रूस ने अमेरिका पर आरोप लगाया है कि वह Global South देशों के खिलाफ “नव-औपनिवेशिक” नीति अपनाकर अमेरिका की वर्चस्ववादी स्थिति को बनाए रखना चाहता है। रूस के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया ज़खारोवा ने कहा कि किसी भी प्रकार के टैरिफ और प्रतिबंध इतिहास की “प्राकृतिक दिशा” को नहीं बदल सकते। ज़खारोवा ने कहा कि अमेरिका उन देशों पर “राजनीतिक रूप से प्रेरित आर्थिक दबाव” बना रहा है जो अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्वतंत्र राह चुनना चाहते हैं। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि रूस इन देशों के साथ सहयोग बढ़ाने और एक “वास्तविक बहुपक्षीय और समान विश्व व्यवस्था” के निर्माण के लिए तत्पर है।
रूस की यह टिप्पणी उस समय आई है जब कुछ ही दिन पहले अमेरिका ने दर्जनों देशों पर नए व्यापक टैरिफ लगाने की घोषणा की थी। ज़खारोवा ने कहा, “प्रतिबंध और प्रतिबंधात्मक नीतियाँ दुर्भाग्यवश आज के ऐतिहासिक चरण की एक कड़वी सच्चाई बन चुकी हैं, जो पूरे विश्व को प्रभावित कर रही हैं। उभरती बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था में अपने वर्चस्व के क्षरण को स्वीकार न कर पाने के कारण, अमेरिका राजनीतिक रूप से प्रेरित आर्थिक दबाव का सहारा लेकर नव-औपनिवेशिक एजेंडा चला रहा है।”
ग्लोबल साउथ में रूस के सहयोगी देशों के खिलाफ ट्रंप की टैरिफ नीति पर टिप्पणी करते हुए ज़खारोवा ने इसे “राष्ट्रीय संप्रभुता पर सीधा हमला” और “उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का प्रयास” बताया। उन्होंने कहा, “हम दृढ़ विश्वास रखते हैं कि कोई भी टैरिफ युद्ध या प्रतिबंध इतिहास की प्राकृतिक धारा को नहीं रोक सकते। हमें इस विचार में व्यापक समर्थन प्राप्त है— खासकर ग्लोबल साउथ और ब्रिक्स (BRICS) देशों में— जो हमारे जैसे समान सोच रखने वाले साझेदार और सहयोगी हैं।”
उन्होंने बताया कि ब्रिक्स, जिसमें पहले ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल थे, अब 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के शामिल होने के साथ विस्तारित हो गया है, और 2025 में इंडोनेशिया भी इसका हिस्सा बन चुका है। ज़खारोवा ने आगे कहा कि अमेरिका की यह नीति वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदायक है, जिससे आर्थिक विकास की गति धीमी होती है, आपूर्ति श्रृंखलाएँ प्रभावित होती हैं और वैश्विक व्यापार में खंडन की स्थिति उत्पन्न होती है। उन्होंने कहा, “यह नीति उन मुक्त व्यापार सिद्धांतों के भी खिलाफ है, जिन्हें कभी पश्चिमी देशों ने ही बढ़ावा दिया था, और अब वही देश राजनीतिक प्रेरणा से संरक्षणवादी नीतियाँ अपना रहे हैं और मनमाने ढंग से टैरिफ बाधाएं खड़ी कर रहे हैं।”
बता दें कि सोमवार को डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि वह भारत द्वारा “रूसी तेल की भारी खरीद” के लिए दिए जाने वाले टैरिफ को “काफी अधिक” बढ़ा देंगे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि रूस से खरीदा गया तेल खुले बाज़ार में “बड़े मुनाफे” के लिए बेचा जा रहा है। इस पर भारत ने कड़ा जवाब देते हुए अमेरिका को याद दिलाया कि जब यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रूस से तेल आयात शुरू किया था, तब अमेरिका ने स्वयं “ऐसे आयात को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया था”।
