भारतीय साहित्य के आकाश में गोस्वामी तुलसीदास और मुंशी प्रेमचंद दो ऐसे दीप स्तंभ हैं, जिन्होंने अपने-अपने युग, भाषा और माध्यम से समाज को दिशा देने का कार्य किया। एक ने भक्ति और अध्यात्म के माध्यम से समाज को एकजुट किया, तो दूसरे ने यथार्थवादी दृष्टिकोण से सामाजिक बुराइयों की चीर-फाड़ की। प्रस्तुत लेख में हम तुलसीदास और प्रेमचंद के साहित्य, चिंतन और प्रभाव का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं।
साहित्यिक युग और पृष्ठभूमि
गोस्वामी तुलसीदास (1532-1623): मध्यकालीन भारतीय भक्ति आंदोलन के प्रमुख स्तंभ, जिन्होंने हिंदी साहित्य को ‘रामचरितमानस’ जैसा महाकाव्य प्रदान किया। उनका युग धार्मिक पुनर्जागरण और मुगल शासन की धार्मिक जकड़न से संघर्ष का युग था।
मुंशी प्रेमचंद (1880-1936): आधुनिक भारत के नवजागरण काल के प्रतिनिधि, जिन्होंने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन, सामंती शोषण और सामाजिक असमानता के विरुद्ध लेखनी उठाई। उनका साहित्य स्वतंत्रता संग्राम, राष्ट्रवाद और समाजसुधार से ओतप्रोत है।
भाषा और शैली
तुलसीदास: उन्होंने अवधी जैसी लोकभाषा को माध्यम बनाकर गूढ़ धार्मिक और दार्शनिक विषयों को जन-जन तक पहुँचाया। शैली में कवित्व, छंद, अनुप्रास और भावात्मक ओज विद्यमान है। भाषा सरल लेकिन प्रभावशाली।
प्रेमचंद: उर्दू और हिंदी दोनों में सिद्धहस्त। उन्होंने खड़ी बोली हिंदी को साहित्यिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया। उनकी भाषा यथार्थपरक, संवादात्मक और जनसामान्य की बोलचाल से मेल खाती है।
विषय वस्तु और दृष्टिकोण
तुलसीदास का दृष्टिकोण: उनका साहित्य धार्मिक, भक्ति और आदर्शवादी भावभूमि पर आधारित है। ‘रामचरितमानस’ में राम को मर्यादा पुरुषोत्तम और जीवन मूल्य का प्रतीक बताया गया है। उनका उद्देश्य अध्यात्मिक चेतना और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना था।
प्रेमचंद का दृष्टिकोण: उनका साहित्य सामाजिक यथार्थ, शोषित वर्ग की पीड़ा और जातिवाद, नारीशोषण, किसान समस्या, शिक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों पर केंद्रित रहा। वे आदर्श और यथार्थ का संतुलन रखते हुए सामाजिक क्रांति के पक्षधर थे।
मानव चित्रण
तुलसीदास: पात्रों का चित्रण आदर्शवादी और धार्मिक दृष्टिकोण से किया गया है। राम, सीता, हनुमान जैसे पात्रों में दैवी गुणों की प्रधानता है। नारी को पवित्रता और सतीत्व की प्रतिमा के रूप में प्रस्तुत किया गया।
प्रेमचंद: उनके पात्र पूर्णतः सांसारिक, संघर्षशील और त्रुटियों से युक्त होते हैं। पात्र सामाजिक यथार्थ के जीवंत प्रतीक हैं। नारी पात्रों में भी संवेदना, विद्रोह और आत्मबल झलकता है।
प्रमुख रचनाएँ
तुलसीदास -रामचरितमानस,विनयपत्रिका,हनुमान चालीसा, कवितावली
प्रेमचंद-गोदान, कर्मभूमि, गबन, ईदगाह और पूस की रात (कहानी)
प्रभाव और उद्देश्य
तुलसीदास: धर्म और भक्ति के माध्यम से सामाजिक एकता का निर्माण, मुग़लकालीन असहिष्णुता के विरुद्ध सांस्कृतिक चेतना का जागरण।
प्रेमचंद: यथार्थ और आदर्श के माध्यम से सामाजिक शोषण और विषमता के विरुद्ध वैचारिक आंदोलन, स्वाधीनता संग्राम के साहित्यिक स्तंभ।
समानताएँ
जनहित में लेखन: दोनों का साहित्य जनमानस को जागरूक करने और दिशा देने वाला रहा है।
भाषा का लोकतांत्रिक प्रयोग: दोनों ने लोकभाषा को साहित्य की मुख्य धारा में स्थान दिया।
नैतिकता का आग्रह: तुलसीदास धार्मिक नैतिकता के पक्षधर रहे, वहीं प्रेमचंद सामाजिक नैतिकता के समर्थक थे।
साहित्य के माध्यम से परिवर्तन की चाह: दोनों ही रचनाकारों ने लेखन को साध्य नहीं बल्कि समाज परिवर्तन का साधन माना।
मुख्य भिन्नताएँ
आधार | तुलसीदास | प्रेमचंद |
विषय | धार्मिक-आध्यात्मिक | सामाजिक-यथार्थवादी |
दृष्टिकोण | आदर्शवादी | यथार्थ और सुधारवादी |
भाषा | अवधी/ब्रज | खड़ी बोली हिंदी/उर्दू |
शैली | काव्यात्मक | गद्यात्मक (उपन्यास/कहानी) |
काल | भक्ति काल | आधुनिक काल |
गोस्वामी तुलसीदास और मुंशी प्रेमचंद यद्यपि विभिन्न युगों के प्रतिनिधि हैं, फिर भी दोनों ने अपनी लेखनी से भारतीय समाज के मानस को गहराई से प्रभावित किया। तुलसीदास ने जहाँ लोक में धर्म और भक्ति का दीप जलाया, वहीं प्रेमचंद ने सामाजिक यथार्थ और सुधार का आईना दिखाया। एक आध्यात्मिक आस्थाओं का पोषक है, तो दूसरा सामाजिक चेतना का उद्घोषक। दोनों का साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना अपने युग में था — बस दृष्टिकोण और माध्यम अलग हैं।