देशभर में निजी कोचिंग संस्थानों की फीस प्रणाली को लेकर बढ़ती शिकायतों के बीच रायपुर के सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने इस मुद्दे को संसद में मजबूती से उठाया है। उन्होंने लोकसभा में नियम 377 के तहत केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा कि लाखों छात्र और उनके परिवार तथाकथित “फीस-ट्रैप” का शिकार हो रहे हैं, जिससे उन्हें आर्थिक और मानसिक दोनों स्तरों पर भारी नुकसान उठाना पड़ता है।
सांसद अग्रवाल ने कहा कि इंजीनियरिंग, मेडिकल और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं—जैसे IIT, NIT, AIIMS और UPSC—की तैयारी कराने वाले कई कोचिंग संस्थान एडमिशन के नाम पर आकर्षक दावे करते हैं और छात्रों से एकमुश्त भारी फीस वसूल लेते हैं। गरीब, ग्रामीण और मध्यम वर्गीय परिवार अपने बच्चों के भविष्य के लिए जमीन, गहने बेचकर या कर्ज लेकर फीस जमा करते हैं। लेकिन अगर छात्र पढ़ाई के माहौल से संतुष्ट न होकर बीच में कोचिंग छोड़ना चाहते हैं, तो संस्थान फीस लौटाने में टालमटोल या मनमानी करते हैं।
उन्होंने बताया कि शिक्षा मंत्रालय ने वर्ष 2024 में कोचिंग संस्थानों के लिए कुछ दिशानिर्देश जारी किए थे, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उनका पालन प्रभावी ढंग से नहीं हो रहा है। अग्रवाल ने जोर देकर कहा कि यह समस्या सिर्फ स्कूली छात्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि बड़े शहरों में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं को भी इसका सामना करना पड़ता है।
सांसद अग्रवाल द्वारा सरकार से किए गए प्रमुख आग्रह
सांसद ने सरकार के सामने तीन प्रमुख सुझाव रखे।
- पहला, सभी राज्यों में यह नियम अनिवार्य किया जाए कि यदि कोई छात्र बीच सत्र में कोचिंग छोड़ता है तो 10 दिनों के भीतर फीस रिफंड किया जाए।
- दूसरा, कोचिंग संस्थानों से जुड़े विवादों के समाधान के लिए राज्यों में फास्ट-ट्रैक निवारण सेल स्थापित किए जाएं।
- तीसरा, 2024 की गाइडलाइंस का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए और उल्लंघन करने वाले संस्थानों पर कार्रवाई हो।
अग्रवाल ने यह भी कहा कि उनका संसदीय कार्यालय छात्रों की शिकायतों के लिए चौबीसों घंटे उपलब्ध है। उन्होंने चेताया कि कोचिंग सेक्टर में बढ़ती व्यावसायिक प्रवृत्ति और “मोनोपॉली” के कारण शिक्षा सेवा के बजाय कारोबार बनती जा रही है, जिसे नियंत्रित करना समय की मांग है।









