कभी देश में बचे थे महज 300 घड़ियाल, आज UP से अमेरिका और जापान तक पहुंच रही संरक्षण की सफलता की कहानी

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उत्तर प्रदेश का कुकरैल घड़ियाल पुनर्वास केंद्र आज वन्यजीव संरक्षण की ऐसी मिसाल बन चुका है, जिसकी गूंज देश ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों तक सुनाई दे रही है। कभी विलुप्ति के खतरे से जूझ रहे घड़ियाल अब उत्तर प्रदेश के सफल संरक्षण मॉडल की बदौलत नदियों में लौट रहे हैं और अमेरिका, जापान समेत कई देशों के चिड़ियाघरों और संरक्षण केंद्रों में आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।

साल 1970 में किए गए सर्वेक्षण में पूरे देश में घड़ियालों की संख्या घटकर महज 250 से 300 रह गई थी। इस संकट को देखते हुए उत्तर प्रदेश ने वर्ष 1975 में लखनऊ के कुकरैल क्षेत्र में घड़ियाल पुनर्वास केंद्र की स्थापना की। शुरुआत में चंबल नदी से लाए गए अंडों को वैज्ञानिक पद्धति से संरक्षित कर हैचिंग कराई गई। यही पहल आगे चलकर देश के सबसे सफल वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रमों में शामिल हो गई।

आज कुकरैल पुनर्वास केंद्र में 466 से अधिक घड़ियाल मौजूद हैं और हर वर्ष लगभग 140 से 160 नए घड़ियाल इस संरक्षण अभियान से जुड़ रहे हैं। इसकी उल्लेखनीय सफलता को देखते हुए नेशनल जियोग्राफिक सोसाइटी ने इसे भारत की सबसे सफल संरक्षण परियोजनाओं में स्थान दिया है।

कैप्टिव ब्रीडिंग से मिली नई जिंदगी

घड़ियाल संरक्षण कार्यक्रम की सबसे बड़ी सफलता नियंत्रित प्रजनन यानी कैप्टिव ब्रीडिंग रही है। वर्ष 1988 से इस प्रक्रिया के जरिए अंडों की हैचिंग कर बच्चों को सुरक्षित वातावरण में तैयार किया जाता है। करीब ढाई वर्ष तक उनकी देखभाल के बाद उन्हें प्राकृतिक आवास वाली नदियों में छोड़ा जाता है। इससे घड़ियालों की संख्या बढ़ाने में महत्वपूर्ण मदद मिली है।

नदियों में लौट रहा दुर्लभ जीव

कुकरैल में तैयार किए गए घड़ियालों को गंगा, घाघरा, गेरूआ, गंडक और चंबल जैसी प्रमुख नदियों में छोड़ा जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि नदियों के पारिस्थितिक संतुलन को भी मजबूत करना है। उत्तर प्रदेश के दुधवा नेशनल पार्क, कतर्नियाघाट वन्यजीव अभ्यारण्य, राष्ट्रीय चंबल अभ्यारण्य, हस्तिनापुर और महराजगंज-बहराइच क्षेत्र की नदियों में भी घड़ियालों की अच्छी उपस्थिति दर्ज की जा रही है।

पर्यटन का भी बन रहा बड़ा केंद्र

घड़ियाल संरक्षण के साथ-साथ कुकरैल केंद्र ईको-टूरिज्म का प्रमुख आकर्षण भी बन गया है। यहां म्यूजियम, इंटरप्रिटेशन सेंटर, घड़ियाल मॉडल, विश्राम स्थल, पेयजल और अन्य सुविधाएं उपलब्ध हैं। हर साल करीब दो लाख भारतीय और 100 से अधिक विदेशी पर्यटक यहां पहुंचते हैं और संरक्षण की इस अनूठी यात्रा को करीब से देखते हैं।

विदेशों तक पहुंचा यूपी का मॉडल

कुकरैल में पले-बढ़े घड़ियाल केवल भारतीय नदियों तक सीमित नहीं रहे। यहां से भूटान, पाकिस्तान, जापान और अमेरिका के न्यूयॉर्क तक घड़ियाल भेजे गए हैं। यह उपलब्धि बताती है कि उत्तर प्रदेश का संरक्षण मॉडल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी स्वीकार्यता हासिल कर चुका है।

पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह का कहना है कि उत्तर प्रदेश दुर्लभ वन्यजीवों के संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। वहीं वन विभाग ने नमामि गंगे परियोजना के तहत इस वर्ष 500 घड़ियाल अंडों की हैचिंग का लक्ष्य तय किया है, जिससे भविष्य में इनकी संख्या और बढ़ने की उम्मीद है।

घड़ियाल संरक्षण की यह कहानी साबित करती है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, निरंतर प्रयास और प्रभावी प्रबंधन के माध्यम से किसी भी संकटग्रस्त प्रजाति को नया जीवन दिया जा सकता है। उत्तर प्रदेश का यह मॉडल आज दुनिया के लिए प्रेरणा बन चुका है।