Rajesh Khanna हिंदी सिनेमा के पहले प्रिंस ऑफ रोमांस थे। राजेश खन्ना से पहले हिंदी सिनेमा ने राज कपूर को ‘शो-मैन’ के खिताब से नवाजा था, उसके बाद राजेश खन्ना को उसी बंबईया सिनेमा ने दिया ‘सुपर स्टार’ का तमगा।
60 के दशक में भारतीय राजनीति के फलक से जवाहर लाल नेहरू ओझल हुए तो हिंदी सिनेमा में भी राज कपूर, देवानंद और दिलीप कुमार की तीकड़ी का प्रभाव भी थोड़ा मद्धम पड़ने लगा। इसे यूं भी कह सकते हैं कि सिनेमा में समाजवाद का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगा। मोहब्बत और इश्क की दीवानगी सिनेमा के कथानक का मुख्य आधार बन गई।

के. आसिफ, ख्वाजा अहमद अब्बास, बासु भट्टाचार्य, शंभु मित्रा जैसे निर्देशकों ने आजादी के बाद से लेकर 50 के दशक तक जिस तरह से सिनेमा को गढ़ा वो पूरी तरह से समाजवाद से प्रेरित दिखाई देता है। वहीं 60 के मध्यातंर में सिनेमा ने थोड़ी सी करवट ली और उसके झुकाव का केंद्र बिंदू हो गया ‘प्रेम’। वैसे सिनेमा में प्रेम पहले भी था लेकिन उसकी दिशा थोड़े बहुत अर्थों में भारत के नव निर्माण से भी जुड़ी हुई थी।
Rajesh Khanna को लड़कियां खून से खत लिखा करती थीं
राजेश खन्ना के दौर में सिनेमा का पर्दा पूरी तरह से रूमानियत की चाशनी से तर-बतर होने लगा। सिनेमा का रंगरूप बदल चुका था। उस दौर में जब सेल्यूलाइड के चमकते सितारे राजेश खन्ना की इंट्री पर्दे पर होती तो लड़कियां उनकी पहली झलक पाकर ही पागल हो जातीं।
दिवानगी का यह आलम था खून से लिखे खत राजेश खन्ना के घर पहुंचते थे। आलम ये था कि जिस रास्ते से राजेश खन्ना गुजर जाते थे उसकी उड़ी धुल से लड़कियां मांग भर लिया करती थी। वहीं राजेश खन्ना की कार पर धूल नहीं बल्कि लड़कियों की लिपस्टिक के छाप पड़े रहते थे।

29 दिसंबर 1942 को पंजाब के अमृतसर में पैदा हुए राजेश खन्ना फिल्मों में आने से पहले जतीन खन्ना हुआ करते थे। पैदा होने के बाद चुन्नी लाल खन्ना ने उनके पिता हीरानंद खन्ना से उन्हें गोद ले लिया। हीरानंद पाकिस्तान के वेहारी हाई स्कूल में हेड मास्टर थे, वहीं चुन्नी लाल खन्ना रेलवे के बड़े ठेकेदार थे। इस तरह चुन्नीलाल खन्ना के बेटे के तौर पर जतिन खन्ना की परवरिश बड़े लाड़-प्यार से हुई।
साल 1935 में चुन्नीलाल खन्ना का परिवार लाहौर से मुंबई आ गया और खन्ना परिवार का ठिकाना बना ठाकुरद्वार स्थित सरस्वती निवास। जतिन खन्ना की शुरूआती शिक्षा सेंट सेबेस्टियन स्कूल से हुई, जहां उनके साथ पढ़ा करते थे रवि कपूर, जो बाद में हिंदी सिनेमा में जितेंद्र के नाम से मशहूर हुए।
फिल्मफेयर के टैलेंट हंट से सिनेमा की दहलीज पर पहुंचे राजेश खन्ना
स्कूल के समय से नाटकों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने के कारण जतिन खन्ना का झुकाव फिल्मों की ओर हुआ। वो फिल्म इंडस्ट्री में इंट्री पाना चाहते थे लेकिन उनके पास कोई जुगाड़ नहीं था। तभी साल 1965 में फिल्म फेयर ने एक टैलंट हंट का आयोजन किया।
उसमें हिंदी सिनेमा के कई जाने-माने प्रोड्यूसर शामिल थे, जिन्हें नये चेहरे की तलाश थी। उस टैलेंट हंट में जज थे हिंदी सिनेमा के जाने-माने निर्देशक बिमल रॉय, मशहूर अभिनेता-निर्देशक गुरुदत्त और प्रख्यात निर्देशक यश चोपड़ा।

