लेखक संकर्षण ठाकुर की किताब ‘द ब्रदर्स बिहारी’ न सिर्फ बिहार के दो बड़े नेताओं की जीवनी है बल्कि भारतीय राजनीति पर लिखी गई अच्छी किताबों में से एक है। लेखक ने किताब को दो खंडों में लिखा है। पहला खंड लालू यादव पर है और दूसरा खंड बिहार के मौजूदा सीएम नीतीश कुमार पर है। किताब की सबसे खास बात ये है कि इसमें न सिर्फ सियासी किस्से लिखे गए हैं बल्कि ये किताब बिहार की राजनीति की एक अच्छी समझ भी विकसित करती है।
पहला खंड
किताब के पहले खंड की बात करें तो यह पूरी तरह से लालू यादव और उनकी राजनीति पर आधारित है। लेखक लालू यादव के व्यक्तित्व के बारे में लिखते हैं कि कैसे लालू खुद को ही सरकार समझते हैं। किताब में संकर्षण ने बताया है कि लालू यादव एक ऐसी शख्सियत हैं जो कि अपने आपको कानून व्यवस्था से ऊपर समझते हैं। लालू यादव में जहां एक अच्छा वक्ता है , लोगों की खींच लेने की कला है, वहीं लालू यादव एक ऐसे आदमी भी हैं जो सियासी फायदा लेने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं। इस मामले में क्या दुश्मन और क्या दोस्त , वो किसी को नहीं छोड़ते हैं।
ठाकुर ने लालू यादव के बचपन और मुख्यमंत्री बनने तक के सफर के बारे में लिखा है कि कैसे लालू ने बचपन से जातिगत भेदभाव को झेला और कैसे उन्होंने संसाधनों के अभाव में संघर्ष किया और खुद के लिए एक अलग जगह बनाई। हालांकि वही लालू जब सीएम बनता है तो अपने दरबारियों से घिर जाता है। लालू के सीएम रहते मुख्यमंत्री आवास का जो वर्णन है, वो भी दिलचस्प है।
लेखक लिखते हैं कि लालू यादव अपने आप को किसी राजा से कम नहीं समझते हैं। यहां तक कि उनके साथ काम करने वाले अफसरों को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है कि लालू यादव न जाने कब क्या आदेश दे दें। बिहार और अपने लोगों के बीच सीएम रहते लालू यादव ने एक मसीहा की छवि बनाई। लालू यादव का सीएम बनना अपने आपमें प्रतीकात्मक है क्योंकि ये हाशिये के समाज के उदय की कहानी कहता है। कैसे एक चरवाहा चॉपर में यात्रा करता है। लालू ने अपने समाज में , अपने लोगों को सशक्तिकरण का संदेश देने का काम किया।
किताब में बताया गया है कि कैसे लालू यादव ने 1995 के चुनाव के कड़े इम्तिहान को पास किया और कामयाबी की एक नई दास्तां लिखी। हालांकि इसके बाद चारा घोटाला सामने आ जाता है और लालू यादव की राजनीति का पतन शुरू हो जाता है। अपनी पत्नी को सीएम बनाने के बाद अब वे पर्दे के पीछे से सरकार चलाने वाले व्यक्ति हो जाते हैं। राबड़ी देवी के शासन काल में वो सारी चीजें नदारद हो जाती हैं जिसका वादा लालू ने सीएम बनने पर किया था। राजद के राज में बिहार जंगल राज की संज्ञा पा जाता है। जिसके चलते लालू राज का अंत हो जाता है।

दूसरा खंड
ब्रदर्स बिहारी के दूसरे खंड की बात करें तो यह नीतीश कुमार पर आधारित है। इस खंड में लेखक ने बताया है कि कैसे बिहार में लालू राज के बाद चीजें पटरी पर लौट रही हैं। बिहार को विकास की ओर ले जाना कितनी चुनौतीपूर्ण है इसके बारे में बखूबी लिखा गया है। हालांकि नीतीश राज में लोगों को हल्का हल्का एहसास होता है कि चीजें शायद सही दिशा में जा रही हैं।
लेखक ने नीतीश कुमार की छवि के बारे में बहुत अच्छे से लिखा है। नीतीश कुमार की राजनीति में उनकी साफ छवि का एक बड़ा हाथ है। राजनीति के दलदल में कैसे नीतीश कुमार ने खुद को बेदाग रखा इसका बहुत अच्छा जिक्र किताब में आपको पढ़ने को मिलेगा। कई किस्से हैं जो बताते हैं कि नीतीश कुमार राजनीति के साथ साथ असल जिंदगी में भी सिद्धांतों को मानने वाले नेता हैं। नीतीश कुमार सिर्फ एक राजनेता नहीं हैं जो बस व्यक्तिगत लाभ के लिए राजनीति में आए हैं बल्कि वे एक ऐसे राजनेता हैं जो विचारधारा और सुशासन को महत्व देते हैं। समाजवादी विचारों पर चलते हैं।
आप किताब पढ़ेंगे तो समझ आएगा कि क्यों शुरूआती राजनीति में नीतीश कुमार ने लालू यादव का समर्थन किया और कैसे वे समय के साथ लालू यादव के धुर विरोधी हो गए। जनता दल छोड़ समता पार्टी बनाने की कहानी और विद्रोह का बिगुल फूंकने का किस्सा मजेदार है। लेखक ने बताया है कि नीतीश कुमार ने सीएम रहते अपने काम से एक अलग वोट बैंक बनाया। ये वोट बैंक राजनीति लालू की राजनीति से अलग थी। इसमें अलग-अलग जातियों और समुदाय के लोगों का हिस्सा है। अपने पहले कार्यकाल में नीतीश कुमार ने ‘नया बिहार’ बनाने का काम किया। जिसका नतीजा 2010 के चुनाव में भी देखने को मिला, जहां बाढ़ के चलते हुई बदनामी का भी कोई असर नहीं पड़ा और नीतीश कुमार को जनता का आशीर्वाद मिला।
नीतीश कुमार 2013 में कैसे बीजेपी से अलग हुए। इसकी कहानी भी बेहद दिलचस्प तरीके से लेखक ने किताब में कही है। जिसके बाद नीतीश कुमार को अपने धुर विरोधी लालू यादव का साथ लेना पड़ा।
418 पेज की इस किताब का प्रकाशन हार्पर कॉलिन्स ने किया है। जिसे आप 550 रुपये में खरीद सकते हैं।