​वैश्विक बिसात पर भारत: महाशक्तियों का टकराव और उभरती नई विश्व व्यवस्था

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21वीं सदी का तीसरा दशक वैश्विक राजनीति के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हो रहा है। 2026 में दुनिया एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहाँ पुराने समीकरण ध्वस्त हो रहे हैं और नई व्यवस्थाएं जन्म ले रही हैं। युद्ध से पहले ईरान ने दशकों तक अपने देश से बाहर लेबनान में हिजबुल्लाह, गाजा में हमास, यमन में हूतियों के माध्यम से अपनी सुरक्षा की दीवार खड़ी की थी। इजरायल और अमेरिका के ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ से ईरान के ‘प्रॉक्सि नेटवर्क’ की प्रासंगिकता खत्म होने लगी है। यह ईरान के लिए ‘रणनीतिक अकेलेपन’ की स्थिति है और नये वर्ल्ड ऑर्डर का आगाज है। युद्ध ने ईरान के अस्तित्व को एक ऐसे बिंदु पर ला खड़ा किया है जहाँ से एक ‘राष्ट्र’ के रूप में उसके बिखरने का खतरा वास्तविक लगने लगा है।

ईरान के वजूद का संकट

फरवरी 2026 के अंत में शुरू हुआ ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ (अमेरिका) और ‘ऑपरेशन रोरिंग लायन’ (इजरायल) ने पश्चिम एशिया के भूगोल और राजनीति को झकझोर कर रख दिया है। यह संघर्ष केवल सीमावर्ती झड़प नहीं, बल्कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसके ‘प्रॉक्सि नेटवर्क’ को जड़ से खत्म करने की एक व्यापक सैन्य योजना है।

ईरान कई जातीय समूहों का देश है। केंद्रीय सत्ता कमजोर होते ही बाहरी मदद से ये समूह स्वायत्तता या आजादी की मांग कर रहे हैं। अमेरिका और इजरायल द्वारा पश्चिमी सीमा पर कुर्द लड़ाकों और दक्षिण-पूर्व में बलूच समूहों को सैन्य सहायता देने की रिपोर्टें ईरान के टूटने का संकेत दे रही हैं।
​सीरिया मॉडल: यदि तेहरान का नियंत्रण ढीला पड़ता है, तो ईरान ‘सीरिया’ की तरह अलग-अलग प्रभाव क्षेत्रों में बंट सकता है, जहां अलग-अलग गुटों का राज होगा।

इजरायल के लिए एक “कमजोर और अराजक ईरान” जैसे इराक या लीबिया अधिक फायदेमंद है, जो अपनी आंतरिक लड़ाइयों में इतना उलझा रहे कि कभी इजरायल की सुरक्षा के लिए खतरा नहीं बन सके। यह ‘रणनीतिक अराजकता’ ईरान के अस्तित्व को एक संगठित देश के रूप में समाप्त कर सकती है।

ईरान की रक्षा उसकी सीमाओं के बाहर जैसे लेबनान, सीरिया, यमन के जरिए होती थी। ‘ऑपरेशन रोरिंग लायन’ ने इन ‘प्रॉक्सि’ नेटवर्क को काटकर ईरान को अकेला कर दिया है। बिना बाहरी कवच और बिना आंतरिक स्थिरता के, ईरान एक ऐसा “खुला मैदान” बन गया है जहाँ कोई भी बाहरी शक्ति हस्तक्षेप कर सकती है।

​ईरान आज उस मोड़ पर है जहाँ वह या तो एक ‘गैरीसन स्टेट’ (सैनिक तानाशाही) में बदल जाएगा या फिर ‘विखंडन’ की ओर बढ़ेगा। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति अब इस बात पर केंद्रित है कि क्या ईरान को पूरी तरह गिरने दिया जाए, या फिर परमाणु ठिकानों की सुरक्षा के लिए एक ‘नियंत्रित संक्रमण’ किया जाए। इसका मतलब साफ है कि ईरान का भविष्य अब अंतरराष्ट्रीय शक्तियों के हाथ में है।

