ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में भारत नहीं बना सदस्य, पहली बैठक में ऑब्ज़र्वर की भूमिका

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पहल पर गठित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की पहली बैठक में भारत ने औपचारिक सदस्य के बजाय पर्यवेक्षक (ऑब्ज़र्वर) के रूप में भाग लिया। यह बैठक वॉशिंगटन डीसी स्थित यूएस इंस्टीट्यूट ऑफ पीस में आयोजित की गई, जिसमें करीब 50 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। भारत की ओर से वॉशिंगटन डीसी स्थित भारतीय दूतावास की प्रभारी राजनयिक नामग्या खम्पा ने बैठक में प्रतिनिधित्व किया।

भारत की स्थिति: समर्थन, पर औपचारिक सदस्यता पर विचार

सूत्रों के मुताबिक, भारत को बोर्ड का हिस्सा बनने का निमंत्रण मिला था, लेकिन नई पहल के दावोस लॉन्च कार्यक्रम से भारत ने दूरी बनाए रखी। विदेश मंत्रालय ने 12 फरवरी को स्पष्ट किया था कि प्रस्ताव विचाराधीन है। मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत पश्चिम एशिया में शांति को आगे बढ़ाने वाली पहलों का लगातार समर्थन करता रहा है और प्रधानमंत्री ने भी गाजा समेत पूरे क्षेत्र में दीर्घकालिक और टिकाऊ शांति की दिशा में प्रयासों का स्वागत किया है। इसी क्रम में, बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने के निमंत्रण पर सरकार आंतरिक समीक्षा कर रही है।

पहली बैठक के प्रमुख बिंदु

बैठक के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने बताया कि नौ सदस्य देशों ने गाजा के लिए राहत पैकेज हेतु कुल 7 अरब डॉलर देने पर सहमति जताई है। इसके साथ ही अमेरिका ने शांति बोर्ड के लिए 10 अरब डॉलर के योगदान की घोषणा की। ट्रंप ने कहा कि बोर्ड का उद्देश्य मानवीय सहायता, पुनर्निर्माण और क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देना है, ताकि संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में स्थायी समाधान की राह प्रशस्त हो सके।

भारत की भागीदारी का संकेत

भारत की ओर से ऑब्ज़र्वर के रूप में भागीदारी को कूटनीतिक हलकों में संतुलित संकेत के रूप में देखा जा रहा है—जहां एक ओर नई वैश्विक शांति पहलों में संवाद और सहयोग की इच्छा दिखती है, वहीं औपचारिक सदस्यता पर जल्दबाजी से बचने का रुख भी स्पष्ट है। जानकारों के अनुसार, भारत अपनी पारंपरिक विदेश नीति के अनुरूप सभी पक्षों के साथ संवाद, मानवीय सहायता और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान पर जोर देता है।

आगे क्या?

आने वाले दिनों में यह स्पष्ट हो सकता है कि भारत बोर्ड ऑफ पीस की सदस्यता स्वीकार करता है या नहीं। फिलहाल, पर्यवेक्षक के तौर पर मौजूदगी ने भारत को चर्चा की मेज पर स्थान दिया है—जहां वह अपने दृष्टिकोण, क्षेत्रीय संतुलन और मानवीय प्राथमिकताओं को सामने रख सकता है।

कुल मिलाकर, भारत ने शांति प्रयासों के प्रति समर्थन दोहराते हुए विकल्प खुले रखे हैं। अंतिम फैसला सरकार की समीक्षा और व्यापक रणनीतिक आकलन के बाद ही लिया जाएगा।