Russia-Ukraine War से जुड़े हर पहलू को विस्तार से समझें, पढ़ें Inside Story…

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Russia Ukraine Conflict
रूस और यूक्रेन के बीच जंग।

Russia-Ukraine War: रूस और यूक्रेन के बीच विवाद की वैसे तो कई वजह हैं लेकिन सबसे बड़ी वजह नाटो यानी नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन को माना जाता है। 1949 में सोवियत संघ से निबटने के लिए नाटो का गठन किया गया था। अमेरिका और ब्रिटेन समेत दुनिया के 30 देश नाटो के सदस्य हैं। नाटो के किसी सदस्य पर हमला पूरे नाटो देशों पर माना जाता है। सभी नाटो सदस्य देश एकजुट होकर हमलावर देश का मुकाबला करते हैं। यूक्रेन भी नाटो में शामिल होना चाहता था लेकिन रूस को यूक्रेन का ये कदम रास नहीं आया।

दरअसल रूस का मानना है कि अगर यूक्रेन नाटो में शामिल हुआ तो उसके सैनिक रूस-यूक्रेन की सीमा पर डेरा जमा लेंगे और रूस के लिए ये बड़ी खतरे की घंटी होगी। रूस चाहता है कि नाटो अपना विस्तार न करे। राष्ट्रपति पुतिन इसी मांग को लेकर यूक्रेन और पश्चिमी देशों पर दवाब डाल रहे थे। नाटो में 30 लाख से अधिक सैनिक हैं। रूस के पास सिर्फ 12 लाख सैनिक हैं जिसकी वजह से रूस को खतरा महसूस होता है।

Russia-Ukraine War: पुतिन चाहते हैं कि यूक्रेन किसी भी कीमत पर नाटो का सदस्य न बने

Russia-Ukraine War: Russian President Vladimir Putin
Russia-Ukraine War: Russian President Vladimir Putin

रूसी राष्ट्रपति पुतिन चाहते हैं कि यूक्रेन किसी भी कीमत पर नाटो का सदस्य न बने। नाटो यूक्रेन को कभी शामिल नहीं करने का आश्वासन दे। नाटो उन देशों को शामिल न करें, जो यूरोपीय संघ से अलग हुए।

वहीं गैस पाइपलाइन भी युद्ध की वजह है। रूस इस पाइपलाइन के जरिए गैस यूरोप तक भेजता था। ये पाइपलाइन यूक्रेन से होकर जाती थी। रूस को ट्रांजिट शुल्क के रूप में मोटी रकम देनी पड़ती थी। रूस हर साल करीब 33 बिलियन डॉलर का भुगतान कर रहा था। ये राशि यूक्रेन के कुल बजट की 4 फीसदी थी। रूस इसी आर्थिक बोझ को कम करना चाहता था। इसके लिए पुतिन यूक्रेन के कुछ क्षेत्रों को कब्जाने की फिराक में थे ताकि गैस भेजना आसान हो जाए।

Russia-Ukraine War: रूस और यूक्रेन के बीच तनाव नवंबर 2013 में शुरू हुआ, जब यूक्रेन के तत्कालीन राष्ट्रपति विक्टर यानूकोविच का कीव में विरोध शुरू हुआ। विक्टर को रूस का समर्थन था। विक्टर को अमेरिका-ब्रिटेन समर्थित प्रदर्शनकारियों के विरोध के कारण देश छोड़कर भागना पड़ा।  इससे खफा होकर रूस ने दक्षिणी यूक्रेन के क्रीमिया पर कब्जा कर लिया। इसके बाद वहां के अलगाववादियों का समर्थन किया।

इन अलगाववादियों ने पूर्वी यूक्रेन के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया है। 2014 के बाद से रूस समर्थक अलगाववादियों और यूक्रेन की सेना के बीच डोनबास प्रांत में संघर्ष चल रहा था। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन ने यूक्रेन के राष्ट्रपति जलेंस्की को कई बार आगाह किया लेकिन जलेंस्की नहीं माने।

Russia-Ukraine War: अमेरिका और पश्चिम के देशों की शह पर उनका हौसला बढ़ता गया और आखिरकार रशिया ने वो कर दिया जिसके बारे में सिर्फ अनुमान ही लगाया जा रहा था। दोनों मुल्कों में तनातनी बढ़ी और डोनेट्स्क और लुहांस्क को रूस ने अलग मुल्क के तौर पर मान्यता दे दी।

इसके बाद 24 फरवरी को यूक्रेन पर हमला बोल दिया। पुतिन को उम्मीद थी कि दो चार दिन में वो यूक्रेन को झुका देंगे लेकिन एक महीने बाद भी पुतिन का ख्वाब पूरा नहीं हो सका।