उस प्रतियोगिता में करीब 1000 संघर्षरत उभरते कलाकारों ने ऑडिशन दिया। लेकिन अदाकारी की इस हुनरबाजी में जतिन खन्ना ने बाजी मार ली और वो उस टैलेंट हंट के विनर बने। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जतिन खन्ना ने उस प्रतियोगिता में जिसे हराया था वो भी बाद में हिंदी सिनेमा के बेजोड़ नायकों में शुमार हुए और उनका नाम था विनोद मेहरा।
टैलंट जीतने के बाद जतिन खन्ना ने राजेश खन्ना के नाम से सिनेमा के पर्दे पर इंट्री मारी और साल 1966 में चेतन आनंद की फिल्म ‘आखिरी खत’ में वो पहली बार नजर आये। लेकिन उनकी शुरुआती तीन फिल्में ‘आखिरी खत’, ‘राज’ और ‘बहारों के सपने’ पूरी तरह से फ्लॉप रहीं।
फिल्म ‘आराधना’ ने Rajesh Khanna के हिंदी सिनेमा में स्थापित कर दिया
राजेश खन्ना मायूसी में घिरे थे तभी साल 1969 में फिल्म निर्देशक शक्ति सामंत की फिल्म ‘आराधना’ सिनेमा घरों में रिलीज हुई। इस एक फिल्म ने Rajesh Khanna को हिंदी सिनेमा में स्थापित कर दिया। इस फिल्म का गीत, ‘मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू’ आज भी सिनेमा के सदाबहार गीतों में शुमार किया जाता है।
साल 1971 तक राजेश खन्ना ने मात्र 2 सालों में लगातार 15 सुपरहिट फिल्में दीं और हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार बन गये। राजेश खन्ना को साल 1970 में पहली बार मनमोहन देसाई की फिल्म ‘सच्चा झूठा’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर अवार्ड मिला।
हिंदी सिनेमा में 70 का दशक राजेश खन्ना के नाम रहा। पहले सुपरस्टार का खिताब पाकर बुलंदियों के शिखर पर पहुंचे राजेश खन्ना की निजी जिंदगी भी बड़ी दिलचस्प किस्से-कहानियों से भरी पड़ी है। उन्हीं किस्सों में कैद है अभेनेत्री अंजू महेंद्रू और राजेश खन्ना के इश्क का अफसाना।

70 के दशक में अंजू महेंद्र के साथ रोमांस करने वाले काका (राजेश खन्ना के घर का नाम) साल 1966 से 1972 तक उनके साथ लिव-इन-रिलेशनशिप में रहे। अंजू महेंद्रू के साथ लंबे रिलेशनशिप में रहने के बावजूद राजेश खन्ना उनके साथ शादी न सके। दरअसल राजेश खन्ना चाहते थे कि अंजू महेंद्रू उनके लिए अपना फिल्मी करियर छोड़ दें, जो अंजू को मंजूर नहीं था।
बकौल अंजू, “मेरे लिए वह सुपरस्टार राजेश नहीं बल्कि जतिन था। मैं उस आदमी से प्यार करती थी, जो न राजेश खन्ना था न कोई सुपरस्टार। जितना मैं कर सकती थी, मैंने उसकी खुशी के लिए किया। मैंने अपनी पहचान को उसमें डूबा दिया था। वह चाहता था कि मैं एक्टिंग छोड़ दूं इसलिए उसने मुझे संजीव कुमार के साथ एक फिल्म से बाहर करा दिया”।
अंजू महेंद्र ने वेस्टइंडीज के महान क्रिकेट खिलाड़ी सर गैरी सोबर्स के साथ सगाई कर ली
वहीं दूसरी ओर यह कहा जाता है कि अंजू महेंद्र ने Rajesh Khanna को ठुकरा कर वेस्टइंडीज के महान क्रिकेट खिलाड़ी सर गैरी सोबर्स के साथ सगाई कर ली थी। कहते हैं कि इसके बाद राजेश खन्ना ने अंजू महेंद्र के साथ ब्रेकअप कर लिया लेकिन साथ ही उनका फिल्मी करियर भी तबाह कर दिया।

