वैष्णो देवी में हाल ही में हुए हादसे ने न केवल श्रद्धालुओं को झकझोर दिया, बल्कि कई सवाल भी खड़े कर दिए। इस त्रासदी से बचे भक्तों का कहना है कि माता की शांति और तपस्या को भंग किया जा रहा है। उनका मानना है कि त्रिकुटा पर्वत पर माता रानी युगों से तपस्या में लीन हैं, और इंसानी हस्तक्षेप तथा अंधाधुंध विकास कार्य उनके आशीर्वाद को नाराज़ कर रहे हैं।
श्रद्धालुओं की पीड़ा
हादसे से बच निकले एक भक्त ने भावुक होकर कहा, “माता रानी गुफा में श्रीराम के लिए तपस्या कर रही हैं और बाहर लोग हॉर्न बजाकर, शोर मचाकर उनकी तपस्या को भंग कर रहे हैं। मेरा दिल कह रहा है कि माता गुस्से में हैं। हजारों वर्षों से जो तपस्या चल रही थी, उसमें खलल डाला जा रहा है। क्या हमें सच में इतनी डेवलपमेंट यहीं करनी चाहिए?”
श्रद्धालुओं का कहना है कि माता के आशीर्वाद में ही इस यात्रा का महत्व है, लेकिन लोग उसकी पवित्रता को भूल गए हैं। एक अन्य भक्त ने गुस्से में कहा, “श्राइन बोर्ड लगातार निर्माण करता जा रहा है। माता के पहाड़ों की जड़ों को खोखला कर दिया गया है। कहीं और विकास करो, यहां नहीं। मगर कोई आवाज उठाता ही नहीं, जिसे दर्शन चाहिए, वह चुप रह जाता है।”
माता वैष्णो देवी की कथा
हिंदू मान्यताओं के अनुसार माता वैष्णो देवी का जन्म दक्षिण भारत में भगवान विष्णु के अंश से हुआ था और उनका बचपन का नाम त्रिकुटा था। छोटी उम्र से ही उन्होंने भगवान श्रीराम को पति रूप में पाने के लिए तपस्या शुरू कर दी थी।
रामायण के अनुसार, जब श्रीराम माता सीता की खोज में निकले तो वे रामेश्वरम तट पर त्रिकुटा से मिले। त्रिकुटा ने उनसे विवाह की इच्छा व्यक्त की। श्रीराम ने वचन दिया कि लंका विजय के बाद वे लौटकर आएंगे और यदि देवी ने उन्हें पहचान लिया, तो विवाह करेंगे। लेकिन साधु वेश में आए राम को देवी पहचान नहीं पाईं। तब श्रीराम ने भविष्य में कल्कि अवतार लेने के बाद विवाह का वादा किया। उसी क्षण से देवी त्रिकुटा पर्वत पर वास करने लगीं और आज भी वहीं विराजमान मानी जाती हैं।
हादसे से पहले कुदरत के संकेत
चश्मदीदों ने दावा किया कि आपदा से पहले ही प्रकृति ने चेतावनी दी थी। अचानक आकाश में तेज बिजली चमकी, मौसम बिगड़ गया और छोटे-छोटे पत्थर रास्तों पर गिरने लगे। भक्तों का कहना है कि इन संकेतों को देखकर यात्रा को रोक देना चाहिए था, लेकिन श्राइन बोर्ड ने इस पर ध्यान नहीं दिया।
सवालों के घेरे में श्राइन बोर्ड
अब हादसे के बाद कई श्रद्धालु श्राइन बोर्ड पर सवाल उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि लगातार बढ़ते निर्माण और यात्रियों की भीड़ ने इस पवित्र स्थल के संतुलन को बिगाड़ दिया है। भक्तों का कहना है कि माता वैष्णो देवी की पवित्र गुफा और त्रिकुटा पर्वत का प्राकृतिक स्वरूप बनाए रखना ही सबसे बड़ी भक्ति है।
आस्था बनाम विकास
यह हादसा एक बार फिर उस बहस को जन्म दे रहा है कि क्या धार्मिक स्थलों पर अंधाधुंध विकास सही है? श्रद्धालु मानते हैं कि माता की असली कृपा तभी बरसेगी जब उनकी तपस्या और उनके धाम की पवित्रता को भंग नहीं किया जाएगा।