Vinod Kumar Shukla Poems: हिंदी साहित्य के महान लेखक विनोद कुमार शुक्ल का निधन मंगलवार (23 दिसंबर) को करीब शाम 5 बजे हुआ। लंबे समय से उनका इलाज रायपुर के AIIMS अस्पताल में चल रहा था। उनके निधन के बाद जहां एक ओर देशभर में हिंदी प्रेमियों के बीच शोक की लहर है, वहीं उनकी रचनाओं को भी याद किया जा रहा है। उनकी कविताएं आम जीवन, साधारण मनुष्य और गहरी संवेदनाओं को बेहद सरल भाषा में व्यक्त करती हैं। यहां उनकी 5 सुप्रसिद्ध कविताओं दी जा रही हैं, जिनमें उनकी सबसे चर्चित कविता “हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था” भी शामिल है—
1. हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे।
– विनोद कुमार शुक्ल
स्रोत : पुस्तक : अतिरिक्त नहीं (पृष्ठ 13) | प्रकाशन : वाणी प्रकाशन | संस्करण : 2000
2. जो कुछ अपरिचित हैं
जो कुछ अपरिचित हैं
वे भी मेरे आत्मीय हैं
मैं उन्हें नहीं जानता
जो मेरे आत्मीय हैं।
कितने लोगों,
पहाड़ों, जंगलों, पेड़ों, वनस्पतियों को
तितलियों, पक्षियों, जीव-जंतु
समुद्र और नक्षत्रों को
मैं नहीं जानता धरती को
मुझे यह भी नहीं मालूम
कि मैं कितनों को नहीं जानता।
सब अत्मीय हैं
सब जान लिए जाएँगे मनुष्यों से
मैं मनुष्य को जानता हूँ।
-विनोद कुमार शुक्ल
स्रोत : पुस्तक : कवि ने कहा (पृष्ठ 11) | प्रकाशन : किताबघर प्रकाशन |संस्करण : 2012
3 . प्रेम की जगह अनिश्चित है
प्रेम की जगह अनिश्चित है
यहाँ कोई नहीं होगा की जगह भी कोई है।
आड़ भी ओट में होता है
कि अब कोई नहीं देखेगा
पर सबके हिस्से का एकांत
और सबके हिस्से की ओट निश्चित है।
वहाँ बहुत दुपहर में भी
थोड़ी-सा अँधेरा है
जैसे बदली छाई हो
बल्कि रात हो रही है
और रात हो गई हो।
बहुत अँधेरे के ज़्यादा अँधेरे में
प्रेम के सुख में
पलक मूँद लेने का अंधकार है।
अपने हिस्से की आड़ में
अचानक स्पर्श करते
उपस्थित हुए
और स्पर्श करते हुए विदा।
-विनोद कुमार शुक्ल
स्रोत : पुस्तक : कवि ने कहा (पृष्ठ 29) | प्रकाशन : किताबघर प्रकाशन | संस्करण : 2012
4. आँख बंद कर लेने से
आँख बंद कर लेने से
अंधे की दृष्टि नहीं पाई जा सकती
जिसके टटोलने की दूरी पर है संपूर्ण
जैसे दृष्टि की दूरी पर।
अँधेरे में बड़े सवेरे एक खग्रास सूर्य उदय होता है
और अँधेरे में एक गहरा अँधेरे में एक गहरा अँधेरा फैल जाता है
चाँदनी अधिक काले धब्बे होंगे
चंद्रमा और तारों के।
टटोलकर ही जाना जा सकता है क्षितिज को
दृष्टि के भ्रम को
कि वह किस आले में रखा है
यदि वह रखा हुआ है।
कौन से अँधेरे सींके में
टँगा हुआ रखा है
कौन से नक्षत्र का अँधेरा।
आँख मूँदकर देखना
अंधे की तरह देखना नहीं है।
पेड़ की छाया में, व्यस्त सड़क के किनारे
तरह-तरह की आवाज़ों के बीच
कुर्सी बुनता हुआ एक अंधा
संसार से सबसे अधिक प्रेम करता है
वह कुछ संसार स्पर्श करता है और
बहुत संसार स्पर्श करना चाहता है।
-विनोद कुमार शुक्ल
स्रोत : पुस्तक : कवि ने कहा (पृष्ठ 27) | प्रकाशन : किताबघर प्रकाशन | संस्करण : 2012
मैं अंतर्मुखी होकर कविता में अपने को एक वाक्य देता हूँ—
कि चलो निकलो।
इस वाक्य में बाहर देना भूल जाता हूँ।
इसलिए अपने अंदर और निकल जाता हूँ।
अंतर्मन के तालाब में
बहिर्मुख के प्रतिबिंब को
अंतर्मुख देखता हूँ।
बहिर्मुख की दाढ़ी बनाता हूँ।
बहिर्मुख को धोकर
अंतर्मुख साफ़ देखता हूँ।
तैयार होकर बाहर
परंतु अंतर्मुख के साथ निकल आता हूँ
खुली हवा में उसी से साँस लेता हूँ।
-विनोद कुमार शुक्ल
स्रोत : पुस्तक : कवि ने कहा (पृष्ठ 53) | प्रकाशन : किताबघर प्रकाशन | संस्करण : 2012
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