Sawan Mela 2022: सावन का पावन माह हो और जागेश्वर धाम का जिक्र न हो।ऐसा हो ही नहीं सकता।उत्तराखंड के अल्मोड़ा स्थित श्री जागेश्वर धाम 12 ज्योर्तिलिंगों में से एक है। यही शिव की वह पावन भूमि है जहां आत्मा और परमात्मा का मेल होता है।मध्य हिमालय की सुंदर वादियों के मध्य स्थित श्री जागेश्वर धाम में साक्षात महादेव रहते हैं।यही वजह है कि देश के कोने-कोने से लोग यहां पूजा करने के लिए आते हैं।घने देवदारों के वनों के बीच बने इस सुंदर मंदिर की बात ही कुछ ओर है।
पिछले 2 वर्षों से कोरोना के चलते यहां प्रतिवर्ष लगने वाले श्रावण मेले (Sawan Mela 2022) की धूम कम थी। इस वर्ष दोबारा सुप्रसिद्ध श्रावण मेले का आगाज यहां हो गया है। मेले का उदघाटन उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने किया।
इस मौके पर उन्होंने भगवान जागनाथ के दर्शन कर आशीर्वाद मांगा। मंदिर प्रशासन के अनुसार मेला अगले एक माह तक चलेगा। इसके लिए सभी व्यवस्थाएं पूरी कर लीं गईं हैं। इस दौरान लाखों की संख्या में देशभर से श्रद्धालु यहां आकर भगवान शिव की पूजा-अर्चना और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हैं।
जागेश्वर मंदिर में कई देवी-देवताओं की प्रतिमाएं हैं, लेकिन मुख्य मंदिर भगवान शिव का है। ऐसी मान्यता है कि शिव के महामृत्युंजय रूप वाले मंदिर में जाप करने से काल भी टल जाता है।
लोगों की मन की मुराद महादेव के आगे बोलने मात्र से पूरी हो जाती हैं। भूखे को अन्न, प्यासे को पानी यहीं हैं बाबा भोले बर्फानी। ये पंक्तियां यहां बिल्कुल सटीक बैठती हैं।कोरोना काल के बाद यहां आयोजित मेले में इस बार बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे हैं।यही वजह है कि यहां के लोकल होटल और धर्मशालाएं भी फुल हो गईं हैं।

Sawan Mela 2022: स्थापत्य कला की अनूठी मिसाल हैं जागेश्वर धाम
जानकारी के अनुसार इस मंदिर समूह का निर्माण 8वीं और 10वीं शताब्दी में कत्यूरी और चंद्र शासकों ने करवाया था।देवभूमि उत्तराखंड में कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं जिनका पुराणों में भी उल्लेख है। ऋषि-मुनियों की तपोभूमि पर कई ऐतिहासिक और पौराणिक मंदिर हैं।जिनमें हिंदू श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है।

अल्मोड़ा जिले में ऐसा ही एक धार्मिक स्थल है जागेश्वर धाम। जहां यूं तो सालभर श्रद्धालुओं का आना लगा रहता है लेकिन सावन और महाशिवरात्रि पर यहां जन सैलाब उमड़ता है। प्राचीन मान्यता के अनुसार जागेश्वर धाम ही भगवान शिव की तपस्थली है।
Sawan Mela 2022: पुराणों में कहा गया है कि भगवान शिव यहां ध्यान के लिए आया करते थे। इसी स्थान में कर्मकांड, जप, पार्थिव पूजा आदि की जाती है। जागेश्वर धाम के अंदर बने मंदिरों का रखरखाव भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण केंद्र के अलावा स्थानीय प्रशासन भी देखरेख करता है। यहां छोटे और बड़े लगभग 125 मंदिर हैं। इसके अलावा पुष्टि माता का मंदिर, कुबेर मंदिर, भैरव मंदिर भी है। इनका स्थापत्य और कला बेहद खूबसूरत है। इसके साथ यहां बने ब्रहम कुंड के शीतल जल में श्रद्धालु डुबकी भी लगाते हैं।
Sawan Mela 2022: यहीं पर हुई थी भगवान शिव की लिंग रूप में पूजा
मान्यताओं के अनुसार यही वह प्रथम मंदिर है जहां लिंग के रूप में शिवपूजन की परंपरा शुरू हुई। इसे उत्तराखंड का पाचवां धाम भी कहा जाता है। इसे योगेश्वर नाम से भी जाना जाता है। इस धाम का उल्लेख स्कंद पुराण, शिव पुराण और लिंग पुराण में भी मिलता है।
Sawan Mela 2022: पुराणों के अनुसार भगवान शिव एवं सप्तऋषियों ने यहां तपस्या की थी। प्राचीन समय में जागेश्वर मंदिर में मांगी गई मन्नतें उसी रूप में स्वीकार हो जाती थीं। ऐसे में मन्नतों का दुरुपयोग होने लगा। आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य यहां आए और उन्होंने इस दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था की। अब यहां सिर्फ यज्ञ एवं अनुष्ठान से मंगलकारी मनोकामनाएं ही पूरी हो सकती हैं।
मान्यता है कि भगवान श्रीराम के पुत्र लव-कुश ने यहां यज्ञ आयोजित किया था, जिसके लिए उन्होंने देवताओं को आमंत्रित किया। मान्यता है कि उन्होंने ही इन मंदिरों की स्थापना की थी। जागेश्वर में लगभग 250 छोटे-बड़े मंदिर हैं। जागेश्वर मंदिर परिसर में 125 मंदिरों का समूह है। मंदिरों का निर्माण पत्थरों की बड़ी-बड़ी शिलाओं से किया गया है।
Sawan Mela 2022: कैलाश मानसरोवर के प्राचीन मार्ग पर स्थित है मंदिर
जागेश्वर धाम में सारे मंदिर केदारनाथ शैली से निर्मित हैं। मंदिर के किनारे जटा गंगा नदी की धारा बहती है।यहां भगवान शिव की पूजा बाल या तरुण रूप में भी की जाती है। यहां बने सभी मंदिरों का निर्माण बड़े-बड़े पत्थरों से किया गया है। कैलाश मानसरोवर के प्राचीन मार्ग पर स्थित इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि गुरु आदि शंकराचार्य ने केदारनाथ के लिए प्रस्थान करने से पहले जागेश्वर के दर्शन किए और यहां कई मंदिरों का जीर्णोद्धार और पुन: स्थापना भी की थी।
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