महात्मा गांधी की ‘चंपारण यात्रा’ से राहुल गांधी की ‘वोट अधिकार यात्रा’ तक, जानें बिहार की राजनीतिक यात्राओं का इतिहास

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Rahul Gandhi
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बिहार की राजनीति में “यात्रा” सिर्फ़ सड़क पर निकलने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनमत गढ़ने की एक सशक्त शैली है—गाँव-गाँव पहुँच, गठबंधनों की बुनियाद और मुद्दों का फ़्रेम तय किया जाता है। आज हम आपको बिहार की प्रमुख राजनीतिक यात्राओं, उनके स्वरूप, रणनीति और प्रभाव के बारे में बताएंगे। इसकी जड़ें आज़ादी से पहले के राष्ट्रीय आन्दोलन में भी गहरी पैठी हुई हैं।

आजादी से पहले- महात्मा गांधी की चम्पारण सत्याग्रह यात्रा: यह बिहार ही था जहाँ महात्मा गांधी ने पहली बार भारतीय राजनीति में जन-आन्दोलन की शैली अपनाई। 1917 में गांधीजी ने चम्पारण में नील की खेती के ख़िलाफ़ किसानों की शिकायतों को सुनने के लिए गाँव-गाँव यात्रा की। इसे “भारत में गांधी युग” की शुरुआत कहा जाता है। इस यात्रा ने किसानों के आत्मविश्वास को बढ़ाया और अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ़ पहला बड़ा सफल जनआन्दोलन खड़ा किया। आगे चलकर कांग्रेस नेताओं की बिहार यात्राएँ हुईं, कई कांग्रेसी नेताओं ने बिहार में सभाएँ कीं और पैदल यात्राएँ निकालीं। जिनमें छात्रों और किसानों की बड़ी भागीदारी रही। इन यात्राओं ने स्वतंत्रता आन्दोलन को ग्रामीण इलाकों में फैलाने का काम किया।

आजादी के बाद- आजादी के बाद भूमि सुधार और किसान यात्राएँ हुईं। स्वतंत्रता के बाद बिहार में ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार के मुद्दे पर कई वामपंथी और समाजवादी नेताओं ने पदयात्राएँ कीं। राममनोहर लोहिया और उनके सहयोगियों ने गाँव-गाँव दौरे किए। कर्पूरी ठाकुर की जनसंघर्ष यात्राएँ हुईं। समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर ने हाशिये पर पड़े वर्गों और पिछड़ों के हक़ में व्यापक यात्राएँ कीं। उनका “आरक्षण और सामाजिक न्याय” का नैरेटिव इन्हीं यात्राओं के ज़रिए पूरे बिहार में पहुँचा।

सम्पूर्ण क्रांति
1974 का सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन अचानक नहीं था, बल्कि 1960 और 70 के दशकों में छात्र संगठनों और समाजवादी नेताओं की लगातार यात्राओं और संवाद का नतीजा था। जेपी ने 1974 में जब छात्रों के समर्थन में “सम्पूर्ण क्रांति” का आह्वान किया, तो उसकी पृष्ठभूमि में आज़ादी से पहले और बाद की अनेक यात्राएँ और आन्दोलन पहले से तैयार ज़मीन बना चुके थे।

1990: राम रथ-यात्रा और समस्तीपुर में गिरफ़्तारी- एल.के. आडवाणी ने 25 सितम्बर 1990 को सोमनाथ से अयोध्या के लिए राम रथ-यात्रा शुरू की, जिसका बिहार की राजनीति पर गहरा असर पड़ा। 23 अक्टूबर 1990 को उस समय के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने आडवाणी को समस्तीपुर में गिरफ़्तार कराया—यह घटना “मंदिर बनाम मंडल” की राष्ट्रीय बहस का प्रतीक बनी और बिहार की सामाजिक-सियासत को नई दिशा दी।

अब आते हैं 21 वीं सदी में

नीतीश कुमार ने पहली यात्रा जुलाई 2005 को न्याय यात्रा के नाम से शुरू की थी. इसके बाद वह सीएम हो गए। साल 2009 में सीएम नीतीश कुमार ने विकास यात्रा की थी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यभर में परियोजनाओं के उद्घाटन-समीक्षा के साथ “गवर्नेंस” पर फ़ोकस रखा; इसे उनके विकास नैरेटिव की पब्लिक-रीच कड़ी माना गया। 2011 में नीतीश कुमार ने सेवा यात्रा की। यह यात्रा 100 दिनों तक चरणबद्ध रूप से चली; योजनाओं के क्रियान्वयन और राइट-टू-सर्विस पर ज़ोर रहा।

2015 विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने चार स्थानों से एक साथ ‘परिवर्तन यात्रा’ निकाली—लक्ष्य था पूरे राज्य में व्यापक जनसंपर्क के साथ चुनावी नैरेटिव पर पकड़ बनाना। साल 2020 में विधानसभा चुनाव से पहले तेजस्वी यादव ने‘बेरोज़गारी हटाओ यात्रा’निकाली थी। युवा मुद्दों पर फोकस के साथ राज्यव्यापी अभियान की तैयारी की थी; कोविड और राजनीतिक परिस्थितियों के बीच यह नरेटिव-निर्माण की कवायद रहा था।

प्रशांत किशोर ने 2 अक्टूबर 2022 को पश्चिम चंपारण के भितिहरवा आश्रम से 3,500 किमी की जन सुराज पदयात्रा शुरू की थी, जिसका उद्देश्य जमीनी मुद्दों की पहचान और वैकल्पिक राजनीति का निर्माण था। नीतीश कुमार बीते लोकसभा चुनाव से पहले समाधान यात्रा पर निकले थे। क़रीब डेढ़ माह में सभी 38 ज़िलों का दौरा किया; जिलों में बैठकों और निरीक्षणों के ज़रिए परियोजनाओं की समीक्षा की—सरकार-जनता संवाद का संदेश दिया। वहीं राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा भी निकली थी। मणिपुर से मुंबई तक 6,700 किमी+ के रूट में बिहार भी शामिल रहा था। वहीं तेजस्वी यादव ने ‘जन विश्वास यात्रा’ निकाली थी। 11 दिनों में व्यापक जिलों/क्षेत्रों का दौरा कर विश्वास वोट माँगने की कोशिश की; कई जगहों पर बड़े जनसमूह और सभाएँ हुई थीं।

2025

अब चुनाव सिर पर है तो नीतीश कुमार प्रगति यात्रा पर निकले हैँ। चरणबद्ध कार्यक्रम में विभिन्न ज़िलों में निरीक्षण-लोकार्पण, रोजगार/कल्याण घोषणाएँ की जा रही हैं। इसे 2025 विधानसभा चुनाव के सन्दर्भ में सियासी कैंपेनिंग का भी माध्यम माना जा रहा है। इसके अलावा प्रशांत किशोर भी इस साल मई से ‘बिहार बदलाव यात्रा’ पर हैं।

आज राहुल गाँधी वोट अधिकार यात्रा की शुरुआत कर रहे हैं। यह यात्रा 16 दिनों में 1,300 किमी से अधिक कवर करेगी, 20+ ज़िलों से गुजरते हुए 1 सितम्बर को पटना रैली के साथ समापन होगा। यह यात्रा मतदाता सूची और वोट-अधिकार के मुद्दे को ध्यान में रखते हुए की जा रही है।