Same Sex Marriage को मान्‍यता देने की मांग पर बोली केंद्र सरकार- कोर्ट इस फैसले को संसद पर छोड़े

Same Sex Marriage: विवाह के अधिकार में राज्य को विवाह की नई परिभाषा बनाने के लिए बाध्य करने का अधिकार शामिल नहीं है, ऐसे में संसद कानून बना सकती है।SG तुषार ने कहा कि विवाह भारत में विवाह पवित्र मिलन और एक संस्कार है।

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Same Sex Marriage:समलैंगिक जोड़ों को शादी की मान्यता देने की मांग के मामले पर केंद्र सरकार की ओर से SG तुषार मेहता ने दलील देना शुरू किया।SG ने कहा कि ये एक सामाजिक मुद्दा है। अदालत को इसे विचार करने के लिए संसद पर छोड़ देना चाहिए।उन्होंने कहा याचिकाकर्ताओं को विवाह के लिए सामाजिक मान्यता चाहिए यह प्रमुख मुद्दा है।समलैंगिक जोड़ों को शादी की मान्यता देने की मांग के मामले पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई।

उन्होंने कहा कि 160 प्रावधान है जिसके आधार पर य़ह कहा जा सकता है कि उनको विवाह की मान्यता नहीं दी जा सकती। SG ने कहा इससे पहले एक बहस होनी चाहिए।विभिन्न हितधारकों से परामर्श किया जाना चाहिए।

राष्ट्रीय दृष्टिकोण, विशेषज्ञों को ध्यान में रखा जाना चाहिए और विभिन्न कानूनों पर प्रभाव पर भी विचार किया जाना चाहिए। भारतीय कानूनों और पर्सनल लॉ में विवाह की विधायी समझ केवल एक जैविक पुरुष और जैविक महिला के बीच विवाह को संदर्भित करती है।SG ने कहा कि सभी कानून, क़ानून “पारंपरिक पुरुष और महिला” पर विचार करते हैं।

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Supreme Court.

Same Sex Marriage:SG ने कहा शादी का अधिकार भी संपूर्ण नहीं

Same Sex Marriage:कोई भी मूल्य निर्णयों पर नहीं बैठा है, कोई कलंक नहीं है।संसद यौन पसंद, स्वायत्तता, पसंद और गोपनीयता के अधिकार को स्वीकार कर रही है।उन्होंने कहा कि मसला यह है कि क्या एक सामाजिक संस्था के तौर पर शादी करने का अधिकार न्यायिक घोषणा के जरिए दिया जा सकता है?

विवाह के अधिकार में राज्य को विवाह की नई परिभाषा बनाने के लिए विवश करने का अधिकार शामिल नहीं नवतेज जौहर के बाद ट्रांसजेंडर एक्ट आया। यहा सीमित प्रश्न यह है कि क्या विवाह के अधिकार को कोर्ट द्वारा अधिकार के रूप में मांगा जा सकता है?
Same Sex Marriage: SG ने कहा शादी का अधिकार भी संपूर्ण नहीं है क्योंकि इसके लिए भी कानून हैं कि कितनी उम्र में शादी की जा सकती है।विवाह के अधिकार में राज्य को विवाह की नई परिभाषा बनाने के लिए बाध्य करने का अधिकार शामिल नहीं है, ऐसे में संसद कानून बना सकती है।

SG तुषार ने कहा कि विवाह भारत में विवाह पवित्र मिलन और एक संस्कार है। य़ह धर्म से जुड़ा एक मुद्दा है और संस्थाएं धर्म के मुताबिक उसे मान्यता देती हैं। यह समाज का एक आधार है। इतना ही नहीं विवाह, दो विपरीत लिंग के बीच की परंपरा है, जो विभिन्न धर्मों में स्पष्ट हैं। समलैंगिग जोड़ो को कानूनी मान्यता देना एक ऐसा मुद्दा है जिस पर अदालत को नहीं बल्कि संसद को विचार करना चाहिए।

Same Sex Marriage: विवाह धर्म से जुड़ा एक मुद्दा

Same Sex Marriage: SG ने कहा विवाह धर्म से जुड़ा एक मुद्दा है। यही वजह है कि संस्थाएं धर्म के मुताबिक उसे मान्यता देती हैं। यह हमारे समाज का आधार है। इसके कई शेड्स और स्पेक्ट्रम हैं, हम केवल LGBTQIA के साथ काम नहीं कर रहे हैं। अलग-अलग कानूनों के 160 प्रावधान हैं और हम इन कई स्पेक्ट्रम और रंगों के साथ कैसे सामंजस्य बिठा पाएंगे?

अदालती फैसले के माध्यम से अन्य कानूनों के साथ स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत समाधान करना असंभव है। य़ह संसद के लिए भी मुश्किल होगी। क्या अदालत के लिए नियम बनाना विवेकपूर्ण होगा?  
हम एक ऐसे वर्ग के साथ डील कर रहे हैं जिसकी आइडेंटिटी में 70 से ज्यादा शेड हैं। क्या ऐसे में न्यायिक पक्ष पर इस विषय से निपटना विवेकपूर्ण होगा?

उन्होंने कहा कोर्ट शादी पर रोक की जांच नहीं कर रहा है।LGBTQIA के लिए शादी करने पर कोई रोक नहीं है। न्यायालय से विवाह को कानूनी दर्जा देने के लिए कहा जा रहा है।जिसे सभी धर्म एक संस्था मानते हैं।चाहे वो हिंदू धर्म,सिख या अन्य धर्म हो।

विवाह कानूनी स्थिति के साथ प्रदान की गई एक सामाजिक संस्था है। यह सभी सामाजिक संस्थाएं लाखों वर्षों से विषमलैंगिक जोड़ों की शादी को स्वीकार कर चुकी हैं।सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर कल भी सुनवाई जारी रहेगी सॉलीसीटर जनरल तुषार मेहता अपनी दलील जारी रखेंगे।

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