उधर के लोग: महज दलित साहित्य नहीं है अजय नावरिया का उपन्यास, विस्तृत फलक रखती है रचना

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हिंदी के जाने माने लेखक अजय नावरिया के उपन्यास ‘उधर के लोग’ को केवल दलित साहित्य तक सीमित कर के नहीं देखा जा सकता है। यह एक ऐसा उपन्यास है जो सिर्फ जातिगत भेदभाव की कहानी नहीं कहता है बल्कि इस रचना का फलक बहुत विस्तृत है। उपन्यास एक कॉलेज के शिक्षक के निजी जीवन के इर्द-गिर्द है। नायक अपनी कॉलेज की दोस्त वंदना झा से शादी करता है। वंदना झा, जो कि जाति से ब्राह्मण है, से शादी करने के बाद नायक अपने परिवार से अलग रहने लगता है। कारण यही कि वंदना और नायक के परिवार के बीच मतभेद होते हैं।

हालांकि समय के साथ नायक और वंदना के बीच भी खटपट होने लगती है। एक बार तो वंदना और नायक एक दूसरे पर हाथ तक उठा देते हैं। वंदना की आत्महत्या के साथ ही नायक के जीवन का एक अध्याय समाप्त होता है। वंदना और नायक के संबंधों के जरिए लेखक ने दलित और सवर्ण जातियों के बीच के संबंधों पर भी रोशनी डालने की कोशिश की है।

उपन्यास को पढ़कर समझ आता है कि दलित समाज में भी कितनी जातियां हैं और उन जातियों का एक दूसरे को लेकर और दूसरी जातियों को लेकर कैसा रवैया है? दलितों में भी जाटव, खटीक और ऐसी ही कई जातियां हैं। उपन्यास में बताया गया है कि कैसे दलित समाज में हिंदू धर्म और जाति व्यवस्था को लेकर अलग-अलग राय है।

इस उपन्यास के जरिए सवाल किया गया है कि क्या जातिगत भेदभाव के बिना समाज का निर्माण किया जा सकता है? उपन्यास में बताया गया है कि कैसे हर एक जाति के अपने रीति रिवाज और संस्कार हैं। हर जाति की अपनी एक संस्कृति है। उपन्यास में नायक की दूसरी शादी होती है। इस बार वह दलित समाज की ही लड़की से शादी करता है लेकिन नायक के घर वाले वंदना से जुड़ी बातें संगीता से छिपाते हैं। नायक संगीता को वंदना की तुलना में एक बेहतर जीवनासाथी पाता है। इसे इस तरह समझा जा सकता है कि अंतरजातीय विवाह करना और उसे निभाना इतना आसान नहीं है, जैसा कि अमूमन लोग समझ लेते हैं।

एक रोज वंदना के बारे में संगीता को पता चल जाता है। संगीता अलग रहने का फैसला करती है। बाद में जब नायक को पता चलता है कि संगीता नायक के बच्चे की मां बनने वाली है तो उसे एक उम्मीद रहती है कि एक दिन संगीता लौट आएगी। दिलचस्प बात ये है कि लेखक नायक और संगीता के संबंधों को भी जातीय विमर्श की दृष्टि से देखते हैं।

उपन्यास में एक और किरदार है, आएशा, जो कि एक वेश्या है। नायक और आएशा कि दोस्ती हो जाती है। आएशा नायक के भाई की शादी में नायक के परिजनों से मिलती है। आएशा के बहाने लेखक ने बताना चाहा है कि जो दलित समाज खुद नाइंसाफी का शिकार है, वह भी कैसे एक वेश्या को हीन समझता है। इस किताब को पढ़ेंगे तो आपको बीच-बीच में जातीय और धार्मिक हिंसा का जिक्र भी मिलेगा। दलित साहित्य के संदर्भ में देखा जाए तो अजय नावरिया का यह उपन्यास महज आत्मकथा नहीं है, जिसमें यातनाओं का विवरण है बल्कि यह एक दिलचस्प उपन्यास है, जिसे हर एक आयु वर्ग का व्यक्ति पढ़ सकता है।