- By Shweta Rai
भारत में जब से नाट्य विधा की शुरुआत हुई तब से अलग अलग रुप धारण कर किरदार निभाए जाने का प्रचलन भी शुरु हुआ। राजाओं-महाराजाओं के समय भी राज्य के प्रश्रय में रहने वाले बहुरूपिया कलाकार नाटकों में अक्सर पुरूष कलाकार स्त्री का वेश लेकर अभिनय कर लिया करते थे। यह परंपरा हिंदी सिनेमा के उदय के बाद भी चली। इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि पहले महिलाओं का नाटकों या फिल्मों में काम करना अच्छा नहीं समझा जाता था। बाद में इस सोच में थोड़ा बदलाव आया और औरतों का फिल्मों औऱ नाटकों में काम करना स्वीकार किया जाने लगा। कई बार तो किरदारों को हास्यास्पद बनाने के लिये भी पुरूष अभिनेताओं ने महिलाओं का किरदार निभाया।
कितना मुश्किल रहा फिल्मों की पहली अभिनेत्री की खोज

भारत में 1912 में जब दादा साहब फालके ने पहली फिल्म राजा हरिशचन्द्र का निर्माण शुरू हुआ तब महारानी तारामती का रोल करने के लिए कोई महिला तैयार नहीं हुई, यहां तक की वेश्याओं ने भी दादा साहब को मना कर दिया बहुत खोजते खोजते एक चाय देने वाले को दादा ने तीस गुनी तनख्वाह दे कर उसे अपनी फिल्म राजा हरिश्चंद्र की नायिका तारामती का रोल दिया। इस तरह एक पुरुष अण्णा सालुंके पुरुष हो कर भी फिल्मों की पहली अभिनेत्री बना। फिल्म लगातार 13 दिनों तक चली, जो उस समय का एक बड़ा रिकॉर्ड था। फालके ने अगले साल एक फिल्म बनायी ‘मोहिनी-भस्मासुर’। इसमें वे एक महिला को ही एक अभिनेत्री के रुप में लेने में सफल रहे। इस फिल्म के लिए रंगमंच पर काम करने वाली अभिनेत्री कमलाबाई गोखले दादा साहब को मिल गईं। कमलाबाई हिन्दी फिल्मों की पहली महिला नायिका बनीं । इसके बाद फिल्मों के जरिए कमला बाई की अमीरी और लोकप्रियता ने वेश्याओं ही नहीं अच्छे घरों की औरतों. युवतियों को भी फिल्मों की ओर खूब आकर्षित किया।
किशोर कुमार, शम्मी कपूर, विश्वजीत के किरदारों ने पायी प्रसिद्धि

हिन्दी सिनेमा को नायिका तो मिली लेकिन शायद महिला किरदारों में इतनी विविधता थी कि कई बड़े बड़े नायक अपने आप को महिला किरदारों में ढाला और दर्शकों को प्रभावित किया। गाहे-बगाहे फिल्मों में कभी हँसाने के लिये और कभी कहानी की मांग के अनुसार रूप बदलकर अपनी प्रेमिका को रिझाने के लिये। 1962 में किशोर कुमार की फिल्म “हाफ टिकट ” आयी जिसके एक गाने “आकर सीधी लगी जैसे दिल पर कटरिया” की चर्चा खूब रही और वो गाना बेहद हिट हुआ। मोहिनी महिला वेश में किशोर कुमार ने ऐसी नखरीली और मस्ती भरी अदाओं से गाने को पेश किया कि हर किसी के चेहरे खिल उठे। इस गाने को किशोर कुमार ने ही मेल और फीमेल दोनों आवाजों में गाया ।

1963 में शम्मी कपूर ने फिल्म “ब्लफ मास्टर” में शोख हसीना का वेश धारण किया और अपने गुड लुक्स, अदायें ,नखरों के साथ एक गाने चली –चली कैसी हवा चली को बखूबी फिल्माया। शम्मी की शोखियों ने सबका दिल जीत लिया । चाकलेटी चेहरे के हीरो विश्वजीत की एक फिल्म किस्मत तो सुपर हिट हुई, उनके महिला वेश में फिल्माए गाने “कजरा मोहब्बत वाला” की वजह से। तब इस गाने ने धूम मचा दी थी।
इस फन के महारथी थे महमूद, सुपर स्टार अमिताभ ने भी की नकल
महमूद तो बहरुपियों के बादशाह थे। कभी वो लड़की बनकर कॉमेडी करते नजर आये तो कभी अपनी शोख अदाओं से दर्शकों के दिलों को जीतने में कामयाब रहे। फिल्म भूत बंगला में महमूद ने महिला किरदार में दर्शकों का जबरदस्त मनोरंजन किया। दिल तेरा दीवाना और जिद्दी में भी महमूद ने औरत के गेटअप में अपनी कॉमेडी से खूब हँसाया। अमिताभ भी इनकी एक्टिंग के दीवाने थे। यही वजह थी की अमिताभ की कॉमेडी में महमूद की एक्टिंग की झलक साफ दिखायी देती है। 1981 में आयी लावारिस फिल्म के गाने ने “मेरे अंगने में ” अभिनेता अमिताभ बच्चन का महिला गेटअप वाला गाना उस फिल्म की यूएसपी बन गया।
कमल हासन और गोविंदा ने तो पूरी फिल्म ही कर डाली महिला बन कर
अभिनेता कमल हासन और गोविन्दा को महिला बन कर किरदार निभाने में नंबर 1 माना जा सकता है जिन्होंने पूरी तरह से अपने आप को कई बार महिला किरदारों में ढाला और हिट भी रहे। 1997 में कमल हासन की ‘चाची 420’ फ़िल्म आई , जिसमें कमल अपनी बेटी के लिए कामवाली बाई बनते हैं। जिन्हें सब चाची कह कर बुलाते हैं। फ़िल्म को दर्शकों का खूब प्यार और साथ मिला।

