आज से ठीक 109 साल पहले 17 नवंबर, 1913 को मानगढ़ (Mangarh) (बांसवाड़ा, राजस्थान) में एक भयानक त्रासदी में 1,500 से अधिक भील (Bhil) आदिवासी मारे गए थे. गुजरात-राजस्थान (Gujarat – Rajasthan) की सीमा पर स्थित मानगढ़ पहाड़ी पर हुए इस भयानक हत्याकांड को आदिवासी (Tribals) जलियांवाला के नाम से भी जाना जाता है.
क्या थे कारण ?
Bhil, जो एक आदिवासी समुदाय है, को रियासतों के शासकों और अंग्रेज़ो के हाथों बड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा. 20वीं शताब्दी के अंत तक राजस्थान और गुजरात में रहने वाले भील एक तरह से बंधुआ मजदूर बन गए थे. दक्कन और बॉम्बे प्रेसीडेंसी में वर्ष 1899-1900 में पड़े भीषण अकाल, जिसमें छह लाख से अधिक लोग मारे गए थे, ने भीलों की स्थिति को और खराब कर दिया था.
इसके बाद बड़े सामाजिक कार्यकर्ता गुरु गोविंदगिरी (गोविंद गुरु) द्वारा लामबंद और प्रशिक्षित भीलों ने वर्ष 1910 तक तत्कालीन अंग्रेजी हुकुमत के सामने 33 मांगों का एक चार्टर रखा, जो मुख्य रूप से जबरदस्ती कराए जा रहे काम, भीलों पर लगाए गए उच्च टेक्स और अंग्रेज़ो और रियासतों के शासकों द्वारा गुरु के अनुयायियों के उत्पीड़न से संबंधित थे.
अंग्रेजो द्वारा भीलों को शांत करने के प्रयासों को भीलों ने खारिज करते हुए ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता की घोषणा करने का संकल्प लिया और मानगढ़ पहाड़ी को छोड़ने से इनकार कर दिया. लेकिन अंग्रेजों ने तब Bhil को 15 नवंबर, 1913 से पहले मानगढ़ पहाड़ी छोड़ने का आदेश जारी कर दिया. जब ऐसा नहीं हुआ तो 17 नवंबर, 1913 को ब्रिटिश भारतीय सेना ने भील प्रदर्शनकारियों पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं और कहा जाता है कि इस त्रासदी में महिलाओं एवं बच्चों सहित 1,500 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी.
कौन थे गोविंद गुरु?
गोविंद गुरु, Bhil और गरासिया आदिवासी समुदायों के बीच एक बड़े नेतृत्त्वकर्ता थे, वे एक ऐसे व्यक्ति जिन्होंने हजारों आदिवासियों को अपने दम पर एकजुट किया. इनकी पकड़ तात्कालिक मानगढ़ वर्तमान राजस्थान के उदयपुर, डूंगरपुर और बांसवाड़ा, गुजरात के इडर एवं मध्य प्रदेश का मालवा के सीमांत क्षेत्र तक थी.
गोविंद गुरु भारत के स्वतंत्रता संग्राम में नेता बनने से पहले, उन्होंने भारत के पुनर्जागरण आंदोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई. 25 वर्ष की उम्र में, उन्होंने स्वामी दयानंद सरस्वती को काफी प्रभावित किया, जो कि उत्तर भारत में उस आंदोलन के एक केंद्रीय व्यक्ति थे. उन्होंने स्वामी दयानंद सरस्वती के साथ मिलकर आदिवासी क्षेत्रों में सामाजिक सुधार के क्षेत्र में काफी योगदान दिया.
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वर्ष 1903 में, गोविंद गुरु ने शराब न पीने का संकल्प लिया और अपना ध्यान सामाजिक बुराइयों को खत्म करने, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने, बाल मजदूरी को खत्म करने, बालिकाओं को शिक्षित करने और जनजातियों के बीच आपसी विवादों को न्यायालय तक ले जाने के बजाय अपने स्तर पर उसे हल करने को लेकर केंद्रित किया.
इससे एक सम्प (एकता) सभा का निर्माण हुआ, जिसकी पहली बैठक मानगढ़ में पहाड़ी पर हुई थी. इस ऐतिहासिक घटना ने भारतीय इतिहास में मानगढ़ के महत्व को काफी बढ़ा दिया और फिर यह क्षेत्र आदिवासी आंदोलन का केंद्र बन गया.
वर्ष 1908 में गोविंद गुरु द्वारा शुरू किया गया भगत आंदोलन जिसमे आदिवासी अपनी शपथ की पुष्टि करने के लिये आग के चारों ओर इकट्ठा हुए थे को अंग्रेजो ने एक खतरे के रूप में चिह्नित किया. मानगढ़ हत्याकांड के बाद गोविंद गुरु को मृत्यु दंड दिया गया था. लेकिन आदिवासी भीलों का आंदोलन हिंसक हो जाने के डर से अंग्रेजों ने उसकी फांसी टाल दी और एक निर्जन द्वीप पर उसे 20 वर्ष की कैद की सजा सुनाई. जब वह जेल से रिहा हुआ, तो तात्कालिक रियासतें उसके निर्वासन के लिये एकजुट हो गई. 30 अक्तूबर, 1931 को कंबोई, गुजरात में उनकी मृत्यु हो गई.
भील जनजाति
‘Bhil’ शब्द विल्लू या बिल्लू शब्द से बना है, जिसे द्रविड़ भाषा में धनुष (Bow) के नाम से जाना जाता है. भील नाम का जिक्र महाभारत और रामायण के प्राचीन महाकाव्यों में भी मिलता है.
भीलों को आमतौर पर राजस्थान के धनुषधारी (Bowmen) के रूप में जाना जाता है. यह भारत का सबसे बड़ा आदिवासी समुदाय है. 2011 की जनगणना के अनुसार यह भारत की सबसे बड़ी जनजाति है. आमतौर पर इन्हें दो रूपों में वर्गीकृत किया जाता है- जिनमें मध्य या शुद्ध भील और पूर्वी या राजपूत भील आते हैं.
मध्य भारत में भील मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान तथा त्रिपुरा के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में भी पाए जाते हैं. उन्हें आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और त्रिपुरा में अनुसूचित जनजाति माना जाता है.