भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने रूस के सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल लीगल फोरम में कानून के शासन और समानता को लेकर महत्वपूर्ण विचार रखे। उन्होंने कहा कि किसी भी न्याय व्यवस्था की वास्तविक मजबूती उसकी संस्थाओं या संधियों से नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि क्या प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक राष्ट्र को न्याय तक समान पहुंच उपलब्ध है। उनके अनुसार, समानता ही कानून की वैधता और विश्वसनीयता की सबसे मजबूत नींव है, न कि विशेषाधिकार।
‘समान न्याय, समान कानून: पहुंच ही अंतरराष्ट्रीय कानून की मानवता का मापदंड है’ विषय पर आयोजित पूर्ण सत्र को संबोधित करते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून की प्रभावशीलता का आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि वह सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध है या नहीं। उन्होंने कहा कि यदि कानून केवल कुछ शक्तिशाली देशों या प्रभावशाली वर्गों तक सीमित रह जाए, तो उसकी वैधता पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक हैं।
अपने संबोधन की शुरुआत उन्होंने रूसी भाषा में अभिवादन “दोब्रि देन” से की और सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल लीगल फोरम को गंभीर कानूनी विमर्श का वैश्विक मंच बताया। उन्होंने प्रसिद्ध साहित्यकार फ्योदोर दोस्तोवस्की के विचारों का उल्लेख करते हुए कानून और समाज के संबंधों पर प्रकाश डाला। साथ ही ‘ब्रॉन्ज हॉर्समैन’ स्मारक का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार विशाल स्मारक को मजबूत आधार की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार न्यायिक संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय कानून की सफलता भी समानता की मजबूत नींव पर निर्भर करती है।
फाल्कोनेट के ब्रॉन्ज हॉर्समैन को रूपक के तौर पर इस्तेमाल करते हुए CJI ने कहा कि पीटर द ग्रेट की मूर्ति थंडर स्टोन पर खड़ी है — “मानव इतिहास में तब तक का सबसे बड़ा पत्थर जिसे स्थानांतरित किया गया” — क्योंकि “स्मारक को ऐसी नींव चाहिए थी जो उसके भार को सह सके। उन्होंने कहा, “अंतरराष्ट्रीय कानून भी वैसा ही है। अदालतें, कन्वेंशन और महान घोषणाएं तभी टिकाऊ हैं जब उनकी नींव मजबूत हो। और वह नींव है समानता।”
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि समानता का सिद्धांत आधुनिक लोकतंत्रों तक सीमित नहीं है। उन्होंने कौटिल्य के अर्थशास्त्र का उल्लेख करते हुए बताया कि भारतीय सभ्यता में सदियों पहले यह विचार स्थापित हो चुका था कि शासक स्वयं कानून के अधीन होता है। उन्होंने रोमन विधि, इस्लामी न्याय परंपरा और अफ्रीकी ‘उबुंटू’ दर्शन का हवाला देते हुए कहा कि दुनिया की विभिन्न सभ्यताओं ने कानून के समक्ष समानता को न्याय का मूल आधार माना है।
उन्होंने संयुक्त राष्ट्र चार्टर में निहित संप्रभु समानता के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून के कुछ मूल सिद्धांत ऐसे हैं जिनसे किसी भी परिस्थिति में समझौता नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि आज भी यदि यह प्रश्न उठता है कि अंतरराष्ट्रीय कानून सभी के लिए समान है या कुछ लोगों का विशेषाधिकार, तो यह वैश्विक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
भारत के न्यायिक अनुभव को साझा करते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा कि भारतीय न्यायपालिका ने न्याय को आम नागरिक तक पहुंचाने के लिए अनेक सुधार किए हैं। जनहित याचिका, निःशुल्क विधिक सहायता, डिजिटल न्याय व्यवस्था और प्रक्रियागत सरलता जैसे कदमों ने न्याय तक पहुंच को अधिक व्यापक बनाया है। उन्होंने कहा कि भारतीय अदालतों ने हमेशा प्रक्रिया को न्याय प्राप्ति का साधन माना है, न कि बाधा।
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों का उल्लेख करते हुए कहा कि यद्यपि वैश्विक स्तर पर अनेक महत्वपूर्ण कानूनी समझौते मौजूद हैं, लेकिन उनका समान और निष्पक्ष अनुपालन अब भी चुनौती बना हुआ है। विशेष रूप से विकासशील देशों को कई बार असमान दबाव और दोहरे मानकों का सामना करना पड़ता है। इसलिए वैश्विक न्याय व्यवस्था को अधिक संतुलित और समावेशी बनाने की आवश्यकता है।
अपने संबोधन के अंत में मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्याय व्यवस्था की सफलता केवल भव्य घोषणाओं से नहीं, बल्कि समान अवसर, समान अधिकार और न्याय तक समान पहुंच सुनिश्चित करने से तय होगी। उन्होंने विधि विशेषज्ञों और न्यायपालिका से आह्वान किया कि वे कानून की इस मजबूत नींव को और सुदृढ़ बनाने की दिशा में मिलकर कार्य करें।
गौरतलब है कि न्यायमूर्ति सूर्यकांत का यह संबोधन ऐसे समय आया है, जब एक दिन पहले ही भारत और रूस के सर्वोच्च न्यायालयों के बीच न्यायिक सहयोग, डिजिटल न्याय प्रणाली और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीकों के आदान-प्रदान को बढ़ावा देने के लिए एक ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए हैं।









