आज कल की भागती-दौड़ती जिंदगी में लोग अपने स्वास्थय पर ध्यान नहीं दे पाते हैं जिसकी वजह से उनका शरीर कई गंभीर बीमारियों से घिर जाता है। इन बीमारियों में से कैंसर भी एक ऐसी बीमारी है। भारत के डॉक्टरों ने इस बीमारी से ग्रसित मरीजों के लिए दवाई देने का एक एक नया तरीका विकसित किया है । दिल्ली के एम्स डॉक्टरों ने कैंसर के मरीजों का इलाज करने के लिए एक नई तकनीकी विकसित की है जो पेट से जुड़े कैंसर जैसे- कोलोन कैंसर और कोलोरेक्टल कैंसर में ज्यादा प्रभावी साबित होगी।
इस तकनीक के तहत सर्जरी के दौरान कीमाथेरपी वाली दवाईयों को गर्म करके सीधे पेट में डाल दिया जाएगा। आमतौर पर कीमोथेरपी की दवाईयों को सर्जरी के बाद नसों में डाला जाता था ताकि कैंसर के सेल्स को खत्म किया जा सके। इस नई तकनीक के जरिए डॉक्टर अब कीमोथेरपी की दवाइयों का एक बड़ा डोज मरीज के शरीर तक पहुंचा पाएंगे।
एम्स के सर्जिकल ऑनकॉलजी के हेड डॉ एस वी एस देओ कहते हैं, ‘इस नई तकनीक की मदद से मरीज के जीवित बचने की संभावना बढ़ जाएगी। इस तकनीक को हाइपरथेर्मिक इंट्रापेरिटनील कीमोथेरपी (HIPEC) कहते हैं जो पश्चिमी देशों में प्रयोग के तौर पर पिछले 2 दशकों से भी ज्यादा समय से इस्तेमाल हो रहा है लेकिन भारत में इस तकनीक के बारे में हाल ही में जानकारी मिली है।’
डॉ देओ कहते हैं, ‘इस तकनीक के इस्तेमाल से सर्जरी के दौरान होने वाली मौतों का आंकड़ा 10 प्रतिशत से घटकर 2-3 प्रतिशत पर आ गया है। साथ ही इस नई तकनीक के इस्तेमाल से मरीजों के ओवरवॉल बचने की संभावना भी 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ गई है।’ एम्स के अलावा भारत के कुछ निजी अस्पताल भी HIPEC की सुविधा देते हैं लेकिन वहां यह बेहद महंगा है जबकि एम्स में यह सुविधा या तो फ्री है या फिर इसके लिए सब्सिडाइज्ड कीमत ली जाती है।
हालांकि डॉक्टरों ने जोर देकर कहा कि इस तकनीक को सभी तरह के कैंसर मरीजों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसका इस्तेमाल सिर्फ उन्हीं कैंसर मरीजों के लिए किया जा सकता है जो पेट के कैंसर से पीड़ित हैं। साथ ही HIPEC को सिर्फ ऐसे अस्पताल या संस्थान में ही करवाना चाहिए जहां इस तकनीक का इस्तेमाल करने वाले डॉक्टर पूरी तरह से अनुभवी और कुशल हों क्योंकि दवा के डोज या तापमान में किसी भी तरह की गड़बड़ी मरीज के मौत का कारण बन सकती है।
बता दें कि एम्स ने हाल ही में एक वर्कशॉप का भी आयोजन किया था जिसके जरिए युवा सर्जनों को HIPEC की समुचित ट्रेनिंग दी गई।
डॉ देओ ने बताया कि एम्स में HIPEC तकनीक का इस्तेमाल पहली बार साल 2013 में 35 साल की एक महिला पर किया गया था जो पेरिटनील कैंसर से पीड़ित थी। डॉ देओ आगे कहते हैं, ‘उस वक्त हम इस तकनीक के नतीजे के बारे में आश्वस्त नहीं थे बावजूद इसके हमने इसका इस्तेमाल किया क्योंकि हम उस महिला की जान बचाना चाहते थे। वह महिला आज भी जीवित है।’ अचानक मिली उस सफलता के बाद इस तकनीक को ट्रायल बेसिस पर करीब 100 मरीजों पर इस्तेमाल किया गया एम्स में स्थित HIPEC की स्टैंडर्ड मशीन से होकर गुजरे।