के नशे में धुत्त होकर एक देवदास की तरह दीवानी हो चुकी है। जिसकी दुनिया केवल इश्क से शुरू होती है और उसी पर खत्म हो जाती है । लज्जो को इस पूरी कहानी में ऐसी अदाकारा के तौर पर दिखाया गया है जो कहीं पाकीज़ा की मीना कुमारी तो कहीं मुगलेआज़म की मधुबाला बनने की कोशिश कर रही है लेकिन वो अपने ही किरदार लज्जो को बड़े ही बोरिगं अंदाज़ में दिखाती हैं । ऐसा लगता है कि उनसे कहा गया हो कि आप कॉपी की ओवरएक्टिंग करिए पर वो कुछ भी कर नहीं पा रही थी। आखिरी सीन में मुगलेआजम की मधुबाला बनते- बनते डायरेक्टर कब मीना कुमारी में ढालने की कोशिश करने लगते हैं वो साफ दिखता हैं। उसपर मनीषा कोईराला की एंट्री तो पाकीज़ा के आखिरी सीन की कॉपी लगता है जहां वो खुलेआम नवाबों की असलियत का मुज़ाहिरा करती हैं । ऐसा लगता है कि वो पाकीज़ा की नवाबजान बनने की कोशिश कर रही हैं लेकिन सीन भी सुपर फ्लॉप और फिल्म की कॉपी भी सुपर फ्लॉप दिखी । कमाल अमरोही, के आसिफ जैसे महान डायरेक्टर को कॉपी करते- करते कब भंसाली अपने ही किरदार को यानि डायरेक्टर के किरदार को सही से निभाना भूल गए शायद उन्हें भी पता नहीं चला होगा।

संजिदा शेख यानि मल्लिका और रेहाना की छोटी बहन वहीदा की बात करें तो उन्होंने अपने किरदार के साथ पूरा इंसाफ किया है उनमें जिस तरह के अलग –अलग शेड्स निभाये वो खूबसूरत भी लगे और अदायगी में भी वो बाकी किरदारों पर भारी पड़ी । देखा जाए तो संज़य लीला भंसाली का ये दागदार चेहरे वाला संजीदा शेख का किरदार सबसे बेहतरीन था  जिसमें अदा ,अदायगी ,जलन, शोखियां, गुस्सा सब नज़र आ रहा था कहीं कोई बनावट नहीं थी।

 हीरामंडी की कहानी में भी हर जगह बिखराव ही बिखराव दिखायी दिया। पूरी कहानी में सब कुछ मल्लिकाजान के हिसाब से ही चल रहा था कि तभी उसके अतीत का साया करवट लेता है। उसका पुराना गुनाह यानि बहन रेहाना का कत्ल नए तेवर में अपने पुराने रूप के साथ फरीदन यानि सोनाक्षी सिंहा के रूप में वापस लौट आता है। कोठों पर कब्जे के बीच ,आजादी की जंग और आपसी लड़ाई का तड़का भरपूर लगाने की कोशिश की गयी है। लेकिन जो नहीं है तो वो अदायगी,अदा और उम्फ नहीं है जो तवायफों के कोठों की रौनक हुआ करता थी ।

इसमें सबसे ज्यादा नाइंसाफी लज्जो के किरदार के बाद अगर किसी के साथ हुयी है तो वो सोनाक्षी के साथ हुयी है जिनके लुक से लेकर पहनावे ,बातचीत और किरदार की बात की जाए तो उनमें कहीं से भी तवायफों वाली नज़ाकत, नाज़-नखरे नज़र नहीं आते हैं ऐसा लगता है कि वो आज के मुंबई के रेडलाईट को प्रेजेन्ट कर रही हैं । 

शेखर सुमन ,अध्धयन सुमन ,फारदीन खान कहीं से भी नवाबों की तरह नहीं लगे और ना ही इस पूरी सीरीज में उनका कोई खास रोल दिखा । उत्सव फिल्म के शेखर सुमन को देखने के बाद तो आप इस शेखर सुमन के अधपके किरदार को पसंद नहीं करेंगे । फारदीन और अध्ययन सुमन से तो किरदार के साथ इंसाफ की उम्मीद कर पाना बेमानी है। फरीदा जलाल का किरदर भी कोई खास असर नहीं छोड़ पाया जिसकी उम्मीद दर्शक लगाए बैठे थे। तवायफों  और नवाबों के बीच चलने वाली इन मोहब्बत की कहानियों और अंग्रेज अफसरों को मोहरा बनाकर इस्तेमाल करने की तरकीबों के बीच उस्तादजी यानि हमारे इंद्रेश मलिक का किरदार अच्छा रहा।

कहानियों के भीतर कहानियों का चक्रव्यूह था….


बतौर निर्माता ,निर्देशक संजय लीला भंसाली ने हिंदी सिनेमा को जहाँ‘देवदास’ ‘गुजारिश’, ‘गोलियों की रासलीला रामलीला’  ‘हम दिल दे चुके सनम’,  ‘ब्लैक’, , ‘बाजीराव मस्तानी’ और ‘पद्मावत’ जैसी खूबसूरत और बेहतरीन फिल्में दीं ।बड़े कैनवास का वो सुनहरा दौर दिखाया। वो इस सीरीज में बिखर गया। फिल्म ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ की कहानी में जहाँ वो मुंबई की वेश्यामंडी की कहानी और दर्द को दिखाने में कामयाब हुए थे वहीं जब ये कहानी लाहौर की हीरामंडी तक पहुँची तो उसने दम तोड़ दिया।

मोईन बेग की उम्दा कहानी को भंसाली ,विभु पुरी के साथ मिलकर इसकी पटकथा को संभाल नहीं पाए। दिव्य निधि के डायलॉग्स की बात की जाए तो साफ झलकता है कि उन्हें उर्दू की मिठास और अदब की तालीम लेने की सख्त ज़रूरत है । कुल मिलाकर इस सीरीज़ में देखें तो ज़रूर ए एम तुराज की मौसिकी ने लोगों को बाँधने की कोशिश की है लेकिन सिंगर में और मेच्योर सिंगर होते तो ज्यादा मज़ा आता। श्रेया घोषाल की आवाज़ ने ज़रूर लोगों के कान में मिठास घोली लेकिन नूरजहाँ, श्मशाद बेगम , शोभा गुटरू ,गिरीजा देवी ,बेगम अख्तर की मौसिकी को सभी ने मिस किया  ।

कलाकारों की इस पूरी हीरामंडी के सभी नगीने फीके दिखें । तवायफों, नवाबों , ब्रिटिश हुक्मरानों को बुनती हुयी लचर कहानी में क्रांति की मशाल की लौ भी मद्धम पड़ गयी । जिस सीरीज का हम सभी लम्बे अर्से से इन्तज़ार कर रहे थे वो सीरीज बेहद बोझिल औऱ बिखरी हुयी लगी लेकिन इन सब के बीच बड़े- बड़े सेट की खूबसूरती और क्रान्ति की मशाल जलाने वाली तवायफों की कहानी की हल्की सी झलक से ज़रूर नयी पीढ़ी रूबरू हुयी और यही चीज़ यंग जनरेशन को नयापन दे गयी । पर अगर पाकीज़ा ,मुगलेआजम ,उमरावजान के कद्रदानों की बात करें तो संजय लीला भंसाली ने काफी निराश किया।  

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