भारत ने यूरोपीय संघ द्वारा भारतीय रिफाइनरियों को एकतरफा रूप से निशाना बनाने के रुख का भी खंडन किया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत का तेल आयात “वैश्विक बाजार की स्थिति द्वारा उत्पन्न एक अनिवार्यता” है, जबकि वे देश जो इसकी आलोचना कर रहे हैं, वे स्वयं भी “रूस के साथ व्यापार में लगे हुए हैं”, भले ही उनके लिए ऐसा व्यापार कोई अनिवार्य आवश्यकता नहीं है।
वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा यूक्रेन युद्ध समाप्त करने के लिए बढ़ते दबाव के बीच, रूस ने घोषणा की है कि वह अब 1987 की मध्यम दूरी परमाणु बल (INF) संधि से खुद को बंधा हुआ नहीं मानता— यह संधि अमेरिका और रूस के बीच छोटी और मध्यम दूरी की परमाणु मिसाइलों की तैनाती पर रोक लगाती थी। रूस ने इस फैसले के लिए “पश्चिमी देशों की कार्रवाइयों” को दोषी ठहराया और कहा कि इससे रूस की सुरक्षा को “सीधा खतरा” उत्पन्न हुआ है।
यह कदम तब आया जब कुछ दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो परमाणु पनडुब्बियों को रूस के पास ‘उपयुक्त क्षेत्रों’ में तैनात करने का आदेश दिया था। रूस के विदेश मंत्रालय ने कहा कि सोवियत युग की इस संधि को मानने की स्थितियाँ “अब समाप्त हो चुकी हैं”, और अब रूस अपने ऊपर पहले से लगाए गए प्रतिबंधों का पालन नहीं करेगा।
पमंत्रालय ने एक बयान में कहा कि पश्चिम द्वारा अस्थिर करने वाली मिसाइल क्षमताओं का विकास हमारी सुरक्षा के लिए सीधा खतरा पैदा करता है। बाद में, रूस के पूर्व राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने NATO देशों को इस स्थिति के लिए जिम्मेदार ठहराया और कहा कि रूस आगे और कदम उठाएगा। मेदवेदेव ने कहा:”यह एक नई वास्तविकता है, जिसे हमारे सभी विरोधियों को स्वीकार करना पड़ेगा। आगे और कदमों के लिए तैयार रहें।”
अमेरिका 2019 में INF संधि से बाहर निकल गया था, यह आरोप लगाते हुए कि रूस उसका उल्लंघन कर रहा है। इसके जवाब में रूस ने कहा था कि जब तक अमेरिका ऐसे हथियार तैनात नहीं करता, तब तक वह भी ऐसा नहीं करेगा। हालांकि, पिछले दिसंबर में रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने संकेत दिया था कि अमेरिका और NATO की “अस्थिर करने वाली रणनीतिक कार्रवाइयों” के कारण रूस को जवाब देना पड़ सकता है।
विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, “चूंकि स्थिति इस दिशा में आगे बढ़ रही है कि अमेरिका निर्मित भूमि-आधारित मध्यम और छोटी दूरी की मिसाइलों को यूरोप और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में तैनात किया जा रहा है, इसलिए ऐसे में रूस के लिए एकतरफा रूप से ऐसी हथियार तैनाती पर रोक बनाए रखने की स्थिति समाप्त हो चुकी है।” INF संधि, जो 1987 में सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचेव और अमेरिकी राष्ट्रपति रॉनल्ड रीगन के बीच हुई थी, ने एक पूरी श्रेणी के हथियारों को समाप्त कर दिया था— जिनमें 500 से 5,500 किलोमीटर की दूरी तक मार करने वाली ज़मीनी मिसाइलें शामिल थीं। पश्चिमी देशों में मेदवेदेव को कभी एक संभावित उदारवादी और सुधारक के रूप में देखा गया था, लेकिन अब वह रूस की विदेश नीति के सबसे कठोर प्रवक्ताओं में से एक बन चुके हैं। पिछले शुक्रवार को ट्रंप ने कहा कि उन्होंने मेदवेदेव के युद्ध की आशंका वाले बयान के जवाब में दो परमाणु पनडुब्बियों को ‘उपयुक्त क्षेत्रों’ में भेजने का आदेश दिया है।