जिस तरह उन्होंने जिंदगी को जिया उसी तरह इस दुनिया को अलविदा भी कहा। संथाल जनजाति की महिला बुधनी मंझियाइन का 80 वर्ष की आयु में झारखंड में पंचेत के पास उनके घर पर निधन हो गया। लेकिन इस 80 साल की महिला की बात क्यों हो रही है? ऐसा क्यों है कि उनकी मौत एक खबर है? आइए आपको बताते हैं कि बुधनी मंझियाइन कौन थी और जवाहरलाल नेहरू से उनका क्या संबंध था?
नेहरू की आदिवासी ‘पत्नी’
बुधनी मंझियाइन एक संथाली महिला थीं और 1959 तक पश्चिम बंगाल के धनबाद गांव में एक साधारण जीवन व्यतीत करती थीं, जब उनके जीवन में एक अविश्वसनीय मोड़ आया और तत्कालीन प्रधानमंत्री ने आने वाले सालों के लिए उनकी जिंदगी ही बदल कर रख दी। 6 दिसंबर 1959 को, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दामोदर नदी पर एक बांध का उद्घाटन करने के लिए पश्चिम बंगाल के धनबाद की यात्रा की।
नेहरू ने तब इस बात पर जोर दिया था कि परियोजना पर काम करने वाली एक महिला उद्घाटन का हिस्सा बने और दामोदर घाटी निगम ने पीएम के स्वागत के लिए एक संथाली व्यक्ति रावण मांझी के साथ 15 वर्षीय बुधनी को आमंत्रित किया। हालाँकि, आगे जो हुआ वह बुधनी को हमेशा याद रहा। बुधनी द्वारा पंडित नेहरू को माला पहनाए जाने के प्रतिउत्तर में नेहरू ने बुधनी को माला पहनाई। उन्होंने बुधनी से पावर स्टेशन का बटन भी दबवाया। वह नेहरू के बगल में थीं, जिससे आदिवासी समुदाय नाराज हो गया।
जब बुधनी उस शाम पूरे धूमधाम के बाद अपने गांव लौटी, तो करबोना में गांव के बुजुर्गों ने उसे बताया कि समारोह में पीएम को माला पहनाकर उसने नेहरू से शादी कर ली है। इसके अलावा, चूंकि नेहरू संथाल नहीं थे, इसलिए वह अब समुदाय का हिस्सा नहीं थीं और उन्हें गांव छोड़ने के लिए कहा गया। कोई विकल्प न होने पर बुधनी ने अपना घर छोड़ दिया और फिर सुधीर दत्ता की मदद से पंचेत में शरण ली।
1962 में दामोदर वैली कॉरपोरेशन में कार्यरत बुधनी को नौकरी से निकाल दिया गया और उन्होंने खुद को असहाय पाया।
निर्वासन में जीवन
इसके बाद बुधनी ने पुरुलिया में दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करना शुरू कर दिया और वह सुधीर दत्ता के संपर्क में आईं। रिपोर्ट्स में कहा गया है कि दोनों शादी करना चाहते थे, लेकिन नहीं कर सके क्योंकि उन्हें डर था कि अगर उन्होंने ऐसा किया तो उन्हें इसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों की एक बेटी थी।
दिलचस्प बात यह है कि 1985 में जब राजीव गांधी को उनकी दुर्दशा के बारे में पता चला, तो उन्होंने उनसे मुलाकात की और इस मुलाकात में उन्होंने अनुरोध किया कि उन्हें दामोदर घाटी निगम में उनकी नौकरी पर बहाल कर दिया जाए। उनके अनुरोध को मंजूरी दे दी गई और उन्होंने 2005 में सेवानिवृत्त होने तक वहां काम किया।
एक समाचार रिपोर्ट में बुधनी के बारे में लिखा गया था, जिसका शीर्षक था ‘नेहरू की आदिवासी पत्नी को बहिष्कृत जीवन और गरीबी की ओर धकेल दिया गया है’। लेख में तब बुधनी के जीवन का विवरण दिया गया था।
समाज द्वारा बहिष्कार के बाद बुधनी ने एक शांत जीवन व्यतीत किया और 17 नवंबर को लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया।
एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि अब उनके सम्मान में एक स्मारक बनाने और बुधनी की बेटी रत्ना को पेंशन प्रदान करने की मांग की जा रही है। पंचेत पंचायत के मुखिया भैरव मंडल ने स्मारक के संबंध में डीवीसी प्रबंधन को पत्र लिखा है। पंचेत में डीवीसी के डिप्टी चीफ इंजीनियर सुमेश कुमार ने मीडिया को बताया कि अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया गया है। ये निर्णय शीर्ष अधिकारियों से परामर्श के बाद ही लिए जा सकते हैं।