लखनऊ में पांडुलिपि अभिरुचि कार्यशाला, युवाओं ने करीब से देखी भारतीय ज्ञान परंपरा की दुर्लभ धरोहरें

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राजधानी लखनऊ स्थित उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार में बुधवार को आयोजित ‘पांडुलिपि अभिरुचि कार्यशाला’ भारतीय ज्ञान परंपरा, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का महत्वपूर्ण मंच बनकर सामने आई। ज्ञानभारतम् मिशन के अंतर्गत आयोजित इस कार्यशाला में प्रदेशभर से आए विद्यार्थियों, शोधार्थियों और विशेषज्ञों ने भाग लिया और दुर्लभ पांडुलिपियों के माध्यम से भारत की समृद्ध बौद्धिक विरासत को करीब से समझने का अवसर प्राप्त किया।

कार्यक्रम के दौरान ‘ज्ञानभारतम् निर्देशिका’ और ‘कोलोनियल लखनऊ’ नामक दो महत्वपूर्ण पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य युवाओं को भारतीय इतिहास, साहित्य, दर्शन और पारंपरिक ज्ञान प्रणाली से जोड़ना था।

पांडुलिपियों के संरक्षण पर विशेष जोर

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अपर मुख्य सचिव, पर्यटन, संस्कृति एवं धर्मार्थ कार्य विभाग अमृत अभिजात ने कहा कि ज्ञानभारतम् मिशन देशभर की दुर्लभ पांडुलिपियों को सुरक्षित करने की दिशा में बड़ा अभियान बन चुका है। उन्होंने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध परंपराओं में से एक है, जिसे संरक्षित करना वर्तमान पीढ़ी की जिम्मेदारी है।

उन्होंने बताया कि मिशन के माध्यम से लगभग एक करोड़ पांडुलिपियों के संरक्षण और डिजिटलीकरण की दिशा में कार्य किया जा रहा है। साथ ही अब आम नागरिक भी अपनी निजी और पारिवारिक पांडुलिपियों को सुरक्षित रखने के लिए इस मिशन से जुड़ सकते हैं।

अमृत अभिजात ने शोधार्थियों और विद्यार्थियों से भारतीय इतिहास और सांस्कृतिक धरोहरों के अध्ययन को बढ़ावा देने का आह्वान करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश पांडुलिपि संरक्षण के क्षेत्र में देश में अग्रणी भूमिका निभाने की क्षमता रखता है।

दुर्लभ रामचरितमानस और गीता बनी आकर्षण का केंद्र

कार्यशाला में प्रदर्शित दुर्लभ पांडुलिपियां प्रतिभागियों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण रहीं। वर्ष 1794 की रामचरितमानस की प्राचीन हिन्दी पांडुलिपि ने विशेष रूप से लोगों का ध्यान खींचा। इस पांडुलिपि में भगवान श्रीराम के जीवन प्रसंगों से जुड़े लगभग 400 चित्रों को बेहद कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। प्रत्येक पृष्ठ पर दोहा-चौपाई के साथ चित्रों का विस्तृत वर्णन भी दर्ज है।

इसके अलावा श्रीमद्भगवद्गीता की दुर्लभ संस्कृत पांडुलिपि भी आकर्षण का केंद्र रही। वर्ष 1967 की इस पांडुलिपि में भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े सात सुंदर चित्रों के साथ गीता के सभी 700 श्लोक संकलित हैं।

प्रदेश के विभिन्न जिलों से पहुंचे करीब 250 छात्र-छात्राओं और शोधार्थियों ने इन दुर्लभ धरोहरों का अवलोकन कर भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा की गहराई को महसूस किया।

भारतीय ज्ञान परंपरा में समाधान छिपे हैं: विशेषज्ञ

कार्यक्रम में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के आधुनिक भारतीय इतिहास विभाग के सह प्राध्यापक डॉ. सुशील कुमार पाण्डेय ने “भारतीय ज्ञान परंपरा में पांडुलिपियों का महत्व” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय की कई चुनौतियों का समाधान भारतीय ज्ञान परंपरा में मौजूद है और पांडुलिपियां हमारी बौद्धिक विरासत की सबसे महत्वपूर्ण धरोहर हैं।

वहीं पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने कहा कि उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना सरकार की प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि ज्ञानभारतम् मिशन केवल पांडुलिपियों के संरक्षण का अभियान नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास, साहित्य और लोक ज्ञान को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।

डिजिटलीकरण और शोध को मिलेगा बढ़ावा

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में विशेषज्ञों ने ज्ञानभारतम् पोर्टल, मोबाइल एप और राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण पर विस्तृत जानकारी दी। साथ ही पांडुलिपियों की पहचान, संरक्षण और डिजिटलीकरण की प्रक्रिया पर भी चर्चा हुई।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की कार्यशालाएं युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने और भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक संदर्भों में समझने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती हैं।