यह बात तय है कि अगर ईरान एक संगठित राष्ट्र के रूप में बिखरता है या उसका वजूद खत्म होता है, तो यह 21वीं सदी की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक आपदा और बदलाव का कारण बनेगा। ईरान के भीतर कुर्द, अजेरी, बलूच और अरब मूल के लोग अपने-अपने स्वतंत्र राज्यों जैसे ‘कुर्दिस्तान’ या ‘ग्रेटर बलूचिस्तान’ की मांग करेंगे। इससे तुर्की, इराक, पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमाएं अस्थिर हो जाएंगी। ईरान कई छोटे-छोटे लड़ाका गुटों के क्षेत्रों में बंट जाएगा, जिससे यह आतंकवाद का नया गढ़ बन जायेगा। चीन का ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ ईरान से होकर गुजरता है। ईरान के टूटने से चीन के अरबों डॉलर का निवेश डूब जाएगा और उसका यूरोप तक पहुंचने का जमीनी रास्ता बंद हो जाएगा। भारत के लिए एकमात्र राहत यह होगी कि पाकिस्तान के “रणनीतिक गहराई” देने वाला साथी खत्म हो जाएगा। ईरान का अंत केवल एक देश का अंत नहीं होगा, बल्कि यह दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था का अंत होगा। इससे दुनिया एक ऐसे दौर में प्रवेश करेगी जहाँ सीमाएं अस्थिर होंगी और ऊर्जा की कमी के कारण युद्ध और बढ़ेंगे।

नये वर्ल्ड ऑर्डर में भारत की अहमियत

पश्चिम एशिया के मुस्लिम देशों के लिए भारत की अहमियत अब केवल एक “मजदूर आपूर्ति करने वाले देश” या “खरीदार” की नहीं रह गई है, बल्कि भारत अब उनके लिए एक अपरिहार्य रणनीतिक और आर्थिक साझेदार बन चुका है। भारत की ‘लिंक वेस्ट’ वह सक्रिय विदेश नीति है जिसके जरिए हम पश्चिम एशिया को केवल एक बाजार नहीं, बल्कि अपनी सुरक्षा और विकास का एक हिस्सा मानते हैं। 2026 के युद्धग्रस्त माहौल में, यह नीति ही भारत को अरब देशों और इजरायल के बीच एक विश्वसनीय मध्यस्थ के रूप में स्थापित करती है। दूसरी तरफ भारत और सऊदी अरब के बीच हालिया ‘डिफेंस डील 2026’ ने ‘लिंक वेस्ट’ नीति को एक ऐतिहासिक मजबूती दी है। सऊदी अरब का भारत के साथ रक्षा सौदा करना यह साफ संकेत है कि अब वह सुरक्षा के मामलों में पाकिस्तान पर निर्भर नहीं है और भारत की अहमियत को समझता है।

वहीं पाकिस्तान आज अपनी ही पुरानी नीतियों के जाल में फंसा हुआ है। वह “आतंकवाद का रहनुमा” बनने की चाहत भले ही रखे, लेकिन उसकी आर्थिक स्थिति और अफगान तालिबान के साथ बढ़ता युद्ध उसे ऐसा करने से रोक रहा है। 2026 में पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चुनौती आतंकवाद को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि खुद को आतंकवाद से बचाना है। आतंकवाद पर भारत की वर्तमान रणनीति ‘डिटेरेंस बाई एग्जॉर्शन’ की है, जिसका अर्थ है पाकिस्तान को आतंकवाद के समर्थन के लिए इतनी भारी कीमत चुकाने पर मजबूर करना कि वह इसे जारी नहीं रख सके।

मिडिल ईस्ट में आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले राष्ट्रों और उनकी सैन्य शक्ति का विश्लेषण 2026 के वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य के आधार पर काफी बदल चुका है। अमेरिका और इजरायल के अनुसार ईरान दुनिया का सबसे बड़ा राज्य प्रायोजित आतंकवाद का केंद्र रहा है। ईरान अपने “एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस” यानी हमास, हिजबुल्लाह, हूती के माध्यम से क्षेत्र में प्रभाव डालता है। हालांकि, फरवरी-मार्च 2026 में जारी ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ ने ईरान के इस नेटवर्क को काफी कमजोर कर दिया है। तुर्की पर अक्सर सीरिया में सक्रिय कुछ चरमपंथी गुटों को समर्थन देने का आरोप लगता रहा है, विशेषकर वे जो कुर्द लड़ाकों के खिलाफ लड़ते हैं। कतर पर हमास और तालिबान जैसे समूहों के साथ राजनयिक और वित्तीय संबंध रखने के आरोप लगते हैं, हालांकि वह खुद को एक मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत करता है। अफगानिस्तान मिडिल ईस्ट के पड़ोस में होने के नाते, तालिबान शासित अफगानिस्तान अब TTP और अल-कायदा जैसे समूहों के लिए “सुरक्षित पनाहगाह” बन गया है, जिससे पूरा क्षेत्र अस्थिर हो रहा है। हालांकि, अमेरिका और इजरायल के हालिया सैन्य अभियानों ने इन देशों की “आतंकवाद प्रायोजित करने की क्षमता” को ऐतिहासिक रूप से न्यूनतम स्तर पर पहुँचा दिया है।