Russia-Ukraine War: रूस के खिलाफ पश्चिमी देशों का चक्रव्यूह

Joe Biden
Joe Biden

यूक्रेन को सबक सिखाने के लिए पुतिन ने अमीर और ताकवतर मुल्कों से पंगा लिया। पुतिन को हर तरह से डराया गया। चेतावनी दी गई लेकिन रूस के हितों की खातिर पुतिन ने वही किया जो उन्हें अच्छा लगा। अमेरिका और पश्चिम देश रूस को युद्ध करने से तो नहीं रोक सके लेकिन इस युद्ध के बहाने अब रूस को चौतरफा घेरने की कोशिश जरूर हो रही है।यूक्रेन पर रूसी हमले की तुलना 1979 के सोवियत संघ के अफ़ग़ानिस्तान पर हमले से की जा रही है। अफगानिस्तान से सोवियत संघ को 10 साल के अंदर शिकस्त खाकर लौटना पड़ा था।

Russia-Ukraine War: अमेरिका में कुछ प्रभावशाली शख़्सियतें चाहती हैं कि यूक्रेन के बहाने रूस को दलदल में फंसाया जाए। जैसे अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत संघ को फंसाया था। अफगानिस्तान में सोवियत फौज की भारी शिकस्त हुई थी। अमेरिका-नेटो ने अफ़ग़ानिस्तान में मुजाहिदीन तैयार किए थे। सोवियत सैनिकों ने 1979 को अफ़ग़ानिस्तान पर आक्रमण किया था
10 साल तक वहां रहने के बाद 1989 में हार के बाद भागना पड़ा।

Russia-Ukraine War: अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने अपने हालिया ‘स्टेट ऑफ़ द यूनियन’ संबोधन में इसी पॉलिसी को अपनाने की तरफ़ इशारा भी किया था। उस भाषण में उन्होंने कहा था कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को यूक्रेन पर हमला करने के बदले एक लंबे अरसे तक क़ीमत चुकानी पड़ेगी। दरअसल अमेरिका और उसके नाटो सहयोगी देशों ने ये साफ़ तौर पर तय कर लिया है कि वो इस लड़ाई में सीधे तौर पर शामिल नहीं होंगे लेकिन रूस को उलझाकर रखेंगे।

ये चाहते हैं कि आर्थिक-सैन्य रूप से रूस को कमज़ोर किया जाए। पुतिन को विलेन की तरह पेश किया जाए। रूस को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग किया जाए। यूक्रेन के अंदर जारी प्रतिरोध को मदद दे कर जिंदा रखा जाए। युद्ध लंबा खिंचा तो यूक्रेन स्थायी युद्ध क्षेत्र बन जाएगा।

Russia-Ukraine War: इस समय युद्ध के साथ-साथ रूस और यूक्रेन ने बातचीत के ज़रिए मसले का हल निकालने की कोशिश भी कर रहे हैं लेकिन माना जा रहा है कि रूस केवल अपनी शर्तों पर ही यूक्रेन से वापस जाएगा। पुतिन की जो अहम शर्तें हैं उनमें 1. यूक्रेन नेटो में शामिल न हो, 2. यूक्रेन की सेना हथियार डाल दे और यूक्रेन क्राइमिया को मान्यता दे, 3. रूसी समर्थन वाली सरकार स्थापित हो शामिल हैं।

लेकिन पुतिन की यूक्रेन ने शर्तें मान लीं तो हार अमेरिका और नाटो की होगी। इसलिए इन शर्तों का पूरा होना लगभग नामुमकिन है।  दरअसल रूस यूक्रेन को सजा देना चाहता है। रूस ने जॉर्जिया के साथ भी ऐसा ही किया था। 2006 में जॉर्जिया नाटो में शामिल होना चाहता था।

जॉर्जियाई संसद में प्रस्ताव भी पास हो गया था। जनमत संग्रह में भी 77 फीसदी लोग पक्ष में नजर आए। 2008 में नाटो जॉर्जिया को सदस्य बनने का समर्थन किया। अगस्त 2008 में रूस ने जॉर्जिया पर हमला कर दिया। जॉर्जिया के अबकाजिया, दक्षिण ओसेशिया पर कब्जा कर लिया। उन्हें स्वतंत्र राज्यों के रूप में मान्यता दे दी। जॉर्जिया अभी तक नाटो में शामिल नहीं हुआ है।

अमेरिकी रक्षा सचिव लॉयड ऑस्टिन ने अक्टूबर 2021 में कहा था कि यूक्रेन और जॉर्जिया अभी भी नाटो में शामिल हो सकते हैं। इसके बाद पुतिन ने तैयारी शुरू कर दी और आखिरकार 24 फरवरी को यूक्रेन पर हमला कर दिया और अब मकसद पूरे हुए बिना पुतिन के वापस लौटने की संभावनाएं बेहद कम हैं।

Russia-Ukraine War: युद्ध का ज्यादा असर इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर होगा:

Crude Oil

Russia-Ukraine War: पोलैंड-तुर्की के रूस से मज़बूत व्यापारिक रिश्ते रहे। युद्ध का ज्यादा असर इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर होगा। पोलैंड ज़रूरत का आधा ईंधन रूस से आयात करता है। तुर्की ज़रूरत का एक तिहाई कच्चा तेल रूस से लेता है। बात करें अमेरिका और चीन की तो रूस के साथ अमेरिका का व्यापार जीडीपी का महज 0.5 फ़ीसदी है। चीन के लिए ये आंकड़ा 2.5 फ़ीसदी के करीब है। इन पर रूस-यूक्रेन संकट का अधिक असर नहीं होगा। वैश्विक आर्थिक विकास रफ़्तार 0.2% कम हो सकती है यानी ये 4 फ़ीसदी से कम हो कर 3.8 फ़ीसदी रह सकती है।

युद्ध का सबसे ज्यादा असर खुद रूस पर ही होगा क्योंकि कच्चे तेल के उत्पादन में रूस तीसरे नंबर पर है। 2020 में रूस ने रोज 1.05 करोड़ बैरल तेल का उत्पादन किया। इसमें से 50 से 60 लाख बैरल तेल निर्यात किया। इसमें से आधा केवल यूरोप को निर्यात किया। आठ मार्च को अमेरिका ने रूस से तेल की खरीद को लेकर प्रतिबंध लगाए और ब्रिटेन ने 2022 तक रूस से तेल खरीदना पूरी तरह बंद करने का ऐलान किया।

रिसर्च कंपनी थंडर सेड एनर्जी के मुताबिक युद्ध की वजह से कच्चे तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं जबकि रूस के उप प्रधानमंत्री अलेक्ज़ेंडर नोवाक खुद कह चुके हैं कि कच्चे तेल की कीमतें 300 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। जाहिर है कच्चे तेल के बढ़ने से जरूरी सामान की कीमतें भी बढ़ जाएंगी।

Russia-Ukraine War: भारत पर क्या होगा असर?

भारत की बात करें तो भारत अपनी आवश्यकता का 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। कच्चे तेल की कीमतें बढने पर अधिक डॉलर का भुगतान करना पड़ेगा,  जिससे डालर मजबूत होगा और रुपया कमजोर। जिससे आयात महंगा हो जाएगा और महंगाई बढ़ेगी।

भारत के चालू खाते का घाटा भी बढ़ जाएगा। हालांकि केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने संसद में कहा कि भारत का रूस से कच्चे तेल का आयात एक प्रतिशत से भी कम है। जनवरी तक यह कुल आयात का केवल 0.2 प्रतिशत है। खाद्य तेलों की 70 % से अधिक मांग आयात से पूरी करता है। 70 % से अधिक सूरजमुखी तेल यूक्रेन से आता है। आपूर्ति बाधित होने का असर कीमतों पर दिख रहा है। प्लेरियम का प्रमुख उत्पादक देश रूस है। लियान का प्रमुख उत्पादक देश यूक्रेन है। आपूर्ति बाधित होने से सेमीकंडक्टर महंगे हो जाएंगे। सेमीकंडक्टर महंगे होने से बिजली का सामान महंगा होगा।

यूक्रेन युद्ध के बाद एचडीएफसी बैंक ने अपनी ताजा रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2022-23 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर को 8.2 प्रतिशत से घटाकर 7.5 से 7.8 प्रतिशत तक रहने का अनुमान व्यक्त किया है। जाहिर है रूस-यूक्रेन युद्ध का अभी खास असर भारत पर ना पड़े लेकिन युद्ध लंबा चला तो भारत समेत कई देशों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

Russia-Ukraine War: यूक्रेन पर रूसी हमले का मामला इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में भी पहुंचा

यूक्रेन पर रूसी हमले का मामला इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में भी पहुंचा। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने रूस को यूक्रेन में सैन्य कार्रवाई तत्काल रोकने का आदेश दिया लेकिन आदेश का पालन नहीं हुआ। वैसे तो इस अदालत के फैसले बाध्यकारी हैं, लेकिन इसके पास अपने आदेश का पालन कराने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। 24 फरवरी को रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था। रूस ने पूर्वी यूक्रेन में रूसी भाषी लोगों के नरसंहार का तर्क दिया था। यूक्रेन ने इसे निराधार बताया था।

अंतरराष्ट्रीय कोर्ट ने यूक्रेन की गुहार तो सुनी लेकिन रूस पर नकेल कसने में वो अभी कामयाब नहीं हुआ वैसे तो अंतरराष्ट्रीय अदालत के फैसले बाध्यकारी हैं, लेकिन इसके पास अपने आदेश का पालन कराने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। जो देश अदालत के आदेशों का पालन करने से इन्काईर करते हैं, उन्हें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भेजा जा सकता है लेकिन यहां रूस के पास वीटो पावर है।

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