भाजपा नेता और पूर्व वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा की अध्यक्षता वाली वित्तीय मामलों की संसद की स्थायी समिति द्वारा जारी की गई ताजा रिपोर्ट में भारत में बड़ी तकनीकी कंपनियों (Big Tech) को लेकर कई सिफारिशें की हैं। समिति की मुख्य सिफारिशों में एक निष्पक्ष, पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करने के लिए एक डिजिटल प्रतिस्पर्धा अधिनियम (Digital Competition Act) लाने को लेकर भी सिफारिश की गई है।
ये समिति प्रतिस्पर्द्धा संशोधन विधेयक, 2022 के जरिये किए जाने वाले प्रतिस्पर्द्धा कानून में संशोधन की समीक्षा कर रही थी।
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क्या होती हैं Big Tech कंपनियां?
दुनिया की सबसे बड़ी तकनीकी कंपनियां जिनकी बाजार में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी भी है को बिग टेक कंपनियां कहा जाता है। इन कंपनियों का दुनिया भर के इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले यूजर्स पर सबसे अधिक प्रभाव होता है। आम तौर पर इन कंपनियों को ‘बिग फाइव’ के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि इसमें पांच कंपनियां शामिल है जिनमें अमेजन (Amazon), एप्पल (Apple), फेसबुक – मेटा (Facebook अभी Meta), गूगल (Google) और माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft) शामिल हैं।
क्या कहा संसदीय समिति ने?
संसदीय समिति ने महत्वपूर्ण डिजिटल इंटरमीडियरीज (गूगल, फेसबुक आदि) (Systemically Important Digital Intermediaries – SIDI) की पहचान और इनकी बिना किसी सबूत के की गई किसी भी व्याख्या को न अपनाने के अलावा उनके व्यवहार को विनियमित करने से लेकर इनके लिए कानूनी प्रावधानों को तैयार करने को भी कहा है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि ‘समाचार प्रकाशक’ (News Publishers) निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत SIDI के साथ करार करने में सक्षम हो सकें।
गुरुवार 22 दिसंबर को संसद में पेश की गई अपनी ‘बिग टेक द्वारा प्रतिस्पर्धा-विरोधी व्यवहार’ (Anti-competitive Practices by Big Tech) पर अपनी रिपोर्ट में, समिति ने कहा कि एक निष्पक्ष, पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र सुनिश्चित करने के लिए एक डिजिटल प्रतिस्पर्धा अधिनियम (Digital Competition Act) की जरूरत है, जो न केवल देश के लिए एक जरूरी कदम होगा बल्कि दुनिया की उभरती हुई नई स्टार्ट-अप अर्थव्यवस्था के लिए भी फायदेमंद होगा।

समिति ने सिफारिश की है कि भारत को सबसे बड़ी कंपनियों की पहचान करनी चाहिए जो अपनी पहुंच का फायदा उठाकर छोटी कंपनियों को दबाने का काम करती हैं। इसके अलावा ये भी सिफारिश की गई हैं कि वर्तमान में किए जा रहे पूर्व पोस्ट मूल्यांकन के बजाय प्रतिस्पर्धी व्यवहार का शुरुआत में मूल्यांकन किया जाना चाहिए, इससे पहले से ही बड़ी कंपनियों का बाजार से एकाधिकार समाप्त हो जाए।
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मीडिया के लिए क्या है?
संसदीय समिति का मानना है कि समाचार प्रकाशकों (Publishers) को निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया के जरिये SIDIs के साथ सीधा करार स्थापित करने के लिए नये नियमों की जरूरत है जिससे समाचार प्रकाशक उनके साथ समझौता करने में सक्षम हों।
समिति ने यह भी सिफारिश की है कि एक SIDI को ऑनलाइन विज्ञापन देने के लिए प्लेटफॉर्म की मुख्य सेवाओं का उपयोग करने वाले तृतीय पक्षों (Third Parties) की सेवाओं का उपयोग करने वाले आखिरी यूजर्स के व्यक्तिगत डेटा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
समिति ने कहा है कि SIDI को विज्ञापन देने वाले और प्रकाशकों को जांचने और उनके प्रदर्शन को देखने के लिए उपकरण और विज्ञापन देने वाले (advertisers) और प्रकाशकों के लिए आवश्यक डेटा तक पहुंच प्रदान करनी चाहिए, ताकि विज्ञापन देने वाला अपने खर्च की जाने वाली रकम का स्वतंत्र सत्यापन कर सके।
SIDI पर लिए जरूरी काम?
समिति ने SIDI को उनके राजस्व, बाजार पूंजीकरण और सक्रिय व्यवसाय और यूजर्स की संख्या के आधार पर पहचानने पर जोर दिया। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि, “भारत को व्यवस्थित रूप से महत्वपूर्ण डिजिटल मध्यस्थों (गूगल, फेसबुक) के व्यवहार को पूर्व में विनियमित करने के लिए लायी गई परिभाषाओं को अपनाना चाहिए जैसा कि पहले ही दुनिया भर के विभिन्न कानूनों द्वारा किया जा चुका है”।
समिति ने सिफारिश की कि भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (Competition Commission Of India – CCI) और केंद्र सरकार के साथ काम करने वाले हितधारकों को मिलकर SIDI की उचित परिभाषा करनी चाहिए।

विलय और अधिग्रहण
समिति ने कहा कि संपत्ति और टर्नओवर की मौजूदा सीमा के तहत कुछ विलय (Merger) नहीं किये जा रहे है, समिति ने सिफारिश की कि SIDIs को CCI को किसी भी अधिग्रहण के बारे में बताना होगा कि वो डिजिटल क्षेत्र में सेवाएं प्रदान करते हैं या नहीं या फिर डेटा के संग्रह करते हैं या नहीं। इसके अलावा समिति ने ये बी सुझाव दिया है कि सीसीआई के तहत डिजिटल मार्केट यूनिट की स्थापना की जाए।
गूगल पर लग चूका है जुर्माना
हाल ही में भारतीय प्रतिस्पर्द्धा आयोग (CCI) ने एंड्रॉइड मोबाइल डिवाइस के क्षेत्र में ‘‘अपनी प्रमुख स्थिति का दुरुपयोग’’ करने के लिये गूगल पर 1,337.76 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था। गूगल को 2019 में डिवाइस बनाने वाली कंपनियों पर अपनी शर्तें थोपने का दोषी पाया गया था। इसके अलावा, गूगल प्ले स्टोर ऐप्स को लेकर भी गूगल पर लगातार आरोप लगते रहे हैं है।