कमल हासन के किरदार को लोगों ने खूब पसंद किया। गोविंदा ने भी कुछ इसी तरह का धमाल किया 1998 में आयी फिल्म ‘आंटी नंबर 1‘ में । वैसे तो गोविंदा ने कई फ़िल्मों में महिला का किरदार निभाया है लेकिन आंटी नंबर वन पूरी फ़िल्म उनके इसी रोल पर आधारित थी । दर्शकों को उनके द्वारा निभाया गया महिला का रोल काफ़ी पसंद आया और आंटी नंबर 1 बनकर गोविंदा ने सबका दिल जीत लिया।
नई पीढ़ी के हीरो भी कम नहीं
कुछ अच्छा और नया की करने की दौड़ में कई पुरुष किरदार महिला के किरदार निभाने से भी नहीं हिचके, जिनमें सलमान खान , रितेश देशमुख, आमिर खान, संजय दत्त ,श्रेयस तलपड़े जैसे कई नाम शामिल हैं। जिन्होनें अपने किरदारों से दर्शकों को खूब हँसाया। रितेश देशमुख की कॉमिक टाइमिंग परफेक्ट हैं। रोमांस किंग और बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान भी इससे अछूते नहीं रहे । फिल्म ‘डुप्लीकेट‘ में एक फीमेल कैरेक्टर में बड़ी क्यूट लड़की के रूप में नज़र आये । बॉलीवुड के मुन्ना भाई यानी संजय दत्त भी फिल्म ‘मेरा फैसला‘ में एक महिला के किरदार में नजर आए थे । सलमान खान यानि बॉलीवुड के दबंग खान ने 2006 में आई फिल्म ‘जानेमन’में अक्षय कुमार की मदद के लिए अपने आप को महिला के रूप में ढाला। अक्षय कुमार और दीपक तिजोरी की हिट जोड़ी ने भी अब्बास-मस्तान की ‘खिलाडी‘ फिल्म में अपने हुस्न के जलवे बिखेरे। उस फ़िल्म में गर्ल्स हॉस्टल में रहने के लिए अक्षय कुमार और दीपक तिजोरी लड़की बने थे।
महिला किरदार में विलेन भी बने पुरुष कलाकार
भारतीय फिल्मों में 90 के दशक में विलेन किरदारों को एक खतरनाक रुप देने के लिये महिलाओं के गेटअप को अपनाकर ऐसे किरदार गढ़े गए जिसे देखकर लोगों की रूह तक काँप गयी। अब उनके चेहरे लोगों को हँसाने के बजाय डराने लगे। 1991 की फ़िल्म ‘सड़क‘ की महारानी बने सदाशिव अमरापुरकर फिल्म में विलेन की भूमिका में थे जिसे देखकर दर्शकों की साँसे ही थम जाती थी। इस खौफनाक किरदार को भी लोगों ने बहुत पसंद किया।

1999 की संघर्ष में आशुतोष राणा ने किन्नर का किरदार निभाया जिसके लिए साल का बेस्ट विलेन का अवॉर्ड अपने नाम किया। 1997 की फ़िल्म ‘तमन्ना‘ में परेश रावल के निभाए किन्नर के किरदार को भी दर्शकों का भरपूर प्यार मिला। इसी तरह 2013 की फ़िल्म ‘रज्जो‘ में महेश मांजरेकर ने और इसी साल आई तिग्मांशु धूलिया की फ़िल्म ‘बुलेट राजा’ में रवि किशन ने भी महिला वेशभूषा में किन्नर किरदारों में एक खास छाप छोड़ी।
महिला वेशभूषा में पुरुष कलाकारों का काम करना कभी भले ही मजबूरी रही हो, पर समय के साथ बदलाव ने सभी सीमाओं को खत्म करते हुए सारे बंधन ही खोल दिए। महिलाओं को अपने तरीके से अभिव्यक्ति की आजादी मिली। तो फिल्मकारों के लिए चैलेंज भी बढा। इसके बाद भी फिल्मी किरदारों को अलग शेड देने के क्रम में तो कभी कहानी की जरुरत के अनुसार जब भी जरुरत पड़ी पुरुष किरदार ने भी महिलाओं का वेश धारण करने में आनाकानी नहीं की, बल्कि एक अवसर मान कर उसे लपका और अपने किरदारों को अमर कर गए।