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कैसे गोडसे ने तय किया कि गांधी की हत्या जरूरी है? पढ़ें ‘Freedom at Midnight’ का रिव्यू

अभी किताब Freedom at Midnight पढ़कर पूरी की। किताब पढ़ने के बाद यह कह सकता हूं कि इस किताब को भी India After Gandhi जैसी किताबों में शुमार किया जा सकता है। हालांकि Freedom At Midnight पहले लिखी गयी है। यानी ये किताब भारतीय इतिहास की उन किताबों में से है, जिसे एक आम भारतीय को तो पढ़ना ही चाहिए। वह भी ऐसे समय में जब सोशल मीडिया के जरिए हमारे पास इतिहास बड़े ही विकृत रूप में पहुंच रहा है।

ये किताब साल 1975 में प्रकाशित हुई थी। इसके लेखक लैरी कॉलिन्स और डोमिनिक लैपियर हैं। किताब में ब्रिटेन की उन परिस्थितियों के बारे में बारे में बताया गया है जिनमें ब्रिटेन को अपने इतने बड़े उपनिवेश का शासन छोड़ना पड़ा। विंस्टन चर्चिल के बाद क्लिमेंट एटली जब ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बनते हैं तो वे लुई माउंटबेटन को भारत आखिरी वायसराय के रूप में भेजते हैं।

“Freedom At Midnight” किताब में बताया गया है कि माउंटबेटेन को भारत भेजने के पीछे एक बड़ा हाथ पंडित जवाहरलाल नेहरू का था । दरअसल नेहरू के करीबी वीके मेनन ने स्टैफोर्ड क्रिप्स को सुझाव दिया था। जिसके बाद क्रिप्स ने एटली से कहा कि वे आखिरी वायसराय के रूप में माउंटबेटन को भारत भेजें। किताब में एक तरफ तो माउंटबेटन के भारत आगमन की कहानी बताई गयी है वहीं इसके समानांतर बताया गया है कि कैसे गांधी नोआखाली ( मौजूदा बांग्लादेश) में हिंसा को कम करने के लिए यात्रा कर रहे हैं।

May be an image of one or more people, wrist watch and text that says "Dominique Lapierre Larry Collins XỊI I II III N ÎÎ FREEDOM AT MIDNIGHT"
Freedom At Midnight

तमाम सियासी मसलों को पीछे छोड़ गांधी का बस एक उद्देश्य है, हिंसा को रोकना , जिसके लिए वे अपने हथियार अनशन का इस्तेमाल करते हैं। इस बीच गांधी का अंग्रेजों से एक ही आग्रह है कि वह जल्द से जल्द भारत से चले जाएं। अंग्रेज भी भारत में दिन रात बदतर होते हालात से वाकिफ हैं इसलिए वे भी जल्दी से जल्दी भारत को अलविदा कहना चाहते हैं।

हिंदुस्तान की हालत ऐसी थी जैसे कोई टाइम बम । इस स्थिति से बचने के लिए माउंटबेटन ने एलान कर दिया कि वे 15 अगस्त 1947 को भारत को आजाद कर देंगे। जैसा कि किताब में बताया गया कि ज्योतिषियों ने इस दिन को अशुभ बताया इसलिए तय हुआ कि 14 अगस्त की रात को हिंदुस्तान आजाद होगा। किताब में बताया गया है कि माउंटबेटन खुद नहीं चाहते थे कि हिंदुस्तान का बंटवारा हो लेकिन मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान से कम में राजी नहीं हो रहे थे।

हालांकि नेहरू और पटेल भी ये जान चुके थे कि बंटवारा एक हकीकत है जिसे मानना ही पड़ेगा। इकलौते गांधी ही थे जो बंटवारे का अंतिम समय तक विरोध करते रहे लेकिन आखिर में इस मुद्दे पर अकेले पड़ जाने पर उन्होंने भी इस बात को स्वीकार कर लिया कि पाकिस्तान बनकर रहेगा।

“Freedom At Midnight” किताब की सबसे अच्छी बात ये है कि कहानी के अंदाज में सबकुछ बताया गया है। हिंदुस्तान के रजवाड़ों, रियासतों के राजाओं-महाराजाओं के किस्से जिस अंदाज में कहे गए हैं वह अनूठा है। किताब में बताया गया है कि रजवाड़े आखिरी वक्त तक अपनी संप्रभुता खोना नहीं चाहते थे। लेकिन उन्हें भी हार माननी पड़ी।