ट्रंप की नजर में भारत

ट्रंप प्रशासन भारत को चीन के खिलाफ एक अनिवार्य जवाबी शक्ति के रूप में देखता है, लेकिन साथ ही व्यापारिक मोर्चे पर वह भारत को एक प्रतिस्पर्धी भी मानता है। ट्रंप प्रशासन की नीति में एक बड़ा बदलाव यह आया है कि वे भारत को “चीन जैसी रियायतें” देने के पक्ष में नहीं हैं। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि 20 साल पहले चीन को जो आर्थिक लाभ दिए गए, वैसी गलती भारत के साथ नहीं दोहराई जाएगी। ट्रंप की नजर में भारत एक “अनिवार्य लेकिन चुनौतीपूर्ण” मित्र है।

नई विश्व व्यवस्था की आहट

नये परिवेश में रूस-चीन-ईरान नई धुरी के तौर पर उभरे हैं। रूस और चीन ने ईरान को सीधे सैन्य समर्थन देने के बजाय ‘रणनीतिक अस्पष्टता’ की नीति अपनाई है। बीजिंग ईरान को इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों और उपग्रह नेविगेशन बेड्यू सिस्टम के माध्यम से तकनीकी सहायता दे रहा है, जिससे ईरानी मिसाइलों की सटीकता बढ़ी है। वहीं यूक्रेन युद्ध में व्यस्त रूस, ईरान को कूटनीतिक कवच प्रदान कर रहा है, ताकि अमेरिका का ध्यान यूरोप से हटकर पश्चिम एशिया पर केंद्रित रहे। जबकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका की विदेश नीति “अमेरिका फर्स्ट” और “शॉर्ट-टर्म गेन्स” के इर्द-गिर्द घूम रही है। अमेरिका ईरान में शासन परिवर्तन तो चाहता है, लेकिन एक और लंबे जमीनी युद्ध से बचना चाहता है, क्योंकि अमेरिकी सैनिकों के हताहत होने की खबरें घरेलू राजनीति में दबाव बना रही हैं।

ऊर्जा संकट और भारत

पश्चिम एशिया में लगी आग भारत के लिए केवल एक विदेशी मामला नहीं है; यह सीधे हमारी अर्थव्यवस्था और सुरक्षा से जुड़ा है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85-90% कच्चा तेल आयात करता है। होरमुज़ जलडमरूमध्य में तनाव ने भारत की ‘ऊर्जा लचीलापन’ की परीक्षा ली है। भारत ने अपने भूमिगत भंडारों जैसे विशाखापत्तनम, मैंगलोर का उपयोग शुरू कर दिया है, लेकिन ये केवल 9-10 दिनों के लिए पर्याप्त हैं। भारत का 90% एलपीजी आयात इसी संकटग्रस्त क्षेत्र से आता है, जिससे घरेलू रसोई गैस की कीमतों पर भारी दबाव है।

भविष्य की राह

मिडिल ईस्ट के देशों की आंतरिक कलह भारत के लिए एक कूटनीतिक ‘टाइटरोप वॉक’ (तनी हुई रस्सी पर चलना) जैसी है। भारत का सबसे बेहतर विकल्प “हितों पर आधारित तटस्थता” और “ऊर्जा आत्मनिर्भरता” की ओर बढ़ना है। 2026 का यह वैश्विक परिदृश्य यह स्पष्ट करता है कि अब कोई भी देश अलगाव में नहीं रह सकता। कूटनीति की दुनिया में “कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, सिर्फ स्थायी हित होते हैं। ऐसे मेंभारत के लिए आने वाला समय ‘रणनीतिक व्यवहारिकता’ का है। हमें अपनी ऊर्जा आपूर्ति के लिए रूस और लैटिन अमेरिका जैसे वैकल्पिक स्रोतों की ओर तेजी से बढ़ना होगा, साथ ही अपनी रक्षा जरूरतों के लिए स्वदेशीकरण पर जोर देना होगा। दुनिया एक बड़े बदलाव के मुहाने पर है, जहां कूटनीति की मेज पर की गई एक गलती दशकों तक भारी पड़ सकती है। भारत की ‘बहु-पक्षीय’ नीति ही इस तूफान में सुरक्षित रास्ता दे सकती है।

लेखक- डॉ प्रसून शुक्ला
(प्रबंध संपादक, यूपी एवं उत्तराखंड, APN न्यूज़ और N1)