साल 1973 में 31 साल की उम्र में 16 साल की डिंपल कपाडि़या से शादी कर ली। राज कपूर की फिल्म ‘बॉबी’ से सुपरहीट हिरोइन डिंपल कपाड़िया ने Rajesh Khanna के लिए अपना फिल्मी जीवन ताखे पर रख दिया। राजेश खन्ना पर एक आरोप लगता है कि कि वो अपनी शादी पर अंजू महेंद्र को जलाने के लिए बारात को ठीक उनके घर के सामने से गुजारी। उसके बाद अंजू महेंद्र और राजेश खन्ना ने साल 1988 तक यानी पूरे 17 साल एक-दूसरे के साथ बातचीत नहीं की।

70 के दशक में राजेश खन्ना का ऐसा स्टारडम था कि बड़े-बड़े फिल्म प्रोड्यूसर उनके घर के बाहर लाइन लगाकर खड़े रहा करते थे। कहा जाता है कि अगर काका फिल्म में हैं तो उनके सुपरहिट होने की गारंटी है। इसलिए उस जमाने में एक मुहावरा हिंदी सिनेमा इंडस्ट्री में खूब चला करता था, लोग कहते थे, ‘ऊपर आका, नीचे काका”।
काका उस जमाने में फिल्म इंडस्ट्री के हाइपेड एक्टर हुआ करते थे। यही कारण था कि धीरे-धीर घमंड ने उन्हें अपने शिकंजे में ले लिया। Rajesh Khanna फिल्मों के सेट पर लेट आने लगे। कई बार ज्यादा शराबनोशी के कारण वो सेट पर फिल्म के अन्य सहकर्मियों के साथ आक्रामक भी हो जाते थे। धीरे-धीरे फिल्म इंडस्ट्री में बड़े-बड़े डायरेक्टर उनके खिलाफ होने लगे।
सलीम-जावेद की ‘एंग्री यंगमैन’ की राइटिंग में Rajesh Khanna ढल नहीं पाये
साल 1971 में राजेश खन्ना की सुपरहिट फिल्म ‘हाथी मेरे साथी’ लिखने वाले फिल्म राइटर सलीम-जावेद ने तब तक जंजीर, शोले, डॉन, दीवार जैसी फिल्में लिखकर सिनेमा के रोमांस को एंग्री यंगमैन में ढाल दिया। राजेश खन्ना सलीम-जावेद की उस राइटिंग स्टाइल में ढल नहीं पाये और अहंकार के कारण उन्होंने कई अच्छी फिल्में ठुकरा दीं, जो बाद में अमिताभ बच्चन की झोली में चली गईं।
Rajesh Khanna के अहम के कारण कभी उन्होंने सुपरहिट बनाने वाले डायरेक्टरों मसलन मनमोहन देसाई, शक्ति सामंत, ऋषिकेश मुखर्जी और यश चोपड़ा ने उनसे मुंह मोड़ लिया। इस तरह से हिंदी सिनेमा में अमिताभ बच्चन का उदय हुआ राजेश खन्ना के सितारे गर्दिश में डूब गये।

