अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को गाजा के लिए गठित किए जा रहे ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का हिस्सा बनने का औपचारिक न्योता दिया है। यह बोर्ड अमेरिका की मध्यस्थता में इजरायल और हमास के बीच हुए सीजफायर समझौते के दूसरे चरण का एक अहम स्तंभ माना जा रहा है। इस पहल के जरिए गाजा में युद्ध के बाद की स्थिति को स्थिर करने और भविष्य की रूपरेखा तय करने की कोशिश की जा रही है।
क्या है ‘बोर्ड ऑफ पीस’?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की जिम्मेदारी गाजा में पुनर्निर्माण, प्रशासनिक ढांचे, निवेश और पूंजी जुटाने जैसे अहम पहलुओं की निगरानी करना होगा। इस बोर्ड की अध्यक्षता स्वयं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप करेंगे। शुरुआती तौर पर यह संस्था गाजा संकट पर केंद्रित रहेगी, लेकिन भविष्य में इसे अन्य वैश्विक संघर्षों के समाधान के लिए भी विस्तारित करने की योजना है।
ड्राफ्ट चार्टर और अमेरिकी पत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, भारत के साथ-साथ पाकिस्तान को भी इस बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण दिया गया है। यदि भारत इस प्रस्ताव को स्वीकार करता है, तो वह अन्य सदस्य देशों की तरह तीन वर्षों के कार्यकाल के लिए बोर्ड का हिस्सा बनेगा। इस अवधि के दौरान किसी भी सदस्य देश से कोई वित्तीय योगदान नहीं लिया जाएगा।
देने होंगे 1 अरब डॉलर
हालांकि, ड्राफ्ट प्रस्ताव में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि कोई देश तीन साल की अवधि पूरी होने के बाद भी बोर्ड की सदस्यता जारी रखना चाहता है, तो उसे 1 अरब डॉलर (लगभग 8,300 करोड़ रुपये) का योगदान देना होगा। इसके बदले उस देश को बोर्ड की स्थायी सदस्यता दी जाएगी। यह राशि बोर्ड की प्रशासनिक गतिविधियों, पुनर्निर्माण परियोजनाओं और संचालन से जुड़े खर्चों में इस्तेमाल की जाएगी।
फिलहाल, भारत सरकार की ओर से इस न्योते पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि यह प्रस्ताव भारत की वैश्विक कूटनीतिक हैसियत और बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है।
अमेरिका से इजरायल नाराज !
अमेरिका द्वारा गाजा के लिए गठित कार्यकारी बोर्ड पर इजरायल ने आपत्ति जताई है। खास तौर पर इसमें तुर्की और कतर के प्रतिनिधियों को शामिल किए जाने को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को इजरायली विरोध का सामना करना पड़ा है। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यालय ने रविवार को कहा कि इस कार्यकारी समिति का गठन इजरायल के साथ किसी भी तरह के समन्वय के बिना किया गया है, जिसे लेकर उसकी गंभीर आपत्ति है।