आखिर में देश के बंटवारे और आजादी का दिन साथ-साथ आता है। कैसे हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच छोटी-छोटी चीजों का बंटवारा होता है। आजादी की कीमत हिंदुस्तान और पाकिस्तान के लोगों को अपने खून से चुकानी पड़ती है। बरसों से साथ रहते आए लोग अलग हो रहे थे वह भी एक ऐसी वजह से जिससे उनका कोई लेना-देना नहीं था।

किताब में बंटवारे की हिंसा के बारे में बखूबी बताया गया है कि सरहद के दोनों ओर कितनी बर्बरता पेश आई। सरहद के दोनों तरफ लोग एक दूसरे के खून के प्यासे थे खून की नदियां बह रही थीं। औरतों, बच्चों को भी नहीं बख्शा जा रहा था। इतनी बड़ी आबादी की अदला-बदली मानव सभ्यता की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक थी।

इसके अलावा कश्मीर के बारे में बताया गया है कि कैसे कश्मीर का भारत में विलय हुआ और कैसे आज भी कश्मीर समस्या भारत और पाकिस्तान के बीच कायम है। पाकिस्तान ने जहां कश्मीर में अराजकता फैलाते हुए हमला बोला वहीं जवाब में महाराजा हरिसिंह ने आखिरी उपाय करते हुए भारत में विलय किया।

“Freedom At Midnight” किताब में बताया गया है कि बंटवारे के बाद देश की राजधानी दिल्ली में शरणार्थियों में इतनी नफरत भर चुकी थी कि वे गांधी के अनशन के दौरान ‘गांधी को मर जाने दो’ के नारे लगा रहे थे। चूंकि तब हरियाणा नहीं बना था इसलिए पंजाब की सीमा दिल्ली से लगती थी। पंजाब ने सबसे ज्यादा इस त्रासदी को झेला था। पाकिस्तानी पंजाब से शरणार्थी दिल्ली पहुंच रहे थे। जिसके बाद दिल्ली में भी हिंसा का माहौल बन गया था।

जहां सेना पंजाब में कुछ काम नहीं आई वहीं गांधी कलकत्ता में अकेले शांति कायम कर रहे थे। धीरे-धीरे गांधी ने कलकत्ता के बाद दिल्ली में भी अपने अनशन के दम पर शांति कायम की। वहीं किताब में नाथूराम गोडसे की कहानी भी कही गयी है।

“Freedom At Midnight”किताब में बताया गया है कि नाथूराम गोडसे विनायक दामोदर सावरकर का शिष्य था। गोडसे सावरकर की हिंदुत्व की विचारधारा से इतना प्रभावित था कि उसे सामान्य व्यक्ति नहीं कहा जा सकता। वह एक कट्टर हिंदुत्ववादी था। जो हिंदुत्व के लिए गांधी की हत्या को जायज समझता है। आप उसे एक सिरफिरा शख्स कह सकते हैं जिसकी मदद से सावरकर ने गांधी की हत्या को अंजाम दिया।

गांधी द्वारा भारत सरकार को पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने के लिए विवश करने की बात ने गोडसे को इस बात के लिए तैयार कर दिया था कि गांधी की हत्या कितनी जरूरी है। गोडसे से पहले मदनलाल पाहवा ने गांधी को मारने का प्रयास किया लेकिन वह नाकाम रहा। उसके बाद गोडसे ने हत्या को अंजाम दिया।

दरअसल गांधी दिल्ली के बाद पाकिस्तान जाने वाले थे। इसके लिए उनका कार्यक्रम भी तैयार था। जिन्ना भी तैयार थे। गांधी ने सोचा था कि वे पंजाब होते हुए पाकिस्तान जाएंगे। हालांकि उन्होंने वहां जाने से पहले वर्धा में कुछ दिन बिताने की सोची थी। लेकिन वहां जाने से पहले ही दिल्ली में उनकी हत्या कर दी गयी। यहीं किताब खत्म हो जाती है। किताब में और भी बहुत कुछ है। ये किताब आपको जरूर पढ़नी चाहिए।

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