दरअसल राजेश खन्ना कभी अपनी सुपरस्टार वाली रोमांटिक इमेज से बाहर ही नहीं निकल पाये। साल 1994 में राजेश खन्ना ने फिल्म खुदाई से सिनेमा के पर्दे पर वापसी की दस्त दी लेकिन वो 70 के दशक का चार्म खत्म हो चुका था और दर्शकों ने उन्हें खारिज कर दिया।
Rajesh Khanna ने करीब 163 फ़िल्मों में काम किया। जिनमें से 128 फ़िल्मों में उन्होंने लीड रोल किया। उनकी फ़िल्मों में ‘बहारों के सपने’, ‘आराधना’, ‘दो रास्ते’, ‘बंधन’, ‘सफ़र’, ‘कटी पतंग’, ‘आन मिलो सजना’, ‘आनंद’, ‘सच्चा-झूठा’, ‘दुश्मन’, ‘अंदाज़’, ‘हाथी मेरे साथी’, ‘अमर प्रेम’, ‘दिल दौलत दुनिया’, ‘जोरू का ग़ुलाम’, ‘मालिक’, ‘शहज़ादा’, ‘बावर्ची’, ‘अपना देश’ प्रमुख हैं।
इसके अलावा Rajesh Khanna ने ‘मेरे जीवनसाथी’, ‘अनुराग’, ‘दाग़’, ‘नमक हराम’, ‘आविष्कार’, ‘अजनबी’, ‘प्रेम नगर’, ‘हमशक्ल’, ‘रोटी’, ‘आपकी क़सम’, ‘प्रेम कहानी’, ‘महाचोर’, ‘महबूबा’, ‘त्याग’, ‘पलकों की छांव में’, ‘आशिक़ हूं बहारों का’, ‘छलिया बाबू’, ‘कर्म’, ‘अनुरोध’, ‘नौकरी’, ‘भोला-भाला’, ‘जनता हवलदार’, ‘मुक़ाबला’, ‘अमरदीप’, ‘प्रेम बंधन’, ‘थोड़ी सी बेवफ़ाई’, ‘आंचल’, ‘फिर वही रात’, ‘बंदिश’, ‘क़ुदरत’, ‘दर्द’, ‘धनवान’, ‘अशांति’, ‘जानवर’, ‘धर्मकांटा’, ‘सुराग़’, ‘राजपूत’, ‘नादान’, ‘सौतन’, ‘अगर तुम न होते’, ‘अवतार’, ‘आ अब लौट चलें’, ‘प्यार ज़िंदगी है’ और ‘क्या दिल ने कहा’ फिल्मों में भी काम किया।
Rajesh Khanna को लाइफटाइम अचीवमेंट के अलावा कुल तीन फिल्मफेयर अवॉर्ड मिले
Rajesh Khanna को तीन बार फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड मिला। ये यह अवॉर्ड साल 1971 की फ़िल्म ‘सच्चा झूठा’, साल 1972 की फिल्म ‘आनंद’ और साल 1975 की फिल्म ‘आविष्कार’ के लिए मिला। इसके अलावा साल 2005 में फिल्मफेयर के लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया।
90 के दशक में राजेश खन्ना राजीव गांधी के कहने पर राजनीति में आ गए। उन्होंने साल 1991 में नई दिल्ली से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा और भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी को कड़ी चुनौती दी थी, लेकिन मामूली अंतर से हार गए। लाल कृष्ण आडवाणी ने जीत के बाद नई दिल्ली की सीट छोड़ दी क्योंकि वो गुजरात के गांधी नगर सीट से भी चुनाव जीते थे।

सीट ख़ाली होने के बाद हार से तिलमिलाये Rajesh Khanna ने दोबारा पर्चा भरा लेकिन लाल कृष्ण आडवाणी ने उस उपचुनाव में राजेश खन्ना के सामने फ़िल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा को उतार दिया। कहते हैं कि राजेश खन्ना इस बात से बहुत नाराज हुए। राजेश खन्ना ने उपचुनाव में शत्रुघ्न सिन्हा को भारी मतों से हरा दिया। उसके बाद इन्होंने पूरे जीवन शत्रुघ्न सिन्हा से कभी बात नहीं की।
Rajesh Khanna को साल 1996 के लोकसभा चुनाव में जगमोहन ने हराया
साल 1996 में Rajesh Khanna ने तीसरी बार नई दिल्ली से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा लेकिन इस बार भाजपा के मझे हुए नेता जगमोहन ने उन्हें हरा दिया। इस हार के बाद वो सक्रिय राजनीति से दूर हो गये लेकिन चुनाव के मौके पर वो कांग्रेस उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार करने के लिए पूरे देश में घूमा करते थे। Rajesh Khanna का लंबी बीमारी के बाद 18 जुलाई 2012 को मुंबई में निधन हो गया और हिंदी सिनेमा के एक सुपर स्टार का चैप्टर इस तरह से हमेशा के लिए बंद हो गया।

Rajesh Khanna को याद करते हुए उनकी मशहूर फिल्म ‘आनंद’ के मशहूर डायलॉग, जिसे गुलजार ने लिखा था, अक्सर याद आ जाता है- “जिंदगी और मौत ऊपर वाले के हाथ में है जहांपनाह, जिसे ना आप बदल सकते हैं ना मैं। हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं, जिसकी डोर ऊपर वाले के हाथ बंधी हैं, कब, कौन, कैसे उठेगा, ये कोई नहीं जानता..।”
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