पेंशन की दरख्वास्त लिए कलकत्ता आए थे गालिब, जानें कैसे इस शहर ने उनका दिल चुरा लिया?

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ghalib rented house in kolkata
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Mirza Ghalib: मिर्जा गालिब की आज जयंती है। गालिब वो नाम है जो किसी परिचय का मोहताज नहीं है। गालिब से पहले गजल को महज आशिकी से जोड़ कर देखा जाता था। लेकिन गालिब ने गजल को दर्शन, जीवन रहस्य और दूसरे तरह के रंग दिए। गालिब न सिर्फ शायरी के लिए बल्कि अपने खतों के लिए भी बहुत मशहूर हैं। एक खत में गालिब खुद कहते हैं, ” मैं कोशिश करता हूं कि कोई ऐसी बात लिखूं जो पढ़े खुश हो जाए।”

गालिब सबसे ज्यादा अपने अंदाज-ए-बयां के लिए मशहूर हैं। वे लिखते हैं-

कोई वीरानी सी वीरानी है
दश्त को देख के घर याद आया

मिर्जा गालिब के जीवन की खास बात ये है कि उन्होंने कभी रोजी रोटी कमाने के लिए कोई काम नहीं किया। यहां तक कि गालिब को जो लोकप्रियता आज हासिल है वह उन्हें उनके मरने के बाद हासिल हुई और इस बात को गालिब खुद जानते थे कि ऐसा होगा। साल 1850 में बादशाह बहादुर शाह जफर ने गालिब को दबीर-उल-मुल्क और नज्मुद्दौला की उपाधि दी थी। उन्हें मिर्जा नौशा के नाम से भी जाना जाता था। यहां तक कि वे बहादुर शाह जफर को शायरी भी सिखाते थे। यही नहीं मिर्जा गालिब को मुगलिया दरबार द्वारा इतिहास लिखने का काम भी सौंपा गया था।

क्यों कलकत्ता गए थे गालिब?

मिर्जा गालिब की जिंदगी पेंशन के सहारे ही चलती थी। उन्हें पेंशन के तौर पर 62 रुपये 8 आने मिलते थे। बाद में जब उनकी पेंशन अंग्रेजी हुकूमत ने रोक दी तो वे इसे बहाल करने की दरख्वास्त लिए कलकत्ता गए। कलकत्ता की यात्रा ने गालिब के अदबी सफर में बड़ी तब्दीली लाई। इस बाबत उन्होंने सफर-ए-कलकत्ता भी लिखा था। कलकत्ता की यात्रा के बाद गालिब फारसी में भी लिखने लगे। कलकत्ता का माहौल दिल्ली के मुकाबले काफी उदार था। गालिब ने पाया कि कलकत्ता में लोग कितने सृजनात्मक हैं।

कलकत्ता में रहते हुए उन्होंने चिराग-ए-दैर और बाद-ए-मुखालिफ की रचना की। वे धीरे-धीरे कलकत्ता से मोहब्बत करने लगे। गालिब खुद लिखते हैं कि कलकत्ता ने उनका दिल चुरा लिया है।

मिर्जा गालिब का जीवन

मिर्जा गालिब का ताल्लुक मुगलिया घराने से था और उनकी पैदाइश यूपी के आगरा की बतायी जाती है। 1797 में जन्मे मिर्जा गालिब के पिता का नाम मिर्जा अबदुल्ला बेग था और मां का नाम इज्जत-उत-निसां बेगम था। मिर्जा गालिब के सिर से 5 साल की उम्र में ही पिता का साया उठ गया था। इसके बाद उनकी परवरिश मिर्जा नसरुल्ला बेग खां ने की ।

गालिब 11 साल की उम्र से शायरी किया करते थे। उन्हें उर्दू,फारसी और तुर्की का इल्म था। छोटी उम्र में ही उनको अरबी की शिक्षा मिली थी। गालिब का निकाह 13 साल की उम्र में उमराओ बेगम से हो गया था। इसके बाद मिर्जा गालिब दिल्ली आ गए थे। मिर्जा गालिब के बच्चे तो कई हुए लेकिन कोई भी जिंदा नहीं बच सका। मिर्जा गालिब की निजी जिंदगी की उदासी को इस शेर से समझा जा सकता है।

कै़द-ए-हयात ओ बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं

मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँ

मिर्जा गालिब के तखल्लुस की बात की जाए तो वे असद नाम से शायरी किया करते थे। बाद में वे गालिब नाम से भी शायरी करने लगे थे। 5 फरवरी 1869 को गालिब ने दुनिया को अलविदा कहा। उनकी कब्र मजार-ए-गालिब हजरत निजामुद्दीन स्थित है।