‘विपात्र’ में मुक्तिबोध ने बिखेरा है अपनी लेखनी का जादू; ‘व्यक्तित्व की खोज’ और ‘निरंतर आत्मसंघर्ष’ की कहानी कहता है लघु उपन्यास

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muktibodh short novel vipatra
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पुनीत रंजन। हिंदी साहित्य में मुक्तिबोध (1917-1964) मूलतः कवि के रूप में जाने जाते है। ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’, ‘ब्रह्मराक्षस’ और ‘अंधेरे में’ जैसी काव्य कृतियाँ उनकी कीर्ति का आधार हैं। लेकिन इसके साथ ही एक समीक्षक और कहानीकार के रूप में भी उन्होंने ‘कामायनी : एक पुनर्विचार’, ‘एक साहित्यिक की डायरी’, ‘काठ का सपना’ और ‘सतह से उठता आदमी’ जैसी समर्थ गद्य कृतियाँ हिंदी साहित्य को दी हैं। ‘विपात्र’ मुक्तिबोध की इन्हीं कृतियों की अगली कड़ी है। विपात्र को हम लघु उपन्यास या लम्बी कहानी या डायरी अंश की श्रेणी में रख सकते हैं। वैसे इसे अपने तरीके का एक गद्य प्रयोग भी कहा जा सकता है।

मुक्तिबोध की कविताओं और कहानियों की तरह ‘विपात्र’ में भी उनकी लेखनी का जादू देखा जा सकता है। इस लघु उपन्यास की कथावस्तु स्वयं मुक्तिबोध और उनके मित्र जगत के जीवन पर केन्द्रित है। लेकिन ये दोनों केवल मुख्य पात्र भर ही नहीं हैं। ये दोनों अलग-अलग वर्गों का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। साथ ही इन पात्रों के माध्यम से दोनों वर्गों के सामाजिक, आर्थिक और मानसिक अंतर को भी भली-भाँति समझा जा सकता है।

मुक्तिबोध का जीवन संघर्षो से भरा हुआ है, तो वहीं जगत का जीवन सम्पन्नता से परिपूर्ण है लेकिन बावजूद इसके दोनों ही एक विशेष मनःस्थिति से गुजर रहे हैं और वह स्थिति है- वैचारिक संघर्ष की। जहाँ एक ओर मुक्तिबोध अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए एक-एक पाई को मोहताज है और अपने जीवन की दशा सुधारने की जद्दोजहद में अपनी स्वतंत्रता तक खो चुका है तो वहीं दूसरी ओर जगत के पास सब कुछ होते हुए भी वह मानसिक संतोष नहीं है। दोनों के विचारों और जीवन के यथार्थ में एक बड़ा अंतर है जिसके लिए उनके आसपास का समाज जिम्मेदार है।

वह समाज जो सामाजिक और आर्थिक असमानता से जूझ रहा है, जहाँ सिर्फ पूँजी का बोलबाला है और एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता तक खरीदने की ताकत रखता है। मुक्तिबोध और जगत, उपन्यास में दोस्त होते हुए भी एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं, दोनों के विचारों में टकराव है, अपने-अपने तर्क हैं। मगर दोनों के ही विचारों में आत्मसंघर्ष की गूंज सुनाई देती है।

‘विपात्र’ के संवाद उपन्यास की सबसे बड़ी ताकत हैं। जिनका दायरा उपन्यास तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि वो हर उस व्यक्ति से जुड़ जाता है जो समाज की विसंगतियों से त्रस्त है। चाहे वह किसी भी वर्ग का क्यों न हो। मुक्तिबोध की बाकी रचनाओं की तरह ‘विपात्र’ में भी ‘व्यक्तित्व की खोज’ और ‘निरंतर आत्मसंघर्ष’ विद्यमान है लेकिन फिर भी ये लघु उपन्यास पाठक को निराश नहीं करता और अंत तक बांधे रखता है। ये मुक्तिबोध की एक विशेषता है कि उनकी रचनाएं एकरसता लिए हुए भी एक-दूसरे से बेहद अलग हैं।

( पुनीत रंजन हिंदीप्रेमी हैं और वे हिंदी भाषा को लेकर लगातार सक्रिय रहे हैं। उन्होंने हिंदी विषय में ही अपनी एमए तक की पढ़ाई की है और वे इस विषय में NET क्वालिफाइड हैं। वे नियमित रूप से हिंदी से संबंधित लेख लिखते रहे हैं। )

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